31 मई 2011

सफ़र का सन्नाटा

दूर दूर तक नज़र जा रही थी ,
बस धरती पड़ी हुई थी अपनी मट्टी ओढ़कर ...
ना कोई घासका दोशाला था ,
ना कोई पेड़ का घना साया था ...
ना कोई पंछीकी चहचाहट थी ,
ना कोई गाय या भैंस वो जुगाली करना था ....
बस एक सफ़र बिलकुल विराना सा ....
एक मुक्तलिफ़ सफ़र था ....
जैसे वो मेरी जिंदगी का एक वर्तमानका पन्ना था .....
सब कुछ है पर नज़रोंसे दूर कहीं दूर ....
मेरे इंतज़ार का एक सबब ....
एक अनजान मंजिल सा ....
दूर से दो अजनबी एक दुसरेकी राह तकते हुए ....
बस एक सफ़र का अंत ...अंत ...अंत ....
फिर एक शोर इन ध सिटी ....ख़ामोशी टूटी हुई ....

25 मई 2011

तो आप है दार्जिलिंगमें ....

मेरी जिंदगीके सफ़र का सबसे अच्छा जो पड़ाव था चलो आज उसकी सैर करें ....
ये बात है सन २००३की ....हम वड़ोदरासे दिल्ही और वहांसे न्यू जलपाईगुडी पहुंचे ...दिल्हीमें छ घंटे का होल्ट था तो हम सामने लालकिला और चांदनी चोककी सैर करके आये ..फिर सफ़र शुरू हुआ यु पी और बिहारसे गुजरता रास्ता ....बिहारमें देखा की रिजर्वेशनकी धज्जियाँ उड़ जाती है ...और बर्थ पर पैर रखकर बन्दर की तरह बेलेंस करते टॉयलेट तरफ सफ़र कैसे होता है ....जब रातमें ट्रेन गुजरी थी तो कोई प्लेटफोर्म पर बत्ती नहीं .....डर भी लगता था ....दो रात और दो दिन के सफ़र के बाद रात साढ़े तीन बजे हम न्यू जलपाईगुडी पहुंचे तब राहत की सांस ली ...दो घंटे बाद दार्जीलिंग की ओर यात्रा शुरू हुई .....मेरी जिंदगी का सबसे स्वप्निल सफ़र .....
राजेश खन्ना की आराधना देखी होगी तो मेरे सपनों की रानी गाना याद होगा ...वही रास्ता ....कितने बड़े पहाड़ ....मसूरी की छोटी छोटी चोटियाँ यहाँ पर बहुत ही बड़े बड़े पहाड़में तब्दील हो चुकी थी ....और क्या बयाँ करें हम उन वादियोंकी खूबसूरती को !!!! शब्द कम ही पड़ेंगे ...रस्ते में बिलकुल छोटे छोटे पर बेहद सुन्दर आकर के घर ...वो छोटे छोटे खुबसूरत स्कुल जाते बच्चे ....बस टेढ़े गोलाई वाले रास्तो से गुजरता कारवां .....बाजु में छोटी तोय्य ट्रेन का रास्ता ....बाप रे दार्जिलिंग ....
भाई आप को चलने की आदत है ...आपकी पैर की पिंडिया वर्जिशकी आदत रखती है ??? यहाँ रिक्शा नहीं मिलेगी ...क्योंकि रास्ता सड़क भी एकदम सीधी ऊँचाइयों का है ...अरे पॉँच बजे सूरज सर पर आ जाता है और शाम को पॉँच बजे तो घना अँधेरा ...दो दिन तो ये सब एडजस्ट करने में ही जाता है ...वहां पर देखने वाली हर जगह पर आप को टेक्सी करके ही जाना पड़ता है ...शेरिंग में सौदा अच्छा रहता है ....कलिंगपोंग पासमे अच्छा स्थल है पर वहां नहीं जा पाए ...मशहूर टी गार्डन की सैर कर सकते हो ....तेनसिंह रोक पर रोक क्लाइम्बिंग का मजा भी लो ....वहां सुन्दर रोक गार्डन भी है जहाँ कुदरती झरनोंसे धोध बने है ...पर आप अगर मैदानी इलाको से गए हो तो चढ़ाई काफी तकलीफदेह सिध्ह हो सकती है ......खाना बहुत स्वादिष्ट नहीं मिलता ....वहां पर एक गौतम बुध्ध की मूर्ति काफी अच्छी है ...अगर मौसम साफ़ रहा तो वहां से कंचनजंगा शिखर भी दीखता है ....
वहां सूर्योदय देखने का रिवाज और मजा है ...सन राइज पॉइंट पर आपको सुबह साढ़े तीन बजे पहुंचना जरूरी है क्योंकि अक्तूबरमें वहां सुबह पौने चार बजे सूरज महाशय पधारते है ....वैसे हम गए उस दिन बरसात का मौसम था तो बादल की वजह से उदय देखना संभव नहीं हुआ ......सोचो होटलसे रात ढाई बजे निकलके एक घंटे का सफ़र करके खाली हाथ लौटना !!! खैर बीच रस्ते में आने वाले बगीचे और दो बौध्ध मंदिर खुबसूरत मंदिर देखे ....उस वक्त हम बिलकुल बादलों के बीच से गुजर रहे थे ...हमें बादल स्पर्श करके गुजर रहे थे ....कितना हसीं एहसास था बयाँ नहीं कर सकते उसका .......बादलों के बीच से गुजरना था या लगता था आज कल पांव नहीं पड़ते जमीं पर ....रस्ते टेढ़े टेढ़े जलेबी जैसे ....बस ये एहसास जहाँ में बाकी है .....
चार दिन वहां रहेनेके बाद एक अचानक की गयी सबसे खुबसूरत जगह की सैर करेंगे फिर एक बार ...अगले भ्रमण में ....आप चलेंगे ना मेरे साथ !!!!!

