कल का मेच !!!!!
सलाम इंडिया .....
वो ग्यारह थे ,
पर उनके साथ और एक अबज और दस करोड़ थे .......
जूनून मैदानके अन्दरसे ज्यादा मैदानके बाहर था ....
जूनून मोहालीकी सरहदोंके पार सारे देशमें था ....
कल देशके लिए दीवाली थी ,
पटाखें रात सजाकर चली गई ,
और आँखोंसे नींद चुराकर चली गयी ,
भारत देश को क्रिकेट धर्मसे जोड़ कर चला गया .....
जिंदगी मेरे लिए ख्वाबोंके बादल पर उड़नेवाली परी है .!! जो हर पल को जोड़ते हुए बनती है, और उन हर पलोंमें छुपी एक जिंदगी होती है ....
31 मार्च 2011
30 मार्च 2011
वो चले गए
वो चले गए चुपचाप मेरी जिंदगीसे
जैसे एक दिन चुपकेसे सरकता है
शाम की बाँहोंसे सरकता रातकी बाहोंमें ,
पर दिन की उस तपिश को
जिस्ममें महसूस कर रही हूँ अब तक ....
वो कभी जा नहीं सकते ऐसे ....
कहते है पूछते है कैसे है हाल हमारे ?
कोई जाकर बता दे उन्हें भी
जिन्दा लाशें बोला नहीं करती ....
जैसे एक दिन चुपकेसे सरकता है
शाम की बाँहोंसे सरकता रातकी बाहोंमें ,
पर दिन की उस तपिश को
जिस्ममें महसूस कर रही हूँ अब तक ....
वो कभी जा नहीं सकते ऐसे ....
कहते है पूछते है कैसे है हाल हमारे ?
कोई जाकर बता दे उन्हें भी
जिन्दा लाशें बोला नहीं करती ....
शुक्रिया
तेरे साथ कटे हर पल एक सपने सा लगा ,
एक सपने सी जिंदगी सच करने के लिए शुक्रिया....
मेरे हमनवा ,हमसफ़र.......हमकदम .....
एक सपने सी जिंदगी सच करने के लिए शुक्रिया....
मेरे हमनवा ,हमसफ़र.......हमकदम .....
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अन्दाजें बयाँ
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29 मार्च 2011
उसके आने की आह्ट ...
दरख्तों पर पत्ते किवाड़ें खोलकर बैठे थे ,
हवाके झोकोंसे उडा हुआ एक खाली लिफाफा उडा ,
बैठा उस डाली पर जैसे उसके खुलनेकी ख़ुशी का इजहार कर रहा ,
एक बेबस लाचार खड़ा रहा भरी धूपमें उस लिफाफे के गिरने के इंतज़ारमें ,
उस लिफाफे पर माशूका के उंगलीके निशाँ थे ,
उस लिफाफेमें उसकी हयात की खुशबू थी .....
हवाके झोकोंसे उडा हुआ एक खाली लिफाफा उडा ,
बैठा उस डाली पर जैसे उसके खुलनेकी ख़ुशी का इजहार कर रहा ,
एक बेबस लाचार खड़ा रहा भरी धूपमें उस लिफाफे के गिरने के इंतज़ारमें ,
उस लिफाफे पर माशूका के उंगलीके निशाँ थे ,
उस लिफाफेमें उसकी हयात की खुशबू थी .....
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अन्दाजें बयाँ
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28 मार्च 2011
आवाज का चेहरा ...
क्या देखा है कभी आवाज का चेहरा ????
हाँ ये आवाज का भी एक चेहरा होता है ....
मैंने देखा है उसे ....
कभी खिलखिलाकर हँसता हुआ ...
कभी दर्दसे सिसकता हुआ ....
कभी खामोश खड़ा हुआ ....
कभी गहराई में डूबा हुआ ....
कभी लहरोंसा जो साहिल पर टकराती है ,
कभी भौरोंकी गुंजन सा ...
उसकी कोई उम्र नहीं होती ,
उसके चेहरे पर कोई लकीरें नहीं होती ,
उसकी उम्र जिस्मकी उम्रसे परे होती है ,
वो इंसानके मिजाज़ का अक्स होती है ...
वो कभी सिर्फ सुनती रहती है ,
कभी कुछ कहती रहती है ,
कभी आँखोंके हथियार का इस्तेमाल भी करती है ,
कभी वो तलवार की धार भी बन जाती है ....
वो एक चेहरा है ,
जो हम खुद की कल्पनामें सजाकर रखते है ...
वो एक चेहरा है ,
कभी दूर सरकता हुआ ,कभी खुद की साँसोंको कान में गर्माता हुआ ...
26 मार्च 2011
दर्द के चर्चे
रातकी हर करवट एक सिलवट बनाती गयी ,
मेरे खयाल को मढ़ दिया हर सिलवट पर .....
================================
दर्द की काली स्याही को
बिदा कर दिया दुल्हनके सुर्ख जोड़े में सजाकर ....
=================================
नश्तरसे गुजरती हर गलीमें तेरी बेवफाई के चर्चे थे ,
रास्ता पूरा टूटे हुए दिलों की किरचोंसे सजा हुआ था ....
==================================
अफ़साने तो लिखे थे वफ़ाके शहरकी हर दीवार पर ,
पर हर अफसाना अधुरा था मेरा तेरे नाम के बगैर ....
मेरे खयाल को मढ़ दिया हर सिलवट पर .....
================================
दर्द की काली स्याही को
बिदा कर दिया दुल्हनके सुर्ख जोड़े में सजाकर ....
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नश्तरसे गुजरती हर गलीमें तेरी बेवफाई के चर्चे थे ,
रास्ता पूरा टूटे हुए दिलों की किरचोंसे सजा हुआ था ....
