25 नवम्बर 2010

ये वक्त

हमारे पास बहुत कुछ है
धन दौलत ,मानसम्मान ,बंगला गाडी ,नौकर चाकर
बस हमारे पास तुम्हारे लिए वक्त नहीं है ......
पर हमारा वक्त है तुम्हारे लिए खुशियाँ बटोरने के लिए .......
उस पथरायी आँखोंमें इंतज़ार लिए
रुखसत कर गयी जब हमारी हमनवा इस दुनिया से ,
तब पता चला वक्त का क्या मोल है ...
वक्त कैसा छलावा है ???
हाथमें सरक जाता है घडी भर मोहलत देता नहीं ....
कभी हँसी के सुर छेड़ता है लब पर
कभी गम की अँधेरी गलीमें गुमनाम छोड़ जाता है ....

24 नवम्बर 2010

तुम पुरे दिन घर में क्या करती हो माँ ???

केयूर :माँ नीली शर्ट नहीं मिली .....
नीला : माँ मेरी कल आर्ट कम्पीटीशन है मैं देर से आउंगी .....
निलेश : ऋतू ,आज शाम मेरी डिनर मीटिंग है देर से लौटूंगा ...
ऋतू ...
एक गृहिणी है ..बेटा केयूर कोलेज में है और नीला बेटी ग्यारहवी कक्षामें है ...उस शाम को ऋतू कुछ नहीं कर पाती है ....सब उससे खफा है बहुत ...
सब के मुंह पर एक ही लाइन आती है ...घर में रहती हो तो पुरे दिन तुमने किया क्या ?????
किसीने उसके सर पर हाथ रखकर देखा होता तो पता चालता अंगारेकी तरह बदन तप रहा था ...कुकर से जब मुंग दाल की खिचड़ी और कढ़ी निकले तो सब उस पर बरस पड़े ...बेडरूममें ऋतू सिसक रही थी ....फोन पर पिज़ा ऑर्डर किया गया ....ऋतू भूखी ही सो गयी ...रात निलेश घर पर आया तब उसका हाथ ऋतू के हाथ को लगा ...जैसे अंगारा छू लिया है ऐसा लगा .....ऋतू बेसुध सी थी ...थर्मोमीटरसे नापा ...एक सौ तीन बुखार .....फ़ौरन डॉक्टर को बुलाया गया ....हालात बिगड़ थे ...अस्पतालमें भर्ती किया गया ....केयूर और नीला घर पर थे ...निलेशने छुट्टी ली .... दो दिन के बाद ऋतू ने उसे ऑफिस जाने को कहा ....
चार दिन के बाद ऋतू घर लौटी ....तो जैसे लगा ये घर नहीं जंगल है ....सारा तितर बितर ....सरन ताई को रसोई के लिए रखा गया था .....शाम को जब सब लौटे तो पूरा घर ऋतू के लौट आने की गवाही दे रहा था ....शाम खाना खाकर निलेशने दोनों बच्चो को बुलाया ....पहली बार सबकी जबां खामोश थी ....शुरुआत नीलाने की ...
माँ ,सॉरी आपको हम गलत समजे ...माँ तुम्हारी गैर हाजिरीमें हमने आपकी अहमियत समजी है ...माँ तुमने हमें स्कूली शिक्षा दी है अब घर की भी शिक्षा दो .....अब हम घर काम सीखना चाहेंगे ....
केयुरने कहा : माँ अब मैं अपनी चीजें संभालना सिख गया हूँ ....
निलेशके चेहरे पर मुस्कराहट थी ......जिसने बच्चो को इन चार दिनोंमें घर की लक्ष्मी की कदर करना सिखाया था ...ऋतूको बहाने से अस्पताल का नाम देकर थोड़े दिन उसकी सहेली के घर भेज दिया था ...ताकि बच्चे उसे ये ना कहे ..की माँ तुम पुरे दिन घर में क्या करती हो ???????

23 नवम्बर 2010

सुन ज़रा

एक बूंद के पीछे छुपा हुआ बादल
बादल के पीछे छुपा एक आसमां
आसमांमें छुपा हुआ रौशनी के पीछे एक चाँद ...
और चाँदमें नज़र आती है हमें तुम्हारी सूरत .....
सपने बनकर सिमटती हुई आँखोंमें रातको
दिन की धुप में ओज़ल हो जाती है .....
अय मेरी सुबह तु आकर क्यों ठहर नहीं जाती है ....
पास बैठेंगे ,गुफ्तगू करेंगे ...
भाप उठते चायके कपकी धुंधमें तुम्हारे चेहरे की किताबके
ये मासूम अफसाने पढेंगे ....