23 मई 2011

नादाँ हवाएं ...

बिखरी हुई जुल्फोंका अफसाना हम कैसे कहें उनसे ?
गर कहें की पवन आज दिल्लगी कर रहा था छेड़ते हुए
तो इश्क जलकर खाक हो जाने का डर है ....
धीरेसे कह दिया कानोमे उनके
ये तो तेज हवाके झोंकोने चिलमन गिरा दी चेहरे पर मेरे
तुम्हारे सिवा कोई इसका दीदार ना कर सके ....

22 मई 2011

दिल्लगी ...

आज मौसम और मिजाज़ बड़ा आशिकाना है
मेरे घरकी छत पर रातसे बरखा और बादल का आनाजाना है ....
कल रात हुआ था बादलको बरखासे पहली नजरका प्यार
दोनों निकल पड़े है लॉन्ग ड्राइव पर हवाके रथ पर होकर सवार .....
तारोंसे भरी शौल ओढ़कर सोये थे रात में ,
सूरजके पसीनेने दिल्लगीसे छेड़ा हमें बरखाकी बुँदे बनकर ...

21 मई 2011

एक जर्रा

उड़ती है धरती एक एक जर्रे जर्रे का रूप धर ,
पता नहीं किस ख़ुशीसे वो हवा के संग बहती है ????
लगता है कोई कह रहा है कानमें जैसे
एक जर्रे को भी बादलसे मोहब्बत हो गयी हो जैसे ....

19 मई 2011

कलम ...दवात.....सफा

ख्याल एक काली स्याह बन
एक प्रवाहमें घुल जैसे
शब्दका सैलाब बनकर
सिमट जाते है कलममें ......
एक सफा एक दवात
कभी पैनी धार धरके तेग बन जाती है ,
कभी हुस्नकी इबादतके शब्दचित्र बनाती है ....
कभी सारी बहारोंके रंग खुदमें समेट ले आती है ...
कभी दिलके दर्दको कूट कूटकर बस बह चलती है ....
एक बिन स्याहकी कलम बांज नहीं होती कभी ,
क्योंकि अल्फाज़की उसमे कमी नहीं होती ,
उस कोरे कागज़ पर पढ़ लेने के लिए
बस हमारे पास आंख नहीं होती ....

18 मई 2011

मत आओ मेरे अंगना यूँ

कल यूँही बस बहती हवाओमें जैसे तुम्हारी सदा सुनाई दी
ना थे पास तुम कहीं भी ,पर तुम्हारी हँसी सुनाई दी .....
चांदनी अहातेमें बैठने आई मेरे ,
ग़ज़ल कुछ काफियेमें बँट कर कुछ गुनगुना गयी ......
बस ये एहसासोंका सैलाब था
जो सिमट ना पाया कुछ शब्दोंकी मुठ्ठीमें .....
बस अश्क बन टपकता रहा मुठ्ठीसे मेरी
और जमीं पर एक नज़्म लिखता रहा .....

17 मई 2011

एक शाम खुद के नाम ..