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अफ़साने तो लिखे थे वफ़ाके शहरकी हर दीवार पर ,
पर हर अफसाना अधुरा था मेरा तेरे नाम के बगैर ....
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अन्दाजें बयाँ
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बिन तेरे
तुमने सोचा होगा तेरे बिन हम ना जी पाएंगे !!!
भ्रम छोडो हम अकेले चाय नहीं साथ भजिया भी खायेंगे ....
बिन तेरे खिटपिट करने वाला कोई होगा नहीं
तो रोज सुबह नौ बजे तक हम चैन से सो तो पाएंगे ....
बिन तेरे कौन रोकेगा हमें लेट नाईट मूवी देखने से
यारोदोस्तोंकी टोली में देर रात तेज बाईकिंगका मज़ा भी लेकर आयेंगे ....
बिन तेरे डायेट की भी छुट्टी होगी कुछ दिन तो
जी भर के पिज़ा ,वेफर्स ,चोकलेट ,आइसक्रीम ,हलवा जलेबी कजुकतरी खायेंगे .....
बिन तेरे मोबाइल को रखेंगे हम साइलेंट मोड़ पर ही
चलो अब तो ऑफिस में हम काम तो ठीक से कर पाएंगे ....
भ्रम छोडो हम अकेले चाय नहीं साथ भजिया भी खायेंगे ....
बिन तेरे खिटपिट करने वाला कोई होगा नहीं
तो रोज सुबह नौ बजे तक हम चैन से सो तो पाएंगे ....
बिन तेरे कौन रोकेगा हमें लेट नाईट मूवी देखने से
यारोदोस्तोंकी टोली में देर रात तेज बाईकिंगका मज़ा भी लेकर आयेंगे ....
बिन तेरे डायेट की भी छुट्टी होगी कुछ दिन तो
जी भर के पिज़ा ,वेफर्स ,चोकलेट ,आइसक्रीम ,हलवा जलेबी कजुकतरी खायेंगे .....
बिन तेरे मोबाइल को रखेंगे हम साइलेंट मोड़ पर ही
चलो अब तो ऑफिस में हम काम तो ठीक से कर पाएंगे ....
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हँसी ख़ुशी के पल
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25 मार्च 2011
खुद से मुलाकात
एक मैं ,
एक और मैं ,
खुद के अन्दर खुद को पाया ,
लगता था उससे ही मुझे जीना आया ....
बिलकुल अलग थी मैं ,
दुनियादारीसे महरूम थी मैं ,
अकेली एक खिड़की के बहार क्षितिजको तकती हुई ,
बाहर आसमां खड़ा था बाहें फैलाकर ,
मुझमे ना कोई रंजोगम था ना खुशियोंकी सौगात ,
बस हर पल में जिन्दा थी ,हर पर को जी भर के जीते हुए ,
हर रिश्ते नाते से कोसो दूर ....
खुद के साथ ,खुद के पास ,
खुद की दोस्त ,और कभी खुद की दुश्मन भी ....
खुद से बाते थी ,ये महज एक मुलाकात थी या उसका दौर ,
ये जानू ना मैं ,
पर हां लौटने से पहले एक वादा कर लिया ,
हम साथ साथ ही रहेंगे यूँही ...हमेशा ...दीखते नहीं पर छुपकर ....
एक और मैं ,
खुद के अन्दर खुद को पाया ,
लगता था उससे ही मुझे जीना आया ....
बिलकुल अलग थी मैं ,
दुनियादारीसे महरूम थी मैं ,
अकेली एक खिड़की के बहार क्षितिजको तकती हुई ,
बाहर आसमां खड़ा था बाहें फैलाकर ,
मुझमे ना कोई रंजोगम था ना खुशियोंकी सौगात ,
बस हर पल में जिन्दा थी ,हर पर को जी भर के जीते हुए ,
हर रिश्ते नाते से कोसो दूर ....
खुद के साथ ,खुद के पास ,
खुद की दोस्त ,और कभी खुद की दुश्मन भी ....
खुद से बाते थी ,ये महज एक मुलाकात थी या उसका दौर ,
ये जानू ना मैं ,
पर हां लौटने से पहले एक वादा कर लिया ,
हम साथ साथ ही रहेंगे यूँही ...हमेशा ...दीखते नहीं पर छुपकर ....
24 मार्च 2011
हम लौट आये ...
एक नयी दिशामें जाना था ,
वो पुराना चेहरा दिख गया ,
उसके पीछे खींचे चले गए ,
और लौटकर हम फिर घर आ गए ....
वो पुराना चेहरा दिख गया ,
उसके पीछे खींचे चले गए ,
और लौटकर हम फिर घर आ गए ....
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अन्दाजें बयाँ
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जिंदगी और सपना
सच कहूँ कभी जिंदगी सपना लगती है ,
और कभी सपनेमें जी लेती हूँ ,
चाहती हूँ जो भी कुछ सब मिलना मुमकिन नहीं ,
बस सपनेमें सब वो पा लेती हूँ ...
पर ये भी सच है ,
की मुझे ये वरदान लगा की
मेरी जिंदगी एक सपना नहीं
और सपना मेरी जिंदगी नहीं
जुदा है दोनों इस लिए दोनों प्यारे है ,
वर्ना ये जिंदगी कितनी अधूरी हो जाती !!!!!
मेरे सपनोंकी परी सिर्फ मुझे दिखती है ,
मेरे सपनो का डर सिर्फ मुझे सताता है ,
मेरे सपने मुझे हंसा देते है कभी
कभी कोई सपना मुझे रुलाता है ....
