28 जनवरी 2011

इन रेखाओं में .........

चल ये टूटे पत्तेकी रेखाओंसे अपनी हथेली मिलाते है ,
थोड़ी सी तक़दीर को जोड़ते है और थोड़ी मायूसीसे मिलते है ,
फिर मैं समयके साथ उड़ जाता हूँ और पत्ते हवा के साथ ,
जिंदगीमें फिर मिले ना मिले ये पता नहीं
पर मेरी हथेली पर उसका स्पर्श
और उसकी रेखामें मेरी तक़दीर जुदा ना हो पाते है ....

27 जनवरी 2011

कुछ बोलो तो ...

फिजा को देखो जरा खिड़की से पर्दा हटाकर
शीशे के उस पार एक चुप्पी सन्नाटा ओढ़कर खड़ी है ,
धुआं धुआं एक सुबह बस ख़ामोशीसे ,
टटोलकर सूरजको उठाकर चली गयी ......
बस उस सन्नाटेकी चुप्पीका पयमाना छोड़ गयी है ,
चलो आज की कुर्बत इसी चुप्पीके नाम किये जाते है ,,
हम भी बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाते है ...
उस ख़ामोशीके बोलने के इंतज़ारमें .....

25 जनवरी 2011

राजनेताओको समर्पित

ये देश जिस पर मुझे नाज़ है ,
बस ऐसा नागरिक बन पाऊं की देश को मुझ पर नाज़ हो ......
ये देशने मुझे जमीं दी रहने को घर दिया ...
उस घर को देशभक्तिकी छतसे महफूज़ हो ,
जो कपडे पहने वो किसी गरीब को रोजी रोटी दे रहा हो ,
और मेरी रोटी किसी किसानके खूनसे ना सिंची हो .....
====================================

24 जनवरी 2011

शामोसहर

कभी सहरसे शामकी मुलाकात तो होती
बतिया लेते दोनों क्या गुजरी उन पर भी .....
============================
सूरज जल जाता है सालोंसे
फिर भी खाक नहीं हुआ ...
=============================
दिन को नींद ना आती हो इंतज़ारमें रातके
रात भी बेखबर जगती रहती है सुबहके इंतज़ारमें ....

21 जनवरी 2011

नज़रे करम

मेरी आँखों को तेरी नज़र दे दे ,
अय दोस्त मुझ पर रहमत कर दे ...
मेरे भीतरसे ये दुनियाकी और का रास्ता
आँख की खिड़कीसे होकर गुजरता है ....
मेरा भीतर मेरे लब्ज़ मेरी आँखमें सजते है ,
बस ये पढनेकी जरासी जेहमत कर दे ....
मेरी आँखे सुन्दर नहीं
पर हर सुन्दरताकी खोज कर लेने की
नज़र रख लेती है थोड़ी थोड़ी ...
बस इतनीसी इल्तजा है
मेरी ये आँखको तु एक नज़र दे दे ...देख ले ...

19 जनवरी 2011

अय सागर की लहरों ...

दूर तकती एक नज़र
पहुँच रही थी जहाँ तक
जमीं आसमांसे वहां गले मिल रही
हर डगर हर शहर हर शाम हर सहर .......
खारे जलका एक काफिला था फैला सरहदों के पार तक
उमंगें मौज बनकर
कनारे से टकरा रही थी श्वेत झागके परिधानमें
आसमां अपना अक्स देख मुस्कुरा रहा था नीला नीला
और उस सागरका मुख पार उड़ रही थी लहरों की चुनर हवा के झोंकोसे
ये अठखेलियाँ देखती हुई उसकी नज़रे
दूर दूर तक बहती रही कहती रही
" अय वक्त जरा सा रुक जा मेरे लिए
इस साहिलसे उस लहरों पर तेरे साथ चलने दे
एक कश्तीमें तु चाँद को लेकर आ जा
सूरजको अपनी गोदमें बिठाकर हम लायेंगे ...."

18 जनवरी 2011

दस्तूर ...