एक शाम कुछ अलगसी थी ...जो जिन्दगीका मतलब समजा गयी ....
बस कल यूँही फॅमिलीके हमउम्र ग्रुपके साथ यहाँके लोकप्रिय स्पोट कमाटी बाग़ जाना हुआ ...छोटे बड़े मिलकर सत्रह का ग्रुप था .....वेकेशन है ...कड़ी धुप जो बादलोंके चादर ओढ़कर कुछ और गर्मी बढा रही थी ...पर कहते है ना की बचपन हर गम से बेगाना होता है ......
छोटे छोटे बच्चे ...कुछ याद और कल्पना आये ...अपनी मम्मीको कितना तंग किया होगा ना !!! ये कपडे ही पहनेंगे !!! ये जूते के साथ ये जुराबे चाहिए ...कितनी शर्तें रखी होगी ...आप हमें इस राइड में बिठाओगे ...हमें आइसक्रीम भी खिलाओगे ना !!! और फिर वो ख़ुशी राइडमें बैठकर मम्मी पापा के सामने हाथ हिलाना !!!
बहुत छोटी बातें है ये पर हमें उम्र के वो पड़ाव पर फिर ले गयी या ले जाती है ......पिकनिक का पूरा माहौल था ...फिर लॉन पर बैठकर वो सब चीजों को खाना ...और बड़ोका बच्चे बनकर खेलना ...मैंने भी कुछ खेल खेले ...खास तो प्लास्टिक का हवा भरा हुआ बोल उछालने का आनंद ही कुछ और होता है ...थोडा बेडमिन्टन भी ....
कुछ भी खाने पिनेमें मेरी दिलचस्पी नहीं रही ....पर हां वो छोटे छोटे बच्चो को केंडी खिलाने का मजा ही कुछ और था ....

कल एक अजीब अनुभूति भी हुई ...जब झूले और राइड वाले हिस्से में गयी तो मैं अपनी कल्पना में ही सही हर राइड पर बैठकर खुद को देख रही थी ...चीख और चिल्लाने का शोर मुझे नहीं सुनाई देते थे ...बस भीड़ में तनहा होने का आनंद वहीँ मिला .....ऊपर लिखी सारी बातें उधर ही मैंने महसूस किया .....
सच बचपन और वेकेशन मुझे बिना कहीं जाए वहीँ मिला खुश होकर मेरे गले लग गया ......


आई लव यु वेकेशन ....आई मिस यु वेकेशन .....

15 मई 2011

बस यूँही तेरे संग ...

तेरी बिरहकी बसंत खिली थी फिजामें ,
हर शाख पर यादोंकी कलियाँ खिलनेको थी ,
तेरी सदाने ख़ामोशीके सूरको बिखेर दिया ,
तय ना कर पाए की तेरे बिरहमें इन्तेहाँ थी प्यार की ,
या तुम्हारे आने पर .....

14 मई 2011

जीना इसीका नाम है ....