येही सपना मेरे जिंदगी का हौसला बन जाते है ,
मिलते है कभी रातों के नुक्कड़ पर बैठे हुए
और जिंदगी की राह को दिखाकर ओज़ल हो जाते है ,
मेरे बुलाने पर भी कभी लौट नहीं आते
पर जिंदगीकी डगर पर कोई अपना बन मिल जाते है ....
और कभी सपनेमें जी लेती हूँ ,
चाहती हूँ जो भी कुछ सब मिलना मुमकिन नहीं ,
बस सपनेमें सब वो पा लेती हूँ ...
पर ये भी सच है ,
की मुझे ये वरदान लगा की
मेरी जिंदगी एक सपना नहीं
और सपना मेरी जिंदगी नहीं
जुदा है दोनों इस लिए दोनों प्यारे है ,
वर्ना ये जिंदगी कितनी अधूरी हो जाती !!!!!
मेरे सपनोंकी परी सिर्फ मुझे दिखती है ,
मेरे सपनो का डर सिर्फ मुझे सताता है ,
मेरे सपने मुझे हंसा देते है कभी
कभी कोई सपना मुझे रुलाता है ....
येही सपना मेरे जिंदगी का हौसला बन जाते है ,
मिलते है कभी रातों के नुक्कड़ पर बैठे हुए
और जिंदगी की राह को दिखाकर ओज़ल हो जाते है ,
मेरे बुलाने पर भी कभी लौट नहीं आते
पर जिंदगीकी डगर पर कोई अपना बन मिल जाते है ....
23 मार्च 2011
याद कर लिया ऐसे की
आज सुबह एक लिफाफा आया ,
कुछ पुरानी पहचान की याद दे गया ,
खोला ,
एक कोरा कागज़ था ,
ऊपर मेरा नाम था ,
पूरा सफा बिना लिखा कुछ भी ,
नीचे एक नाम था ......
हलकेसे धुंधला सा चेहरा उभरा !!!!
पलक पर एक हलकी सी परत थी अश्क की .....
चुपकेसे फुसफुसाया और कहा ,
तुम्हे याद न करने इलज़ाम भी सर आँखों पर ,
क्योंकि तुम्हे भुला देने की खता ना कर पाए हम ....
ओज़ल आँखोंसे जो हो गए
पर दिलसे उसकी याद को ओज़ल ना कर पाए हम ........
मेरी आँखसे एक आंसू टपक गया ,
उसने अपने नाम पर धर लिया
अल्फाज़ जो लिखे थे फ़ैल गए कोरे सफे पर फिर से ,
उसमेसे मेरा नाम उभरा ....
कुछ पुरानी पहचान की याद दे गया ,
खोला ,
एक कोरा कागज़ था ,
ऊपर मेरा नाम था ,
पूरा सफा बिना लिखा कुछ भी ,
नीचे एक नाम था ......
हलकेसे धुंधला सा चेहरा उभरा !!!!
पलक पर एक हलकी सी परत थी अश्क की .....
चुपकेसे फुसफुसाया और कहा ,
तुम्हे याद न करने इलज़ाम भी सर आँखों पर ,
क्योंकि तुम्हे भुला देने की खता ना कर पाए हम ....
ओज़ल आँखोंसे जो हो गए
पर दिलसे उसकी याद को ओज़ल ना कर पाए हम ........
मेरी आँखसे एक आंसू टपक गया ,
उसने अपने नाम पर धर लिया
अल्फाज़ जो लिखे थे फ़ैल गए कोरे सफे पर फिर से ,
उसमेसे मेरा नाम उभरा ....
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अन्दाजें बयाँ
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22 मार्च 2011
वादा किया है उसने ...
बस एक बार फिर चाँद .....
====================
एक सफा है सफ़ेद एक एक टुकड़ा जुड़कर बनता है ,
एक गोल माँ के हाथ की रोटी सा ,
थोड़ीसी कथ्थई लकीरोंसे सजा संवारा हुआ ....
जब पूरा गोल बनता है ,
अपनी ठंडी छुरीसे ये प्रेमियोंके दिलों पर छुरी चलाता है ,
उन बारीक़ एहसासोंकी गुथ्थियाँ उलज़ाता है ,
जगती आँखोंके लाल लकीरोंमें उभरती है जो
उसकी धुंधली तस्वीरसे गुफ्तगू करते एक और रात गुजर गयी ,
चुप रहने की कसम थी पर छलकती चांदनी
कुछ कानोंमें भर गयी ....
धीरे धीरे चाँद का गोल टुकड़ा धीरे धीरे बहने लगा ,
थोडा थोडा करके घटने लगा ,
अब वो तनहाई की रात आ गयी ,
फिर उसके इंतज़ार की बात आ गयी ....
ठहरी हूँ यहीं पर एकटक तकते आसमां को रात में ,
उसने फिर आने का वादा जो किया है ...
====================
एक सफा है सफ़ेद एक एक टुकड़ा जुड़कर बनता है ,
एक गोल माँ के हाथ की रोटी सा ,
थोड़ीसी कथ्थई लकीरोंसे सजा संवारा हुआ ....
जब पूरा गोल बनता है ,
अपनी ठंडी छुरीसे ये प्रेमियोंके दिलों पर छुरी चलाता है ,
उन बारीक़ एहसासोंकी गुथ्थियाँ उलज़ाता है ,
जगती आँखोंके लाल लकीरोंमें उभरती है जो
उसकी धुंधली तस्वीरसे गुफ्तगू करते एक और रात गुजर गयी ,
चुप रहने की कसम थी पर छलकती चांदनी
कुछ कानोंमें भर गयी ....
धीरे धीरे चाँद का गोल टुकड़ा धीरे धीरे बहने लगा ,
थोडा थोडा करके घटने लगा ,
अब वो तनहाई की रात आ गयी ,
फिर उसके इंतज़ार की बात आ गयी ....