कभी शाम ढले तुम्हारी सदा मुझे आज भी पुकारती है ,
हम नहीं साथ चल सके तो क्या हुआ ???
हमारी यादें तो दुनिया के दस्तूर तोड़ कर आज भी
हाथ में हाथ लेकर साथ साथ है .........
===================================
तुम्हारे दामन की खुशियों को भरनेका वादा किया ,
तो अब ये आँखों के अश्क मुझे फिर से दे दो ....
तुम्हारे रेशमी गालोको खारे पानी से मत धो ...
अभी उसे सीपी में सजा मोती बना दूंगा मैं ....

17 जनवरी 2011

मेरा शहर ...

कभी कभी होता है यूँ भी की हम खुद के घर में कुछ अलग जिंदगी जीते है जो अलग सी होती है ....
ये उत्तरायण भी कुछ ऐसा ही हुआ .... हमारे फ्लेट के कोमन टेरेस पर डीजे सिस्टम पुरे दो दिन तक फुल वोल्यूम पर बजाया गया ....टेरेस के ठीक निचे मेरा घर है ...पुरे घर की दीवारें वायब्रेशन से कांप रही थी ...छत पर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी ...और बहार आवाज इतने डेसिबल पर हाई था वो सहन भी नहीं हो रहा था ...जब बिजली थोड़ी देर जाती तो आशीर्वाद सा लगता ....ये सारा नाटक हमारे फ्लेट के लोगोने नहीं पर उनके किसी मेहमान ने किया था जिसे इधर रहना नहीं था ....और शायद सब नशेमें भी थे ...एक दिन घर पर खूब मेहमान थे तो घर पर मजबूरन रहे ....पर दुसरे दिन .....
मैं परिवार के साथ मेटिनी शो में फिल्म देखने चली गयी ...नो वन किल्ड जेसिका ...अच्छी फिल्म .....लेकिन मज़ा तो थियेटर के बहार निकलने के बाद ही आया .....मेरा शहर वड़ोदरा का वो जिसे ह्रदयस्थल कह सकते है वो चार दरवाजा विस्तार था ....सब दुकाने बंद ...ज्यादा वाहन की आवा जाही नहीं थी ...बहुत थोड़े रिक्शा और कर सड़क पर थे ...बहुत कम लोग हमारी तरह घूम रहे थे ...हरदम धमाधम शहर चैन की सांस ले रहा था ...आराम फरमा रहा था .....थोड़े बहुत दुकान खुले थे बिना ग्राहक के ......वहां पर एक के साथ एक सटे हुए शौपिंग सेंटर बने हुए है ...आज वो भी सुने थे ...तो हम लोग तो जैसे भूलभुलैया में घूमते है वैसे एक गली से दुसरे में निकलते हुए खूब मज़ा करते रहे ...शहर के सुने से गलियारे को भी खूब एन्जॉय करते रहे ......एक बंद कोल्ड्रिंक हाउस जो हमेशा ग्राहकसे भरा रहता है और बंद ओटले पर बैठकर जाते आते लोगो को देखा .....
और पतंग के मांजे से घायल पंछियों के लिए वहां पर की गयी एक सुन्दर जीवदया प्रेमियों की एक व्यवस्था भी देखी ....एक मेडिकल कोलेज के विद्यार्थियों ने मोबाइल हॉस्पिटल को वहां खड़ा रखा था राउंड थे क्लोक .....
कभी कभी तनहाई भी बोल जाती है बहुत कुछ ...
बस मुझे कुछ पल के लिए तनहा कर दो ...
शोर के गलियारेमें निशब्द होकर चले चलो ....
मुझे भी थक कर थोड़ी देर सोने दो ....

14 जनवरी 2011

पतंगने कहा ...

कहती है पतंग क्या ?
कट जानेके डर से क्या उड़ना छोड़ दें
ऊँचे उड़ना हो तो खुद को दुनियादारीसे बोजसे भारी मत बना दो ,
मेरी तरह कागज़ के बन जाओ हलके फुलसे बन जाओ .....
शरीर में चर्बी और मनमें दुःख ,कलेश ,राग द्वेष जो पालोगे
एय इंसान तुम कभी जमीं से ऊपर ना उठ पाओगे ....
अपना मक़ाम जो ऊपर उठाना है तुझे ,
संकल्प की डोर से खुद को बांध ले ......
आदर्शसे जब पेच लड़ जाए ,
तो कटनेसे भी मत डर .....
तेरी राह जरूर बदल जाए शायद ,
पर खुद को बदलना नहीं ...
बिजली के तार मिले या पेड़ मिले राहों में ,
बिन हवा के उड़ना पड़े ये तेज हवा के झोंकोमें
अपनी गति अपना रूख तु हवासा करता चल ,
मत पलट अपनी राहोसे ,
या आकाश माप ले या फिर कटता चल .........