दीप हॉस्पिटलसे बाहर आया ...
उसने पास के कचरेके बड़े डब्बेमें सारे रिपोर्ट फेंक दिए । बस जो याद रखना था वो सिर्फ एक ही बात थी । उसके पास सिर्फ छ महीने की जिंदगी मुश्किलसे बची है ...और कोई है नहीं जिंदगीमें जिसे उसकी कोई फ़िक्र हो या उसकी जिंदगीमें दीप के होने ना होने से फर्क पड़े ...पापा नहीं थे ..भाई भाभी अमेरिकामें गए तो सात साल में कभी वतन का रुख नहीं किया ...माँके लिए बड़ा भाई सब कुछ था .....
इस रिपोर्ट को रख कर क्या करे ???? हां एक बुआके घर पर रहता था यहाँ बेंगलुरुमें ...अब उसने कुछ और नहीं सोचा ....बुआ जी से कहा कंपनी मुझे छ महीनेकी ट्रेनिंग के लिए जर्मनी भेज रही है ...थोडा पेकिंग करके निकल गया ...सीधा कोलकाता .....
कंपनीसे तबादला भी पहले ही मांग लिया था जो इसी वक्त हुआ ...बुआ को कह दिया की अब जर्मनी से पहले कोलकाता शिफ्ट हो रहा है ....बस एक कड़ी भी टूट गयी .....वहां मेट्रो में जाते वक्त उसकी मुलाकात मितालीसे हुई .एक बेहद हंसमुख लड़की ....एक नर्सरी स्कुलकी टीचर थी ...और शनिवार को एक विकलांग बच्चोकी स्कुलमें जाती थी ....उसने उस स्कुल का पता लिया ..एक शनिवार दीप भी वहां गया ...उधर दर्दसे कराहती जिंदगी थी पर उसमे आंसू नहीं थे ...उन छोटे बच्चोने कमजोरी को स्वीकार करते हुए जीना सिख लिया था ...वो लोग बड़े खुश थे ...बस फिर क्या था !!! दीप ऑफिससे सीधे इधर आकर इन बच्चोके साथ दो घंटे बिताकर ही जाता था ...वहांके ट्रस्टीने भी उसे इजाजत दी ...वो सुबहमें जल्दी उठता था ...उसने एक वृध्धाश्रममें जाना शुरू किया ...जरुरतमंद वृध्धलोग को वो चिठ्ठी लिख देता , उनके लिए चीजें लेकर जाता ...उनकी दवाई ,डॉक्टर के पास ले जाना ये सब उसे बहुत भा गया ...उसकी जिंदगी दौड़ने लगी ...उसे अपनी बीमारी भी याद नहीं आती थी ....
पर वहां के एक स्कुलके ट्रस्टी से ये बात नहीं छिपी की एक इंसानियत का उम्दा काम ये छब्बीस साल का लड़का कितनी लगनसे करता है ...मितालीका एक अच्छा दोस्त बन गया ..रविवार शाम दोनों मिलते और बहुतसे बातें भी करते .....
पता नहीं पर मौतकी कगार पर खड़े दीपको जिंदगीकी जरुरत महसूस होने लगी ...ये चार महीने में पूरी तरह बदली जिंदगीसे वो प्यार करने लगा ....उसके कितने सारे अपने थे जिनको उसकी जरुरत थी ????? वो जिंदगी उनके लिए चाहने लगा ...पर अब बीमारी रंग दिखाने लगी .......वो ट्रस्टी श्री जमनादास एक दिन उसके घर आये और बताया उसे कोलकाताकी महानगर पालिकाने निस्वार्थ नगरसेवक के ख़िताब के लिए चुना है ....
बस बुझते हुए दिएमें और तेल बाकी ना था ...एक सुबह वो उठा ही नहीं ....ना कोई दुःख ना पीड़ा ...बस सुबह दूधवाला आया ...उसने दरवाजा न खोला तो पास पडोसीको जगाया ...और पता चला पंछी तो दूर दूर उड़ गया ...एक चिठ्ठी पड़ी थी पास में ...लिखा था मेरी आँखें और देह मेडिकल कोलेज को दान कर देना ......

उस दिन उस स्कुलका हर बच्चा रो पड़ा ....उस वृध्धाश्रमके हर वृध्ध को जीतना गम उनके अपने संतानका घर छोड़ने का नहीं हुआ था उससे कई ज्यादा आंसू ये दीप दे गया ......उसकी जमापूंजी सारी उसने अनाथाश्रम और वृध्धाश्रमको आधी आधी बाँट दी थी ......
बस मिताली उसकी तस्वीर ले गयी ...उसके मुंहसे ये स्वर निकले जीना इसीका नाम है ....

मुझमे एक बच्चा ...



कुछ रुका रुका सा वक्त है ,
पल भी चलती है सुस्ता सुस्ता कर ,
नींद को भी जाते हुए आँखोंसे आलस आती है ,
पलकोंभी खुलनेमें सुस्ती महसूस होती है ,
पता नहीं सूरजको

इन दिनों आनेकी क्यों इतनी जल्दी मची रहती है !!!!

फिर भी ये रुका रुका सा वक्त कितना जल्दी चला गया ????

स्कुलके हमारे वेकेशन बच्चों के वेकेशन बन गए ???कब ???

हमारे खट्टी आम को चुसना

हमारे बच्चोके लिए रसना सिरप बन गया ???कब ??

हमारे कंचे और गिट्टीओ को

तब्दील होते देखा विडिओगेम्समें ....

और चड्डी बनियान और समीज को

बरमूडा और केप्री में बदलते देखा ....

फिर भी बर्फ का गोला कायम है ...

रात की आइसक्रीम कायम है .....

बगीचोंमें जू के पास भीड़ कम नहीं हुई .....

आज ये सब करके फिर एक बार

बच्चे बन जाने का मज़ा ही कुछ और है .....

11 मई 2011

ख़ामोशी .....



मुझे ख़ामोशी जचती है ,

मुझे ख़ामोशी पचती है ,

क्योंकि वो हरदम मेरे साथ ही रहती है ,

उन अल्फाज़को क्या कहें ?

पल दो पल साथ रहकर फिर

हमें ख़ामोशीके हवाले कर जाए !!!!!!!!!!!