22 नवम्बर 2010

फिर एक सुबह सुनहरी सी ...

कभी कभी ये दिल कुछ अजीबसे पेश आता है खुद के साथ ही ....वैसे तो लगता है सबकुछ ठीक ठाक है फिर भी कुछ ठीक नहीं होता है ....मेरे लिए मेरे दिन की शुरुआत बहुत मायने रखती है ....कुछ खबरें पढ़कर चलनेका ...वो भी हो सके तो बिलकुल अकेले ही ...थोड़े दिन पहले मेरा एक छोटा सा दोस्त राहील जो सिर्फ सात साल का है वो अपनी मा के साथ लगभग साथ ही निकलता था ...उसके साथ मस्ती करनी मुझे हमेशा पसंद है पर सुबह में नहीं ...मुझे उस वक्त बातें करना भी नहीं अच्छा लगता ...पर उसकी मा जो मेरी सबसे अच्छी सहेली भी है उसके साथ बात भी बहुत कम करती थी ...ऐसा क्यों होता है पता नहीं चलता........
सुबह मैं खुद के साथ होती हूँ ...बहुत कुछ देखती हूँ ..बहुत कुछ नए ख्याल पनपनेका मौसम मेरे जहनका मेहमान होता है ..तब किसीका मिलना एक खललसा लगता है ....कुछ चेहरे अब सर्दी के चलते नए जुड़े है तो कुछ पुराने चेहरे नज़र नहीं आते ...मन ये देखता है ...जब बहुत दिन के बाद कोई पुराना चेहरा लौटा है तो एक हलकी सी हँसी अकेले में आकर चली जाती है ....
रोज एक चाय की लारी के पास एक मा अपने दो बच्चे एक लड़का जो छोटा है और एक लड़की जो बड़ी है छोड़ने आती है ...स्कुल बस आती है दोनों बैठकर जाते है पर मा खड़ी रहती है .....जब बस टर्न होकर सामने वाली सड़क से गुजरती है तब खिड़कीमें बैठा बेटा मा को टा टा करता है तब मा वापस जाती है ......
ये एक छोटी सी बात दीवाली के वेकेशन के बाद आज स्कुल खुले तब दोबारा हुई तो एक बड़ी सी मुस्कान अचानक चेहरे पर आ गयी .....
क्या आप ऐसे पल गुजारते है कभी ....शायद येही वजह है की मैं कभी कोई डिप्रेशन नहीं पालती हूँ ...बस ये कुछ लम्हे मुझे सब कुछ आयने की तरह समजा कर चले जाते है ....फिर एक नए दिन के लिए तैयार कर देते है ....

21 नवम्बर 2010

आओ तुम्हे चाँद पर ले जाए

आज सुबह ठिठुर रही थी ,
हलकीसी काँप भी रही थी ,
सूरज भी देखो बादलकी शालमें चेहरा छुपा रहा है ,
ये सुखी हुई लकड़ी जो जलकर हमें गर्म कर रही है ,
देखो ये भाप निकलती चायकी प्याली
हमारी ठण्डको थोडा कम करने की कोशिशमें जुटी हुई है ....
देखो ये फटे स्वेटरमें ठन्डे पानीमें बर्तन धोने महरी भी आ गयी है ....
देखो सिगरेटमें धुएंमें कोई नाहक ठण्डसे झूझ रहा है ....
एक कम्बल ,एक खाट, एक नींद ,एक आँख और उसमे मूंद कर देखो
एक प्यारी सी परी बादलों के पार ,
सफ़ेद कपडे में ,माथे सितारों का ताज पहनकर आती है ,
सफ़ेद बादलों के पार हमें साथ लेकर उड़ जाती है ,
चाँद पर हमारी सवारी रूकती है ,
वहां पड़ी दूध की नदी से चुल्लू में दूध पी लेते है ,
थोड़ी बादाम पेड़ से तोड़ लेते है ....
फिर बर्फ के पहाड़ो पर फिसलते है ,
और चोट लगते ही आँख खुल जाती है ,
हम तो बिस्तरसे गिर पड़े है ....

20 नवम्बर 2010

वो शाम ...

कुछ कहे अनकहे अल्फाजोंमे सिमट कर बीती
एक एहसाससे भरी शाम थी
कोई जैसे पयाम थी ,
कुछ कहीं कुछ कह रही थी ,
मैंने सुना नहीं
बीचमें कांच की दीवारें थी .......
बस देखते देखते अँधेरा होता गया घना ,
फिर भी तुम्हारे चेहरे को देखा जैसे चाँद खुले आसमां का हो ....