13 जनवरी 2011

पतंग पतंग से कहती है

पतंग दुकान में गाएगी :
-छोटी फुद्दी ----मेरे ख्वाबोंमें जो आये ,आके मुझे छेड़ जाए ....
-बड़ा डुग्गा ----भोली सी सूरत आखों में मस्ती दूर खड़ी शर्माए ...आय हाय ...
छत पर मांजे को देखकर :
-तु मेरे सामने में तेरे सामने तुझे देखू के प्यार करूँ ?
-जादू तेरी नज़र खुशबू तेरा बदन ,तु हाँ कर या ना कर ..तु है मेरी किरन ...
दो पतंग साथ साथ उड़ते हुए :
-महेंदी लगा के रखना ,डोली सजा के रखना ,लेने तुझे ओ गोरी आयेंगे तेरे सजना ...
-तु मेरी अधूरी प्यास प्यास तु आ गयी मन को रास रास ,अब तो तु आ जा पास पास है गुजारिश ....
उड़ते वक्त पेच होने पर :
-बाहों के दरम्यां दो प्यार मिल रहे है ...
- ये कहाँ आ गए हम यूँ ही साथ साथ चलके ,तेरी बाहों में है जानम मेरे जिस्मो जा पिघल के ...
कट जाने पर :
-रुक जा ओ दिल दीवाने ,पूछूं तो में जरा ...
-रुक जा ओ जाने वाली रुक जा मैं तो राही तेरी मंजिल का ...
-सुनिए तो रुकिए तो क्यों है खफा कहिये तो ...
उस पर कटी फुद्दी गाएगी :
- जरा सा झूम लूँ में अरे ना रे नारे ना ....

कटी पतंग पेड़ पर अटकते वक्त :
-तुझे देखा तो ये जाना सनम ,प्यार होता है दीवाना सनम ,अब यहाँ से कहाँ जाए हम तेरी बाँहों में मर जाए हम
पेड़ पतंग से :
-बहका मैं बहका वो बहकी हवा सी आये ,एक ही नज़र में सब मंजिल मंजिल पाए ...
===वासी उतरायण की रात :
-तेरा साथ है कितना प्यारा कम लगता है जीवन सारा ,
तेरे मिलन की लगनमें हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा .....

11 जनवरी 2011

दायरा ...

एक दायरेमें सिमटे वक्तकी उम्मीद आज़ादी ,
वक्त के पंख लगे होते है कट गए कब ?
आखेट हुआ उस बेबस वक्त का भी
पैसा शायद उसे भी खरीद गया होगा ........
पर वक्त की ताकत का अंदाज़ कहाँ वो हरी नोट को ??!!!
यादों के सैलाबमें बह गया वो हरी नोट का नूर ,
अब सिर्फ वक्त शेष बचा हुआ है दामनमें ,
कीचड़में सना फिर भी धोने पर सच्चे सोने सा .....
फिर वही समां फिर वही धुआं ...
फिर वही लम्हा ...
बस अब तुम्हारा इंतज़ार है ......

10 जनवरी 2011

इख्तियार ....

तुम पर ऐतबार है
खुद पर इख्तियार है ,
शायद ये कोई खुमार बेशुमार है ?
या फिर ये सिर्फ प्यार है ?
=============================
कहीं मुक्कमल जहाँ की तलाश पर मंजिल है आज ,
वो एक जिसे राह से प्यार हुआ इस कदर उसे मिलने की बेताबी है आज ....
===============================================
जुर्म प्यार है या दिल का टूट जाना ...
शायद पुरे एहसास को झुठला देना ये ही एक गुनाह है ना !!!!!!!!!

9 जनवरी 2011

तेरी उम्मीद ....