ठहरी हूँ यहीं पर एकटक तकते आसमां को रात में ,
उसने फिर आने का वादा जो किया है ...
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अन्दाजें बयाँ
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21 मार्च 2011
ये कहाँ आ गये हम
चाँद के नाम एक और पयगाम ....
कल चाँद बहुत बड़ा था ,
कल चाँदकी चमक भी बहुत थी ....
चाँदके आयने में खुद को देखा ,
दिल खिल गया ,मुझे जैसे हथेली में ही वो मिल गया ...
उसको सिरहाने पर रख मैं मदहोश हो गयी ,
कल फिर गर्म रात में मैं सो गयी ...
सुबह जागी तो घने कोहरे का आलम था ,
ठंडी हवाओंने मुझे कम्बलसे ढका था ,
सोचा कल ये चाँद को ही शरारत सूझी होगी ,
उठाकर मुझे खुद की बाँहों में सोते ही ,
उसने मुझे किसी पहाडीकी वादियोंमें छुपाइ होगी ...
बस ये ही ख़याल आया ...
ये कहाँ आ गए हम ..यूँही साथ साथ चलकर ????
कल चाँद बहुत बड़ा था ,
कल चाँदकी चमक भी बहुत थी ....
चाँदके आयने में खुद को देखा ,
दिल खिल गया ,मुझे जैसे हथेली में ही वो मिल गया ...
उसको सिरहाने पर रख मैं मदहोश हो गयी ,
कल फिर गर्म रात में मैं सो गयी ...
सुबह जागी तो घने कोहरे का आलम था ,
ठंडी हवाओंने मुझे कम्बलसे ढका था ,
सोचा कल ये चाँद को ही शरारत सूझी होगी ,
उठाकर मुझे खुद की बाँहों में सोते ही ,
उसने मुझे किसी पहाडीकी वादियोंमें छुपाइ होगी ...
बस ये ही ख़याल आया ...
ये कहाँ आ गए हम ..यूँही साथ साथ चलकर ????
18 मार्च 2011
आज उसका इंतज़ार है ....
आज कुछ बोलने का मूड नहीं ,
बात के लिए भी जज्बात चाहिए ,
एक अदद आवाज़ चाहिए ,
उसे सजाने के लिए अल्फाज़ चाहिए ...
कल रात चाँद रो रहा था ...
उसके साथ सितारे भी सिसक रहे थे ....
उनसे रात का जाम टूट गया था ....
टूटे हुए टुकड़े बिखरे थे रातको मेरी छत पर ...
चुभ रहे थे वो मेरे नंगे पाँव को ....
शबनम बरसाकर चाँदने हर झख्म भर दिया ....
शुक्रिया कह दूँ उससे पहले चाँद सितारों के साथ भाग गया ....
आज रात का इंतज़ार है ...
चाँद तेरे मासूम चेहरे को चूम लेना है एक बार फिर ...
बात करनी है आज चाँदसे ,रात को ,खुले आसमांमें ,खुली छतमें ....
बात के लिए भी जज्बात चाहिए ,
एक अदद आवाज़ चाहिए ,
उसे सजाने के लिए अल्फाज़ चाहिए ...
कल रात चाँद रो रहा था ...
उसके साथ सितारे भी सिसक रहे थे ....
उनसे रात का जाम टूट गया था ....
टूटे हुए टुकड़े बिखरे थे रातको मेरी छत पर ...
चुभ रहे थे वो मेरे नंगे पाँव को ....
शबनम बरसाकर चाँदने हर झख्म भर दिया ....
शुक्रिया कह दूँ उससे पहले चाँद सितारों के साथ भाग गया ....
आज रात का इंतज़ार है ...
चाँद तेरे मासूम चेहरे को चूम लेना है एक बार फिर ...
बात करनी है आज चाँदसे ,रात को ,खुले आसमांमें ,खुली छतमें ....
16 मार्च 2011
लो गर्मी आ गयी ...
कल रात सितारोंसे मुलाकात हुई ,
आधे चाँदसे भी मुलाकात हुई ....
उन्हें भी इंतज़ार था मेरे छत पर आने का ,
उनका दिल भी बेक़रार था कुछ बतियाने को ...
रूठकर बैठा था मंगल कह रहा था शनिसे झगडा हो गया था ,
उसने शुक्र को दौड़ते हुए धक्का दे दिया था ....
शांत बैठा शुक्र कहाँ किसीकी मानता है ?
वो तो पश्चिममें उगता शामको फिर सहरमें पूर्वमें नज़र आता है ....
सप्तर्षि के तारे पूरी रात दोड पकड़ खेलते हुए उधम मचाते है ,
उनके शोरगुलसे तंग चंदामामा कई रात तक सो नहीं पाते है ......
रातके पल्लूमें छुपकर ये सब सितारे गप्पागोष्ठीमें वक्त बिताते है ,
अँधेरे के सच्चे साथी बनकर उनके हमसफ़र बन साथ चलते जाते है ....
आधे चाँदसे भी मुलाकात हुई ....
उन्हें भी इंतज़ार था मेरे छत पर आने का ,
उनका दिल भी बेक़रार था कुछ बतियाने को ...
रूठकर बैठा था मंगल कह रहा था शनिसे झगडा हो गया था ,
उसने शुक्र को दौड़ते हुए धक्का दे दिया था ....
शांत बैठा शुक्र कहाँ किसीकी मानता है ?
वो तो पश्चिममें उगता शामको फिर सहरमें पूर्वमें नज़र आता है ....
सप्तर्षि के तारे पूरी रात दोड पकड़ खेलते हुए उधम मचाते है ,
उनके शोरगुलसे तंग चंदामामा कई रात तक सो नहीं पाते है ......