मुझे वो खुबसूरत भी लगती है ,

वो इज़हार कर रहे थे प्यारका ,

हौलेसे उठी हुई नज़रें जुबाँका काम कर गयी ....

हम खफा जो हो गए उनकी इस खुबसूरत खता पर ,

वो मोटी मोटी आँखोंमें लाल डोरे पिरोकर ,

हमारे अंदाज बयाँ कर गयी .......

उनकी मायूसीको बयाँ कर रहा था वो अश्क

खुली खिड़की पर पलकोंकी .....

उनसे मिलाकर नज़रें हमने भी

इश्ककी इनायत अदा कर दी .......


बस एक पर्दा रहा ख़ामोशी का ......



10 मई 2011

एक रात .....

ये गर्म धूप......
बदन झुलसाती हुई ....
जैसे भीतर उबल रहे ज्वालामुखीको ....
पानीमें बदलकर तेज धार बहाने वाली ......
हमें ना जाने क्यों नफ़रत है ये हवासे ????
कोयलको देखो !!!!

गर्मीकी ख़ामोशीको कैसे मीठी आवाज बींधती हुई ....
वो देखो पेड़की टहनीसे लटकी हुई अम्बिया !!!!!
यौवन पुरबहार खिल जाता है उस पर ...
उसकी खटाई पूरी मिठाश बनकर उभर आती है .......
वो चाँद कैसे हुस्नके रंग बिखेरता होगा आसमांकी चुनर पर ,
ये जलवे उन पुरवाइयोंसे सनी रातोमें ही जाना !!!!!
वो बातें करते सितारे महफ़िल सजाते है शबभर ,
वो रात रात भर जागकर काटते प्रेमियोंकी
गुफ्तगूको कोई शायरकी कलममें जाकर सुनाते है .........
एक समाधी लिए हुए वो गर्मीकी रात का खामोश हुस्न ,
जैसे अँधेरी चुनरमें लिपटी हुई एक नयी कहानी .....
सुनोगे ????
बस एक रात उस छत पर जाकर देखो ,

वो चेहरा होगा जिसका दीदार करने तरस गये हो ,
चाँदके आयनेमें उभर कर आएगा .....

9 मई 2011

वो चुपकेसे ......

एक कोनेमें छुपकर पड़ी थी ,
दीवारोंसे सटकर अकेली ,
उसे संभाला दोनों हाथोसे ,पसवारा,
पोंछे उसके आंसू सूखे हुए धुंधले से ....
रेशमसी देह पर चमकते लब्ज़ थे ,
उसकी जिंदगीका पन्ना एक एक करके पलटना ,
जैसे हर पन्ने पर एक नयी बहार नया नज़ारा लिए थी ,
एक कोनेमें जैसे एक रौशनी छुपकर बैठी थी सालोंसे ,
रोशन करते गए मेरे जहनको एक एक पन्ने उसके ,
बस पहले सफे पर प्यार हुआ ,औरों पर बेक़रार हुआ ....
और फिर वो भी चुपके से मेरी जिंदगीमें शामिल थी ......
वो क्या थी क्या बताऊँ ????
एक जिंदगी जो किताबका रूप धरे बैठी थी धुलसे लिपटी हुई ......

8 मई 2011

माँसे मैं तक का सफ़र ....