निर्या दीपा की दोस्त है ,थी और रहेगी .....
बचपनमें साथ बढे और पले स्कुल कोलेज साथ साथ रहा ...दोस्ताना वो जिसमे हर अदा शामिल ...प्यार झगडा ,रूठना मनाना ....दोनों बीस साल की हुई तब दीपा अमेरिका चली गयी ....शादी के वक्त एक ख़त मिला था ....फिर कोई सुराग नहीं ...बस जहनमें बहुत सारे खुबसूरत लम्हे रख छोड़े थे ....
निर्या रोज फेसबुक पर उसे ढूंढती थी ...पर वो नहीं मिल रही थी .....ऑरकुट भी छान लिया ...कोई मतलब नहीं ...उसके शहर भी जाकर आई क्योंकि निर्या शादी के बाद दिल्ही में सेटल हुई थी ....पुराने शहरमें बहुत सारी यादें उसकी दीवार दरिचो में कैद थी बिलकुल अनछुई सी ...उस पर कोई धुल या जंग नहीं लगी थी ...शायद ये प्रमाण था की उसकी यादें भी इसी शिद्दत से ताज़ा थी ...ये दिल की गवाही थी .....वो कोलेज गयी ...वहां पर एक अध्यापक मिले श्री समीर श्रीवास्तव ....उनके साथ पढ़ते थे और चार साल पहले अमेरिका से लौटे थे ....
अनायास इतने सालों के बाद एक उम्मीद जागी ...समीरने कहा की दीपा अब जर्मनी में है ...और उसके तलाक हो चुके है ...उसकी बेटी के साथ सेट है ....समीर के पास उसका जर्मनी का पता मिला ....
दिल्ही लौटकर निर्या ने पहला काम उसे ख़त लिखने का किया ....लेकिन एहसास जम गए थे ...सिर्फ आंसू बह रहे थे ...उसने रोते हुए इल्तजा की दीपा ये ख़त मिले तो कमसे कम उसे जवाब जरूर दे ........
एक महीने तक उसने पोस्टमन की राह देखी ...एक दिन बहुप्रतीक्षित ख़त आया ...दीपा का ही था ....
ख़तकी लिफाफा फाड़कर खोलते हुए तक तो निर्या के हाथ पाँव कांप रहे थे ........आंसू को कई बार पोछना पड़ा क्योंकि की अक्षर धुंधला रहे थे ...अंत में एक ईमेल एड्रेस भी लिखा था और फोन नंबर भी ....
निर्या की तलाश पूरी हुई थी ....अब हफ्ते में एक फोन और दो दिनोमे चेट का सिलसिला शुरू हुआ ...पुरानी यादें ताज़ा होती रही ....और एक दिन सुबह में निर्या की डोर बेल बजी और सामने दीपा थी .......
दो बिछड़े गले लगकर कुछ भी बिना कहे कई मिनटों तक बहुत कुछ कह गए जब तक निर्याके पति देव ने उन्हें फिर जागरूक नहीं किया ......बहुत सारी बातों का ढेर ...खूब सारा घूमना ...शोपिंग के बाद दोनों ने तय किया की वापस अपने पुराने शहर अहमदाबाद जाय ...एकेले दोनों ही ....
एक एक जगह खुद को जाकर ढूँढा ....वही पुरानी मानिक चोक की पानी पूरी और एच एल कोलेज का कम्पाउंड में जाकर भी एक घंटा बैठे ...वो कांकरिया तालाब ....सब कुछ बदला था फिर भी इस शहर के इतिहास के अनजाने सफे पर उनकी दोस्ती की दास्तान भी बरक़रार थी ....
निर्या ने कहा दीपा से अब तुम भी कोई सोशिअल नेटवर्क साईट पर आ जाओ ....दिल का हाल बयां करेंगे .....
उस पर दीपा का जवाब था ::: वो बेकरारी कहाँ जो दोस्ती को इतनी गहरी बनाये ????हाले दिल जो रोजमर्रा बयां किये जाए तो उनमे वो कसक नहीं बच पाती जो हम दोनों के बीच आज भी बरक़रार है ....अरे मेरा हाले दिल मुझे गर तुमसे बयां किया है वो पूरी दुनिया से कहने की मैं कोई जरूरत नहीं समजती ....क्योंकि तुम्हारे ख़त मिलना वो पल ...उसके लिए तो शब्द अधूरे होते है ...फोन पर तुम्हारी आवाज ...जैसे लगता था तुम मेरे से कभी दूर नहीं हो ...वो विडिओ चेट ......दूरी नहीं रही ...पर आज जब हम इतने सालों के बाद मिले है वो शिद्दत शायद कोई जरिये में नहीं होगी .....मैं तुम्हे ऐसा ही पाना चाहती हूँ .....
किसी की फुरकत को महसूस कर
प्यार और बढेगा गर दिलमें कशिश है ....
जो कल पुर्जों से बयां किया जाए ....
उस प्यार पर कैसे यकीं कर ले ???????
बस अगले मिलन के वादे पर दोनों देखते रहे एक दुसरे को ....दीपा प्लेन की खिड़की से और निर्या विजिटर लोंज के अहाते से .....
===============================================
शायद दीपा सच कह रही थी ....जिस तक पहुँच ना पाए ऐसी दोस्ती एक अनजान से
वो उस कशिश को हासिल नहीं कर सकती जो गुजारे साथ पलों की यादों में समायी है ...
एक तस्वीरमें तेरी हथेली की गरमाहट कैसे महसूस कर पाएंगे ?
जो तुझे गले मिलने पर तेरा हाथ मेरे हाथमे लेते वक्त एहसास बन गयी थी ???????