रातके पल्लूमें छुपकर ये सब सितारे गप्पागोष्ठीमें वक्त बिताते है ,
अँधेरे के सच्चे साथी बनकर उनके हमसफ़र बन साथ चलते जाते है ....
14 मार्च 2011
वो आती थी ...
वो मेरे दर पर आती हर वक्त ,
मुझे सताती हर वक्त ,
मुझे छेड़ छुप जाती हर वक्त ,
मैं उस पर गुस्से ही रहता हर वक्त ....
फिर भी हर दिन की सुबह उसका इंतज़ार लेकर आ जाती ,
फिर भी मेरा दिल खिल जाता उसके जाने के बाद ,
मेरा चेहरा हंस देता उसके छेड़ने के बाद ,
फिर भी उसके सताने का इंतज़ार करता गुस्सा दिखाने के लिए ...
एक दिन ....
एक दिन ....
वो मेरी गली आना भूल गयी ...
मेरी आँखें तड़प गयी उसके दीदार को ,
मेरे कान तड़प गए उसकी शरारत को ,
फिर भी ना आई मेरे लाख बुलाने पर ,
हार कर एक दिन उसके घर गया ....
देखा उसकी मैयत सजी है डोली की जगह ,
वो लम्बे अनजान सफ़र पर चली गयी मुझे छोड़कर ....
काश ...काश ....काश .....
उसकी हयातमें ही समज जाता की बिना उसके जिंदगी क्या होगी ??
अब तो सिर्फ तेरी तस्वीर से ही तड़प दिल की बयां होगी ....
मुझे सताती हर वक्त ,
मुझे छेड़ छुप जाती हर वक्त ,
मैं उस पर गुस्से ही रहता हर वक्त ....
फिर भी हर दिन की सुबह उसका इंतज़ार लेकर आ जाती ,
फिर भी मेरा दिल खिल जाता उसके जाने के बाद ,
मेरा चेहरा हंस देता उसके छेड़ने के बाद ,
फिर भी उसके सताने का इंतज़ार करता गुस्सा दिखाने के लिए ...
एक दिन ....
एक दिन ....
वो मेरी गली आना भूल गयी ...
मेरी आँखें तड़प गयी उसके दीदार को ,
मेरे कान तड़प गए उसकी शरारत को ,
फिर भी ना आई मेरे लाख बुलाने पर ,
हार कर एक दिन उसके घर गया ....
देखा उसकी मैयत सजी है डोली की जगह ,
वो लम्बे अनजान सफ़र पर चली गयी मुझे छोड़कर ....
काश ...काश ....काश .....
उसकी हयातमें ही समज जाता की बिना उसके जिंदगी क्या होगी ??
अब तो सिर्फ तेरी तस्वीर से ही तड़प दिल की बयां होगी ....
जापान ...
ना तो कुछ बताकर आती है ,जब आती है दबे पाँव आती है ,
वो नाच है खौफनाक मौतकी जब वो धरती फाड़कर आती है ......
जलके तरंगो पर सवार होकर हर लहर तबाही को लेकर किनारे आया ,
ये ताकतवर इंसान को सिर्फ बेबस और लाचार बनाकर जाती है ....
एहसास हो गया अब की जो तरक्की के सामान जुटाए थे हमने ,
वही हमारी कब्र की तरह खुलते हुए नज़र आये है .......
हर उंचाई पर ठहरा हुआ वो इंसान पलमें ही जमीं पर आ जाता है ,
जिसे कहते है जलजला कहर बनकर वो धरती को हिलाकर जाता है .....
संभल जा ए आदमी ,अब तो जी और जीने दो की कसम खाले ,
ये दुनिया बनी है जीने के लिए उसे कब्रस्तान होने से बचा ले .......
हर जनम के साथ एक पौधा उगा ले ,हर मृतकी याद में एक पेड़ लगा दे ,
हवाई जहाजमें बेवजह उड़ना छोड़ दे दोस्त ,
सायकलसे अपना दोस्ताना बढा दे .....
पोलीथिनकी बेग में अपनी मौत को मत सजा दोस्त ,
कभी कपडेकी थैली में अपना सामान उठा ले ......
आने वाली मौत को नहीं टाल सकते देर हो चुकी है ,
जिंदगी राह को इस तरह थोड़ी दूर तक लम्बी बना दे ........
वो नाच है खौफनाक मौतकी जब वो धरती फाड़कर आती है ......
जलके तरंगो पर सवार होकर हर लहर तबाही को लेकर किनारे आया ,
ये ताकतवर इंसान को सिर्फ बेबस और लाचार बनाकर जाती है ....
एहसास हो गया अब की जो तरक्की के सामान जुटाए थे हमने ,
वही हमारी कब्र की तरह खुलते हुए नज़र आये है .......
हर उंचाई पर ठहरा हुआ वो इंसान पलमें ही जमीं पर आ जाता है ,
जिसे कहते है जलजला कहर बनकर वो धरती को हिलाकर जाता है .....
संभल जा ए आदमी ,अब तो जी और जीने दो की कसम खाले ,
ये दुनिया बनी है जीने के लिए उसे कब्रस्तान होने से बचा ले .......
हर जनम के साथ एक पौधा उगा ले ,हर मृतकी याद में एक पेड़ लगा दे ,
हवाई जहाजमें बेवजह उड़ना छोड़ दे दोस्त ,
सायकलसे अपना दोस्ताना बढा दे .....
पोलीथिनकी बेग में अपनी मौत को मत सजा दोस्त ,
कभी कपडेकी थैली में अपना सामान उठा ले ......