18 नवम्बर 2010

फिर चाँद निकला

छलका चाँद आसमांसे
चांदनी की बूंद टपक रही
रात के चेहरे पर
जैसे औस पंखुड़ीसे फूलकी ....
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रातसे इश्क कर बैठा चाँद
रश्क था रात को भी
हाथ में हाथ थामकर दोनों चलते रहे ..
सूरजकी पहली किरणने रातको निगल लिया ...
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चाँदसे वफ़ाकी रस्म निभाने
रातकी वापसी पर चाँदको ऐतबार है ....
फिर चाहे चाँद आये ना आये
हर सांजकी जुल्फोंके सायेमें रात आती है गुपचुप ....

चलो चाँदसे बात करें

आज सहरमें पढ़ी अख़बारके सफे पर कुछ लहराती महकती पंक्तियाँ गुलजारजीकी ,
ये बावरा मन ढूंढ रहा कुछ अल्फाज़ भी छुपे नज़र आ रहे थे चिलमनमें
कुछ पगलाई सी कोशिश कर ली हमने अनजानेमें ही .....
खुशबू जैसे लोग मिले अफ़सानेमें
एक पुराना ख़त खुला अनजानेमें
शाम के साये बालिश्तोसे नापे है
चाँदने कितनी देर लगा दी आने में ......
=गुलज़ार

कुछ कोशिश नाकाम सी की यूँ हमने ....
अफसानोमें बीते कल की खुशबूएं मिली
हर सफा महकसे सराबोर था ......
पिला सा कागज़ था कुछ दरारोंसे सजा हुआ
पुराने ख़तके खंडहरमें खड़ा वो इश्कका अफसाना फिर भी ताज़ा था .....
ढलते सूरजने मेरी हयातके काले सायेके कद को लम्बा कर दिया ....
फिर भी ढलती शामके अंधियारेमें चाँदने मेरे साये को छुपा लिया .....
कहते है पल एक इंतज़ारका एक सदी सा लगता है
तुमसे वादा किया था मिलनेका आज चाँद रात को
सूरज आज रुक रुक कर चलता रहा
और चाँद भी नंगे पांव चुपकेसे छुपता हुआ आ रहा था
इस बेमुरव्वत ज़मानेकी नजरसे ....

16 नवम्बर 2010

एक फ़िक्र .....

एक पतले कांचका गिलास था हम दोनों के दरम्यां ........
उस पार आप इस पार हम ......
बस एक ही जरिया एक दूजे को देखना ....
निगाहें बहुत कुछ शब्दोंको समेटकर बैठी थी ...
पढ़ रहे थे ...
महसूस ना कर पाए उसकी शिद्दत हम ....
एक हाथसे गिलास तोड़ दिया ...
किरचें चुभी ...
खून बहने लगा ..टीप टीप बुँदे गिरने लगी उनके दुपट्टे पर .....
नए गुलाबी दुपट्टे का कोना फाड़ कर
मेरे घाव पर पट्टी बांध दी ...
चुप चाप ऊँगली को चूमा और चले गए .......

15 नवम्बर 2010

मेरा पता ....

एक दिन का इंतज़ार था मुझे
जब ख़ुशी मेरे द्वार पर मुझसे मेरा पता मांगे ....
बस कल उसने दस्तक दी
और मैं उसके साथ चल पड़ी .......
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नज़र तो झुकी रह जाती है
इश्क फिर भी बोलता रह जाता है ....
कभी इश्क खामोश रहकर भी
सफे पर दास्ताने लिख जाता है ..........

13 नवम्बर 2010

टेस्ट योर सेल्फ

देवता इंजीनियर बने तो ??:
ब्रह्मा : सिस्टम इन्स्टोलर
विष्णु : सिस्टम सपोर्टर
महेश : सिस्टम प्रोग्रामर
नारद : डेटा ट्रांसफर
यम : deliting सिस्टम
मेनका : सिस्टम वायरस .....
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टेस्ट योर सेल्फ :
क्या आप नोर्मल इंसान है ????तो आप ये चीजें जरूर करते होंगे .....
1 .रोज पूरा अख़बार पढ़ते होंगे पर पहले पेज की हेड लाइन कौनसी थी वो याद नहीं होगा .....
2 .मोबाइल कहीं जैसे तैसे रख दिया होगा तो दस मिनट तक ढूंढते रहोगे पर दुसरे फोनसे रिंग करके मोबाइल ढूँढने की ट्राय नहीं करेंगे .........
4 .उम्मर बड़ी हो गयी पर अंगत अंगत पढना नहीं चुकते होंगे ....
5 .खास संभालकर रखी चीज कहाँ पर रखी है भूल जाते होंगे .....
6 . तीन नंबर का लक्षण आप पर लागू नहीं होता होगा ........
7 . तीन नंबर का लक्षण कौनसा होगा वो देखें ऊपर जरूर देखा होगा ....
8 . तीन नंबर का लक्षण है ही नहीं उसका अब जाकर आपको पता चलेगा ...
10 . ये दसों लक्षण नोर्मल है और चिंता करो नको आपका नौवा लक्षण भी नोर्मल ही था ......
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life changes from class room 2 office ...books 2 files ...pocket money 2 salary ...girl friend 2 wife ........
magar friends ????kabhi nahin badlate ....wo to KAMINE hi rahte hai ..........