8 जनवरी 2011

१.१.२०११ : एक शुरुआत

बराबर एक हफ्ते पहले हमने नए दशक में प्रवेश किया ....इस दिन को बहुत अलग अंदाज़से गुजारा मैंने .......इकत्तीस को दुनिया जाग रही तो मैं भर नींद में सो गयी ......साल के पहले ही दिन फ्लेट की टंकी की मोटर ख़राब हुई ...नहाने का भी पानी नहीं ...ऊपर से घर में रोटी के लिए आटा भी ख़त्म तो पिसना था ....सब्जी लाने की थी ...सब कुछ एक साथ ......ऊपर से दोपहर दो बजे हमारे फ्लेट्स की दस गृहिणी महिला ने यहाँ के सयाजी बाग में जाकर नया साल मनाने का भी तय किया था ......
जो भागमभाग हुई ......ये भूल ही गयी की आज पहली जनवरी और एक एक ग्यारह तारीख है और मैं भी घर में अकेली .....पर दिन के अंत में सब कुछ निपटा दिया था .......मोटर भी चालू हो गयी .....
कभी कभी कोई खास दिन हो और उसी दिन सब कुछ उल्टा पुल्टा हो जाए तो कितनी मज़ा आती है ना ???? मुझे एक बात का भी टेंशन नहीं था ....ठन्डे दिमाग से एक के बाद एक काम निपट रहे थे .....
१......एक बात की मुझे ख़ुशी हुई की कम से कम दस महिला ने ये सोचा की चलो हम अपनी घर गृहस्थीमें से अपने लिए वक्त निकाले ...कुछ अपने लिए लम्हे निकाले जिसे वह अपने तरीके से जी लिया जाय ....हम वहां गए ...फिश पोंड ,कबड्डी , स्टेंडिंग खो खो .....योग सब कुछ खेल कूद किया ...घर से पापड़ी का लोट कोंत्रिब्युशनमें बनाकर ले गए थे .....खूब मस्ती भी की ........ये सुबह से शाम आपकी जिंदगी को हर बात को सरल बनाने में जुटी हुई एक महिला का स्थान क्या है ????? क्या उसको अपने लिए अपने तरीके से जीने का, हंसने का बोलने का कोई हक़ नहीं????...बस एक बात है की वो अपने लिए वक्त निकालना ही नहीं चाहती ...घर वाले इससे खुश भी होते है पर वो वक्त निकालना ही नहीं चाहती ....
२......ये बात हर इंसान की है की कौनसे वक्त क्या काम करना चाहिए वो चीज बहुत कम इंसान जानते है ....हम बाग़ में मजा करने गए थे ...पर एक महिला ने ये कहा की हमें यहाँ भगवान का नाम लेना चाहिए ...और कुछ आध्यामिक बातें करने लगी ...बाकी लोग के साथ मुझे भी ये पसंद नहीं आया ...क्योंकि ये बातें तो हम किसीके घर पर मिलकर भी कर सकते है ....किसी की शादी में जाते है तो वहां पर अपने घर या ऑफिस की समस्या को लेकर डिस्कशन भी सुनने में आता है ...किसी के मौत के कारण वहां गए हो तो किसीकी शादी की सेटिंग की बातें करते देखा गया है ....ये पढ़े लिखे या अनपढ़ सब लोग के केस में सही है .....शायद ये चीज हम सीखें तो हमारे आधे टेंशन कम हो सकते है .......
अगर शांति से एक के बाद एक काम निपटाओ तो दिन के अंत में सब कुछ ठीक ठाक ही मिलता है ....जहाँ जाये उस समां का आनंद ले तो हमारा मन प्रफुल्लित हो जाता है ......
हाँ ये नए वर्ष और दशककी शुरुआत मुझे बहुत कुछ सिखा गयी .....