आने वाली मौत को नहीं टाल सकते देर हो चुकी है ,
जिंदगी राह को इस तरह थोड़ी दूर तक लम्बी बना दे ........
13 मार्च 2011
हमकदम
चलो आज कुछ कदम साथ चले ,
चलो आज एक हवाको साँसोंमें भरे ,
चलो आज एक नज़रसे मंजिलको देखे ,
चलो आज एक दृष्टिसे एकदुसरे को सोचे ,
चलो आज फिर एक गाना गुनगुनाये ,
चलो आज फिर एक लम्बी ख़ामोशी पाए ,
चलो आज फिर खुली छत के नीचे सो जाए ,
एक कहानी सुने जो सारी रात सितारें हमें सुनाये ,
जीवन साथी बन तो जाते है हमसफ़र ,
एक बस इतनी सी इल्तजा है हमारी
आज हमकदम हमसोच बनकर जी जाए ....
कल सहर शायद ये रास्ता जुदा हो जाए तो भी गम नहीं ,
हमारी यादोंमें इस दिनमें हम साथ साथ खो जाए ...
चलो आज एक हवाको साँसोंमें भरे ,
चलो आज एक नज़रसे मंजिलको देखे ,
चलो आज एक दृष्टिसे एकदुसरे को सोचे ,
चलो आज फिर एक गाना गुनगुनाये ,
चलो आज फिर एक लम्बी ख़ामोशी पाए ,
चलो आज फिर खुली छत के नीचे सो जाए ,
एक कहानी सुने जो सारी रात सितारें हमें सुनाये ,
जीवन साथी बन तो जाते है हमसफ़र ,
एक बस इतनी सी इल्तजा है हमारी
आज हमकदम हमसोच बनकर जी जाए ....
कल सहर शायद ये रास्ता जुदा हो जाए तो भी गम नहीं ,
हमारी यादोंमें इस दिनमें हम साथ साथ खो जाए ...
12 मार्च 2011
काफी था ....
बहार का इंतज़ार हमें तब तक रहा
बस तेरे आने का पयगाम ही काफी था ....
हयाके अंदाज़ को कैसे बयां कर पाएंगे ??
तेरी पलकोंकी चिलमन झुक जाना मेरे लिए काफी था ....
प्यास के एहसास क्या है ये नहीं जाना हमने
तेरे बंद किवाड़ोंको तकते रहना ही काफी था ....
चाँदको नहीं देखा कभी आसमांमें उड़ते हुए ,
तेरे चेहरे का दीदार करना मेरे लिए तो काफी था ....
जिन्दा रहते है इन आती जाती साँसोंसे ये सुना था ,
पर तेरे खयालके आते मेरे दिल का धडकना ही काफी था ....
इश्कको समजने की जुर्रत कैसे करें हम ?
तेरा नाम ही लेना काफी था ....
बस तेरे आने का पयगाम ही काफी था ....
हयाके अंदाज़ को कैसे बयां कर पाएंगे ??
तेरी पलकोंकी चिलमन झुक जाना मेरे लिए काफी था ....
प्यास के एहसास क्या है ये नहीं जाना हमने
तेरे बंद किवाड़ोंको तकते रहना ही काफी था ....
चाँदको नहीं देखा कभी आसमांमें उड़ते हुए ,
तेरे चेहरे का दीदार करना मेरे लिए तो काफी था ....
जिन्दा रहते है इन आती जाती साँसोंसे ये सुना था ,
पर तेरे खयालके आते मेरे दिल का धडकना ही काफी था ....
इश्कको समजने की जुर्रत कैसे करें हम ?
तेरा नाम ही लेना काफी था ....
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11 मार्च 2011
संतृप्त सा ....
आज आयनेमें सुबह देखा ,
सिर्फ एहसास दिखे चंद अल्फाज़ लिए थे ,
शरमाते ,अंगडाई लेते ,मुस्कुराते ,खिलखिलाते
बाहें फैलाये खड़े थे सामने मेरे ,
छूकर देखा उन्हें हौलेसे ,
छुईमुई से सिमट गए ....
ऊँगली से स्पर्श किया तो गरमा गए ,
पसीनेसे तर हो रहे थे ....
ना सुबह की ऑस छलक रही थी अल्फाजोंके चेहरे पर ,
उस बूंद को सहज कर एक पयमानेमें ,
पी लिया ...
फिर उन्हें देखा
तो उनके चेहरे पर थी एक आभा
संतृप्ति की ....
सिर्फ एहसास दिखे चंद अल्फाज़ लिए थे ,
शरमाते ,अंगडाई लेते ,मुस्कुराते ,खिलखिलाते
बाहें फैलाये खड़े थे सामने मेरे ,
छूकर देखा उन्हें हौलेसे ,
छुईमुई से सिमट गए ....
ऊँगली से स्पर्श किया तो गरमा गए ,
पसीनेसे तर हो रहे थे ....
ना सुबह की ऑस छलक रही थी अल्फाजोंके चेहरे पर ,
उस बूंद को सहज कर एक पयमानेमें ,
पी लिया ...
फिर उन्हें देखा
तो उनके चेहरे पर थी एक आभा
संतृप्ति की ....
10 मार्च 2011
ख्वाहिश सी
रिवायतोको मंज़ूर करना वो मेरी तक़दीर थी ,
उसे तोडना वो मेरी जरूरत थी ....
चाँद तो नहीं आ सकता मेरे घर पर ,
उसे खिड़कीसे ही देखना मेरी मजबूरी थी .....
अय चाँद कभी जमीं पर भी आकर देखो एक बार ,
ये सागर धो देगा तेरे चेहरे पर दिखते हर दागको ........
उसे तोडना वो मेरी जरूरत थी ....