माँ से मैं तक का सफ़र ........
माँ के गर्भमें उसके खून मांससे सींचकर बनता हुआ एक पिंड ....जिसमे जान है उस माँकी ....ये जानते हुए भी की इस अंशको धरती पर लाते हुए उसकी जान तक का जोखिम है फिर भी वो परवाह नहीं करती ...उसके जीवनका सर्वोत्कृष्ट पल है माँ बनना है ....
बस उसी माँ को एक दिनके लिए लाड दुलार जतानेकी लिए पश्चिमी संस्कृति की ये इजाद है ...मधर्स डे .....मे महीने का दूसरा रविवार ......हम भी इसी रंगमें रंगकर एक दिन उसके नाम कर देते है ...और ये तोहफा हम उसे देते है जिसने अपनी जिंदगी हमारे नाम कर दी है ...उसकी एक संतान हो या दस उसने कभी फर्क नहीं किया ...उसका प्यार कभी नहीं बांटा गया ....उसने हमें अपने वजूद का एहसास दिलाया ...अपने दूधसे हमें सींचा जब हमारे मुंहमें दांत और पेटमे आंत नहीं थे ...कोई संतान इस दूध का कर्ज चुकाती है और किसीके मुंह से ये दूध सुख जाता है ....लेकिन माँ के लिए ये कुछ भी मायने नहीं रखता है ...उसके लिए उसकी संतान की हँसी ही सब कुछ है ...चाहे वो माँ को भूले या याद रखे .....
माँने हमें मैं बनाया ...मैं प्रीति ..मैं ख़ुशी ...मैं राज ...मैं राहुल ...मैं गुड्डी ...मैं आशा ....ये मैं .......
हमें मैं बनाने के लिए कितनी जद्दोजहदसे गुजरना पड़ता है वो हम तभी जान पाते है जब हम खुद माँ या बाप बनते है ....साडी में लिपटी माँ से जींस और कुर्ती पहनी मोम के एहसासमें कोई अंतर नहीं होता ....और धोती कुरता पहने पिताजी से शोर्ट्स और टी शर्ट पहने डेडके एहसासों में भी नहीं होता ....हां पहले के माँ बाप कितने ही मशरूफ क्यों ना हो वो अपने संतानों को खास करके माँ अपना पूरा वक्त देती थी ...लेकिन आजकी वर्किंग वुमन और महत्वकांक्षी डेड ये प्यार खिलौने ,पिज़ा ,बर्गर ,मल्टी प्लेक्स ,पॉकेट मनी में देते है .....लेकिन संतान को तब भी एक लोरी की जरूरत थी माँ के होठोसे निकली और आज भी जरूरत है उन कहानी की जो दादी रात को सुलाते सुलाते परियोंके देश में ले जाया करती थी ...वो बहेन जो भाई को बापू की मार से बचाया करती थी ......वो सायकल जो पिताजी कर्ज लेकर बेटे के लिए ला देते थे .......
आज मैं की अपनी निजी जिंदगीमें फ़ोकट की दखलअन्दाजी करती हुई माँ को वृध्धाश्रम आश्रय देते है ....लेकिन खुद का नाम भी वहां एडवांसमें दर्ज करा दो .....क्योंकि आज कल हर जगह बुकिंग का जमाना है ......जो हमें अपने माँ बाप को देते हुए देखा है हमारे संतानोंने वही वो लोग हमें देंगे ....कांटे बो कर आप फूलों की आशा मत रखना उनसे ....गर चाहते हो उनसे भी प्यार जो बुढ़ापे में सबसे ज्यादा जरूरी है अपनी संतानसे तो अपनी माँ को जरूर प्यार दे ...और हां हमारी माँको अपने पति का स्वाभिमान भी प्यारा है ....पिताजी की इज्जत नहीं करोगे तो माँ चाहते हुए भी तुम्हे कभी प्यार नहीं दे पाएगी .....
माँ से मैं तक का सफ़र हमारी जिंदगी के अंत तक चलेगा जो माँ के बगैर संभव नहीं .........

7 मई 2011

आयनेसे बहते हुए ...

आयनेसे बहते पानी के नीचे दीखते हुए
वो छोटे छोटे कंकर ,
कितने शांतिसे बैठे है ?
जैसे ध्यानमें बैठे योगी ....
रंग सिमटकर पथ्थरो पर बिखरे हुए ,
हमेशा धुलते हुए ,
हमेशा साफ़ ,
हमेशा पाक ,
कुछ सीपियोंको छुपाये ,
कुछ शंख को बजाते ,
बैठे हुए ऐसे ,
दुनियादारी की कोई चिंता ही ना हो जैसे .........

6 मई 2011

डर ...

डरता है दिल उनसे राहोंमें मुलाकात ना हो जाए ,
बड़ी मुश्किलसे भुला पाए है उनकी गलीको हम ,
कहीं फिर कदम उस और ना मुड जाए ,
फिर वो कदम तेरी बेरुखी मेरे दिल को तोड़ जाए ....

5 मई 2011

नाम : निनाद ....

