23 नवंबर 2011

इसी दरख्तके नीचे...

चुपचाप चली जाती है वो सड़क पर तेरी क़दमोंकी आहट,
मैं उसमे तेरे कदमोके निशाँ देख लेता हूँ चुपकेसे ,
हवाकी हर लहर ,जर्रे जर्रे पर बिछा हुआ वो गर्दका कतरा ,
तेरा पता देकर चले जाते है चुपचाप .....
फिर भी मैंने तुम्हारा पीछा करनेकी कोशिश नहीं की है ,
क्योंकि उस पलके इंतजारमें बिछायी है ये आँखें
जब ये रस्ते हमें आमने सामने ले आयेंगे ,
और मेरी निगाहोंमें तुम मेरे प्यार का अफसाना पढ़ लोगे ....
बस अब तुम्हारे लौटने का इंतज़ार रहेगा ...
इसी दरख्तके नीचे...
हर सहर ...
हर शाम ....

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