चाँद तो नहीं आ सकता मेरे घर पर ,
उसे खिड़कीसे ही देखना मेरी मजबूरी थी .....
अय चाँद कभी जमीं पर भी आकर देखो एक बार ,
ये सागर धो देगा तेरे चेहरे पर दिखते हर दागको ........
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8 मार्च 2011
एक चाहत नारी की
एक औरत की चाह :
आज कहते कहते सुनना है अपनी मर्जीसे ,
आज चलते चलते रुकना है अपनी मर्जीसे ...
आज ख़ामोशीको गुनगुनाना है अपनी मर्जीसे ,
आज हँसते हँसते रोना है अपनी मर्जीसे ....
आज ढेरसे सपने देखने सोना है अपनी मर्जीसे ,
आज कुछ सपनों को पाना है जागते हुए अपनी मर्जीसे ...
रोज सूरज पहनाता है मुझे कई रिश्तोंके मुखौटे ,
आज रिश्तोंके सारे मुखौटे उतारकर सिर्फ प्रीति बनकर जीना है अपनी मर्जी से ....
दो साँसोंके बीच कुछ खाली जगहसे इस दिनमें
खुली सांस लेकर हर पल जीना है अपनी मर्जी से ....
आज कहते कहते सुनना है अपनी मर्जीसे ,
आज चलते चलते रुकना है अपनी मर्जीसे ...
आज ख़ामोशीको गुनगुनाना है अपनी मर्जीसे ,
आज हँसते हँसते रोना है अपनी मर्जीसे ....
आज ढेरसे सपने देखने सोना है अपनी मर्जीसे ,
आज कुछ सपनों को पाना है जागते हुए अपनी मर्जीसे ...
रोज सूरज पहनाता है मुझे कई रिश्तोंके मुखौटे ,
आज रिश्तोंके सारे मुखौटे उतारकर सिर्फ प्रीति बनकर जीना है अपनी मर्जी से ....
दो साँसोंके बीच कुछ खाली जगहसे इस दिनमें
खुली सांस लेकर हर पल जीना है अपनी मर्जी से ....
7 मार्च 2011
बाज़ार
हम क्या मोलभाव करेंगे
बिक गए थे कभी हम भी पानी के दाम पर ,
ये बेमुर्रवत दुनिया क्या जाने एक दर्द का दाम??
ये तो हर गली बस मुफ्त में ही बिकता गया ....
वो खुशियों की गली थी जहाँ हर चीज़ खुबसूरत पड़ी थी ,
क्या करे हम खरीद ना पाए कुछ भी ,
हमारी जेब से उनकी कीमत बड़ी थी ....
देने को हमारे पास सब कुछ था ,
जिसकी इस दुनिया में कमी है ,
प्यार ,वफ़ा ,इमान ,शिद्दत ,सच्चाई ,
पर वापस हम यूँ लौटे
क्योंकि बाज़ार में इसके खरीददार की कमी थी .....
बिक गए थे कभी हम भी पानी के दाम पर ,
ये बेमुर्रवत दुनिया क्या जाने एक दर्द का दाम??
ये तो हर गली बस मुफ्त में ही बिकता गया ....
वो खुशियों की गली थी जहाँ हर चीज़ खुबसूरत पड़ी थी ,
क्या करे हम खरीद ना पाए कुछ भी ,
हमारी जेब से उनकी कीमत बड़ी थी ....
देने को हमारे पास सब कुछ था ,
जिसकी इस दुनिया में कमी है ,
प्यार ,वफ़ा ,इमान ,शिद्दत ,सच्चाई ,
पर वापस हम यूँ लौटे
क्योंकि बाज़ार में इसके खरीददार की कमी थी .....
5 मार्च 2011
वक्त ना रुके ...
वो हमें राहों पर छोड़ गया तनहा ,
इंतजार करते हुए ...
सोचा था हम उसकी जरूरत है ,
उसके लिए जन्मों तक इंतज़ार करते रहेंगे .....
पर हर इब्तदा लेकर आती है एक इन्तेहा,
इससे वो नावाकिफ था ,
कदम रुक जाए ये होता है कभी कभी ,
ये नहीं मुमकिन की जिंदगी का वक्त रुक जाए .......
और हम लौट गए कहीं अनजान दुनिया में ,
जहाँ हमारे वजूद के निशाँ ना रह गए बाकी ,
अब गर लौट कर आये तो भी ,
यादों के धुंधले निशाँ को छोड़ कुछ ना मिलेगा ......
इंतजार करते हुए ...
सोचा था हम उसकी जरूरत है ,
उसके लिए जन्मों तक इंतज़ार करते रहेंगे .....
पर हर इब्तदा लेकर आती है एक इन्तेहा,
इससे वो नावाकिफ था ,
कदम रुक जाए ये होता है कभी कभी ,
ये नहीं मुमकिन की जिंदगी का वक्त रुक जाए .......
और हम लौट गए कहीं अनजान दुनिया में ,
जहाँ हमारे वजूद के निशाँ ना रह गए बाकी ,
अब गर लौट कर आये तो भी ,
यादों के धुंधले निशाँ को छोड़ कुछ ना मिलेगा ......
4 मार्च 2011
जिंदगी का घर ...
रिश्ते जिंदगीसे जुडी होते है
या जिंदगी रिश्तोसे बनती है ???
एक सवाल सोचते हुए हम कहीं दूर निकल गए थे ....
रस्तेमें प्यास लगी तो मटका याद आ गया ...
मटके के साथ रसोई और वो जहाँ थी वो घर याद आया ....
भूख लगी तो रोटी याद आई और उसके साथ चूल्हा याद आया ....
थक गए चारपाई याद आई और उसके साथ आँगन याद आया ....
हाँ एक घर है मेरा बहुत याद आया ...