कभी कभी कुछ नाम ऐसे होते है की जो अचानकसे हमारे जहनमें गूंजने लगते है ...एक बहुत ही अलग एहसास जुडा हुआ होता है .....
एक ऐसा ही नाम है निनाद ....बहुत कम याद आता है ...पर जब भी याद आता है मेरी सोच उसके इर्दगिर्द ही घुमती है ...और ऐसे नामकी कोई भी व्यक्ति मेरे जीवनसे ना जुडी हुई है और नहीं आई है ...फिर भी मुझे ये नाम बेहद पसंद है ....निनादका मतलब ऊँचा पहाडी स्वर ...जो सम्पूर्ण लागु कर सकते है पहाडीसे बहते हुए झरनेके सूर पर ... एक एकताल पर बजता हुआ संगीत जो कभी एक सूर भी नहीं चुकता ....वो सारे नज़ारे मेरे जहन में उभरते है जो मैंने देवप्रयाग और कश्मीरके प्रवासमें देखे है ...पहलगामके बीचोबीच बहती लिद्दर नदी उसका उदाहरण है .....निनाद को कभी सुनकर देखो ...जब आधी रात को आप नींदसे जागते हो ...पूरा वातावरण मौनकी चादर लपेटे हुए होता है ...तब आँखे बंदकर खुद के अन्दर झांककर देखो ...अन्दर धीर गंभीर एक आवाज सुनाई देगी ...ॐ ..................
षड्ज ....सारेगामाके साथ सुर का पहेला सूर ..........सूरोंका सरताज है ये .... और निषादमें मुझे विषाद सुनाई देता है ...इस लिए वो नाम कुछ कम पसंद है पर षड्ज आज भी दिल के करीब .....
उतना ही पसंद है दो और नाम ...स्वर और स्वरा ........संगीत मेरे लिए हर मर्ज़ का इलाज है ...जब खूब दुखी हो जाती हूँ तो मेरे पसंदीदा गीत पुरे जोश से पुरे सुर के साथ गाना मुझे पसंद है ...गाने भी मूड से मेच होते है पर लगता है कोई मिल गया एक खुबसूरत साथी सा .......संगीत खनकता है उसमे .....जो लोग मुझे पसंद है उसे मन ही मन में कहती हूँ स्वर या स्वरा .....
प्रीति .......ये मेरा खुद का नाम है ....जिसका अर्थ है प्यार ...दुनिया को आज उसकी जरूरत है ...जिसे देने में ज्यादा मज़ा आता है ...लेकिन सबको ख्वाहिश होती है की वो सबसे मिले और वो भी किसीको दिए बिना .....लेकिन प्रीति ...प्रेम का एहसास है जो हरदम मेरे वजूद के साथ है ......और कहता है मुझे
हर पल यहाँ जी भर जियो जो है समां कल हो ना हो ......

हाँ एक और नाम पसंद है मौन .........
ख़ामोशी ....जहाँ कोई आवाज नहीं होती ..होती है एहसासकी गूंज ...उस गूंज को सुनकर देखो कभी ...उसमे बांसुरी से लेकर वायोलिनके जलवे होते है ....और शोर में कभी खुद में खो जाओ तो आपको जरूर सुनाई देगी ये ख़ामोशी की सदा .....मौन नितांत मौन ......

4 मई 2011

आज फिर एक और जन्मदिन मेरा ...

आज फिर एक बार ....
ये सालने एक और करवट ली ,
कितनी सिलवटे पड़ी है समयकी चादर पर ,
गिनते गिनते उसे आँख की रौशनी थोड़ी धुंधली हो चुकी है ,
ऐनकसे देखने लगे है दुनियाको ,
ठहराव धर लिया है उम्रकी इस बहती नदीने
जो उछलती थी अठखेलियाँ लेती हुई .....
बस एक मक़ाम है ऐसा जहाँ ,
आस कुछ कम है ,संतुष्टि कुछ ज्यादा ,
कुछ खोया है उसका गम नहीं
कुछ पाया है उसकी पागलसी ख़ुशी नहीं ....
कुछ उम्मीदे जीने की वजह छोड़ जाती है ,
कुछ निराशा हमें और मजबूत बना जाती है ......
कई लोगोंसे नए रिश्ते बने ,
गिनकर देखे पुराने कितने रिश्ते मझधारमें बिछड़े ????
जिंदगी कोई आने जाने गम ख़ुशी का हिसाब तो नहीं ,
आँखोंसे ओज़ल कोई हो गर ,
पर दिलकी यादोंसे लापता तो नहीं .....
बस एक चैन एक सुकून लेने की चाह बदस्तूर है ,
एक अकेली राह पर चुपचाप ,
वक्त की बाहें थामकर चुपचाप चलती रहूँ ...चलती रहूँ .......

3 मई 2011

चाँद की तश्तरी



चाँदकी तश्तरी सजी थी आसमांकी मेज पर ,

एक तस्वीर बनाकर चाँदकी

सजा दी रातकी दीवारों पर ,

रात हंस पड़ी ,तारे खिल गए मुस्कराहटसे ,चाँद भी शरमा गया ....