7 जनवरी 2011

जुनूं .....

झुकती हुई उठती हुई पलकें ,
कांपते हुए होठ ,
बस यहीं पर खो गया मेरा बटुआ ,
जो अल्फाजोंसे मालामाल था ............
================================
ना कर दिल ए नादाँ कुछ जुनूं बेवजह
ये तो कांच से नाजुक इश्क दा मामला है .....
================================
गुजरते हुए कारवांके गुब्बारमें
मेरी मीठी यादोंकी तस्वीरें उठती नजर आने लगी ......
===================================
कुछ सहमा हुआ कुछ सिमटा हुआ
कुछ शरमाया सा कुछ गरमाया सा
आँखोंमें अश्क बनकर पिघला सा
पलकों पर इंतज़ार बनकर जमा सा
देखो अंगड़ाई लेकर फिर जागा है
उम्र कहाँ देख रहे हो इसकी
बस ये उम्र से परे सदा से जवान सा है

इश्क है ...ये इश्क है ...ये इबादत का रुतबा लिए इश्क ही है ....

6 जनवरी 2011

क्यों तुम जुदा हुए थे ऐसे ????

दूर हो जाना हमारा लाज़मी था ,
इतनी कुर्बतसे हम डरने लगे थे ,
तुम्हारे पास होते वक्त
तुमसे दूरी के डरसे डरने लगे थे ,
तुमसे और करीब होने लगे थे ,
दबे पांव जब हम जिंदगीसे दूर चलने लगे थे ,
पहले तनहाईमें ख्यालमें मिला करते थे हमतुम ,
अब हर गली चौबारे पर तुम ही तुम नज़र आने लगे थे ......
एक दिन लौट आये हम वीरानेसे इस खँडहरमें एक बार फिर ,
पर अब वो खँडहरमें हमें एक सुन्दर सजे घर के
तुम्हारे साथ कटने वाले उन हसीं लम्हों के ख्वाब
एक बार फिर आने लगे थे ....

5 जनवरी 2011

गुस्ताख चाँद

रातों की स्याही सिमटकर कलमसे बहने को बेताब थी
पर ये चाँद बड़ा गुस्ताख हो गया आज
अपना सफ़ेद दामन का सफा समेट कर छुप गया
कहने लगा आज अमावस है मुझे ढूंढ लो ......
=========================================
तुम्हारे हाथो की नरमी
तुम्हारे साँसों की गर्मी ...
ये गर्म शालो में लिपटा सुर्ख चेहरा
बता रहा है की देखो जाड़े के दिन चल रहे है .....

4 जनवरी 2011

सदके यार मेरे

आने का वायदा तो किया था मैंने कल मिलूंगी ,
राह में इतनी बरसात हुई की पैर फिसल गया ,
मोच मई टांगसे ना आ सकी चलकर
पर खुदा गवाह रहा
हर पल तेरे बगैर आहें भरी मैंने ....
अब आ चुकी हूँ सामने
निकल ले जो गुबार दिल में हो
मैं तो तेरे गुस्से पर भी सदके यार मेरे .....