घर में वो माँ याद आई , वो पिताजी याद आ गए ....
वो स्कुल ,वो दोस्त ,वो भाई बहन ,वो मास्टरजी भी याद आये ....
घर पर ताला होता था तब बिठाकर पानी देनी वाली पड़ोस की चाची याद आई ....
नहीं अब जाकर यकीं आ गया
रिश्तों से जुडती जिंदगी ही जिंदगी बनती है ...
वर्ना सहरा की तपती धुप और अनंत महासागर को देखो ...
सिर्फ वहां रेत ही रेत नज़र आती है ....
या जिंदगी रिश्तोसे बनती है ???
एक सवाल सोचते हुए हम कहीं दूर निकल गए थे ....
रस्तेमें प्यास लगी तो मटका याद आ गया ...
मटके के साथ रसोई और वो जहाँ थी वो घर याद आया ....
भूख लगी तो रोटी याद आई और उसके साथ चूल्हा याद आया ....
थक गए चारपाई याद आई और उसके साथ आँगन याद आया ....
हाँ एक घर है मेरा बहुत याद आया ...
घर में वो माँ याद आई , वो पिताजी याद आ गए ....
वो स्कुल ,वो दोस्त ,वो भाई बहन ,वो मास्टरजी भी याद आये ....
घर पर ताला होता था तब बिठाकर पानी देनी वाली पड़ोस की चाची याद आई ....
नहीं अब जाकर यकीं आ गया
रिश्तों से जुडती जिंदगी ही जिंदगी बनती है ...
वर्ना सहरा की तपती धुप और अनंत महासागर को देखो ...
सिर्फ वहां रेत ही रेत नज़र आती है ....
3 मार्च 2011
बहुत प्यार करते है तुम्हे ...
तुम्हारे हर इलज़ाम सर आँखों पर ,
तुम्हारे हर गिले शिकवे भी सर आँखों पर ,
तुम्हे टुकडोमें नहीं पाने की चाहत रही मेरी ,
तुमसे ही प्यार करते है और बिठाया है दिलमें ....
तुम्हारी मंजिल अब होगी मेरी मंजिल ही ,
तुम्हारी हर ख्वाहिश को रखेंगे सर आँखों पर ,
हमारी ख़ुशी तुम्हारे नाम करते जायेंगे ,
तुम्हारे सारे गम दे दो मुझे अबसे ,
क्योंकि ये तुम्हारे है ये सारे गम भी सर आँखों पर ........
तुम्हारे हर गिले शिकवे भी सर आँखों पर ,
तुम्हे टुकडोमें नहीं पाने की चाहत रही मेरी ,
तुमसे ही प्यार करते है और बिठाया है दिलमें ....
तुम्हारी मंजिल अब होगी मेरी मंजिल ही ,
तुम्हारी हर ख्वाहिश को रखेंगे सर आँखों पर ,
हमारी ख़ुशी तुम्हारे नाम करते जायेंगे ,
तुम्हारे सारे गम दे दो मुझे अबसे ,
क्योंकि ये तुम्हारे है ये सारे गम भी सर आँखों पर ........
2 मार्च 2011
वो एक सफ़र की बात थी ...
बस एक रात की बात थी ,
मैं और वो मुसाफिर थे ,
बस सफ़र के साथ की बात थी ,
उसको सुनते रहे हम रात भर यूँही एकटक देखते हुए ,
फिर सुबह होते ही बिछड़ जाने की बात जो थी .....
थोड़े लम्हों का साथ था ,
फिर भी उसमे एक जिंदगी जीने की बात थी .......
साथ साथ दोनों सफ़र रहे
फिर भी वो मंजिल अलग होने की बात थी ....
कहीं फिर मिल जाओ ऐसे ही बहार बनके एक बार ....
तुमसे मिलने की उम्मीद जागने की बात थी ......
मैं और वो मुसाफिर थे ,
बस सफ़र के साथ की बात थी ,
उसको सुनते रहे हम रात भर यूँही एकटक देखते हुए ,
फिर सुबह होते ही बिछड़ जाने की बात जो थी .....
थोड़े लम्हों का साथ था ,
फिर भी उसमे एक जिंदगी जीने की बात थी .......
साथ साथ दोनों सफ़र रहे
फिर भी वो मंजिल अलग होने की बात थी ....
कहीं फिर मिल जाओ ऐसे ही बहार बनके एक बार ....
तुमसे मिलने की उम्मीद जागने की बात थी ......
1 मार्च 2011
तुम मिले तो लगा
तुम मिले तो लगा
जैसे अँधेरी रात को शमा मेहरबान हुई ....
तुम मिले तो लगा
जैसे एक पंछी को उड़ने की आस मिली ....
तुम मिले तो लगा
मेरे सपनोको पंखो की परवाज मिली ....
तुम मिले तो लगा
मेरी खोई आवाज मिली ....
तुम मिले तो लगा
आवाज को नयी अल्फाजोंकी चुनर मिली .....
तुम मिले तो लगा
तुम मिल गए तो और कुछ नहीं चाहिए ,
खुदा के दरवाजे मेरी दुआ कुबूल हुई .........
जैसे अँधेरी रात को शमा मेहरबान हुई ....
तुम मिले तो लगा
जैसे एक पंछी को उड़ने की आस मिली ....
तुम मिले तो लगा
मेरे सपनोको पंखो की परवाज मिली ....
तुम मिले तो लगा
मेरी खोई आवाज मिली ....
तुम मिले तो लगा
आवाज को नयी अल्फाजोंकी चुनर मिली .....
तुम मिले तो लगा
तुम मिल गए तो और कुछ नहीं चाहिए ,
खुदा के दरवाजे मेरी दुआ कुबूल हुई .........
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