पूनम का था या चौदहवी का ये तो नहीं मालूम ,

फिर भी फिजामें कोई सूर बिखरने लगा ....

ये आफताबकी गर्मी थी

फिर भी माहताब पिघलता चला ,

बस इंतज़ारमें आफ़ताबके

ये चाँद निगोड़ा क्यों जलने लगा ?????

उसकी लपटोंसे टपक टपक शबनम ,

तकिये को भिगाने लगी ,

मुझे भी कोई याद आ गया इस तरह ,

मैं भी चांदनीके संग जलने लगी .....

गुलमहोर

गुलमहोर
शायद इस गर्मीमें मुझे इससे प्यार हो गया ....बचपनसे उसके साये में चली थी ...कूदती मचलती चलती रही थी ...पर आसमांमें देखनेकी आदत ना थी उन चुलबुली राहों पर ....छोटी छोटी तितलियाँ लुभाती थी मुझे बेतहाशा ...बड़ी बड़ी झाड़ियोंमें बिना सांप बिच्छुके डरे बस तितलियोंके पीछे दौड़ना .......
पर हां इस गर्मी में पसीनेसे तर होकर मैं बस थोडा सामान भरा हुआ थैला लेकर सड़क पर गुजर रही थी ...मेरी नज़र सामने एक गुलमहोर के पेड़ पर पड़ी ...उसके ऊपर गुलमहोरके एक नहीं कई गुलदस्ते खिले हुए हँसते हुए नज़र आये ...मेरे कदम कुछ पल के रुक गए ...मेरे चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी ....लेकिन फिर मेरे पिताजी के घर में छत पर बैठे हुए मेरी नज़र फिर एक ऐसे ही पेड़ पर ठहर गयी ...सुबह उठकर उससे नज़र से बात करती ...वो बहती हवा के साथ अपनी टहनी झुलाते हुए मेंरा सलाम कुबूल कर लेता .....
एक सोच आई उस वक्त .......
हम ग्लोबल वोर्मींग जैसे मसलो को चर्चा का विषय बनाकर एक वातानुकूलित कमरेमें बहस करते है....पर ये गुलमहोरके खिलने का तो वक्त ही है ये कड़ी धुप ही है ...जितनी कड़ी धुप उतना ही उसका हुस्न निखरता है ....खट्टे स्वादकी उसकी पंखुड़िया कभी कभी रस्ते पर से चुनकर खाने का मजा भी लिया है .....उसके कई पेड़ मेरे घर के पाससे गुजरते रास्तों पर थे वो याद आ गए ......
वैसा ही हमारे बीच रहते कुछ इंसानोंके साथ भी होता है ....वो जिंदगीकी कड़ी धुप जैसी परीक्षा की घडी में भी हमेशा हसते रहते है ...जिंदगी की कड़ी धुपसे वो और खिल जाते है ...हम उनके जैसे बनना जरूर चाहते है पर उन कड़ी धुप को झेलना नहीं चाहते ....
जिंदगीकी गर्मी से कड़ी धुपसे कुछ ऐसे लड़ा जाए ,
कड़ी धुपमें एक हरे भरे पेड़ की टहनी पर गुलमहोर बनकर खिला जाए ....

2 मई 2011

वो फिसल गया ...

एक सुन्दर सपना था ,
पलकोंसे निकला था ,
उसे दुनिया देखनी थी ,
उसका पैर फिसल गया ....
वो जमीं पर गिर गया ,
वो बैठे बैठे रोने लगा ,
उसके आंसू फर्श पर गिर गए ,
वो तो मोती बन गए ,
सपना हंस दिया ,
उसने कहा देखो आंसू ने मोती दिया ,
उसने बिलकुल सच कहा ....
इंसानकी हँसी बनावटी चाहे जो है ,
मोती बनने वाले आंसू तो सच्ची के होते है ....

1 मई 2011

खिड़की खुली

ख़ामोशीकी सदा कुछ बोल पड़ी ,
खोली सुबहमें जब बंद खिड़की मेरी ,
मेरी हँसी खिल पड़ी ,
वो घर जो मेरा है ,
वहां मेरी आँखे खुली है फिर से ,
फिरसे एक ताज़ा हवा के झोंकेके संग
मैं भी हौले हौले उड़ चली .....
बहुत कुछ दिल पर है लिखा ,
पर क्या करूँ अल्फाज़ मेरे खेल रहे है आज
मुझ संग आँख मिचोली ,
ठहरो थोड़ी देर आज तुम भी ...
उन्हें पकड़ कर मैं वापस लौटती हूँ ......