12 नवम्बर 2010

आज बस यूँहीं ....

आज कल सुबह सुबह बहुत अँधेरा रहेता है तब चलने निकलती हूँ ...कल एक पॉँच साल की लड़की अपने हाथ में आठ नौ महीने का बच्चा उठकर फटे हुए कपडेमें एक हाथ में बच्चा और दुसरे हाथ में दूधकी पोलीथिन बेग उठाकर चल रही थी .....बच्चा रो रहा था ...उस मासूम ने उसे दूध की बेग थमा दी ...वो बच्चा चुप हो गया ...मैंने उसे पूछा कहाँ रहती हो ???उसने हाथसे सामनेवाली फूट पाथके तरफ ऊँगली की वहां उसकी माँ उसकी राह देख रही थी .....
बहुत कुछ विचार आते रहे जाते रहे ...इस मासूम के लिए जिंदगी क्या है ? वो छोटा बच्चा इस दुनियामें आया है पर जीने का हक़ या मतलब क्या है उसके लिए ....ये लोग दो गरीब लोगके वहां शायद बिनबुलाये मेहमान की तरह आये होंगे .....दिल थोडा दुखी हो गया .......तब आते आते ऊपर नज़र उठी और ऊपरवाले का शुक्रिया कहा ....तुने हमें कितना कुछ दिया है पर हमने कभी तेरा शुक्रिया नहीं किया ....घर आकर लगा मैं सच मुच बहुत धनी हूँ ...पैसे से ना सही पर बहुत कुछ है मेरे पास .....उस बच्ची का चेहरा और वो छोटा सा बच्चा अभी भी दिख रहे है मुझे ....
दुनिया में हर प्राणीने अपनी सारी कुदरती हदों का पालन किया है इसी लिए वो शायद गूंगे होते हुए भी हमसे सुखी है पर एक हरी नोट ने इंसान को इंसान से बाँट दिया है ..........अलग रखा है और ये खाई दिन ब दिन बढ़ती जा रही है ...एक जगह रूपये के समुन्दर है और एक तरफ पेट में गहरा गढ्ढा ........
लगता है ये बुध्धि ही हमारी सबसे बड़ी दुश्मन है ......

11 नवम्बर 2010

इंतज़ार ...

कल आऊंगा मिलने आपसे
करीब पॉँच साल पहले उसने मुझे कहा था ,
तक तक अँखियाँ थक गयी
पर वो आया नहीं ....
कोई मजबूरी रही होगी
या कोई मुझे ढाढस बंधाने के लिए कहा होगा ,
पर एक बात हो गयी
उसका इंतज़ार मेरी जीने की वजह बन गया ....
एक उम्मीद मेरी साँसों को जिन्दा कर गयी ....

9 नवम्बर 2010

एक नया पल पुरानासा ...

एक नया सफ़र भविष्यकी दिशा
कुछ देखी कुछ धुंधली ...
पर सड़क रहगुजर
कभी कोई हमसफ़र
कभी बिलकुल अकेली .....
एक नए साल की शुरुआत हुई
बहुत सी उम्मीदे लेकर आती है
कुछ उम्मीदे पाती है
कुछ राहोंमें तनहा छुट जाती है ...
फिर भी उम्मीदका दामन नहीं छोड़ा ,
एक एक साल करके एक एक पल करके हर साल
मुठ्ठीमें रेत की तरह सरकता सा चलता गया ...
तनहा ,भीड़ में ,गाता कभी खामोशसा ....
देखो एक और मुठ्ठी खुल रही है ...
मेरी हथेलीसे नयी रेत सरक रही है ......

5 नवम्बर 2010

दीपावली ...


जिंदगी का रौशन हर दिन है ,
हर सुबह कुछ खास ,हर शाम भी हसीं है ,
तुम हो जब साथ तो हर दिन दशहरा है
तुम हो जब साथ तो हर रात दीवाली है ,
बस दीपकसे जलते रहे ,खुद को कुर्बान करते रहे ,
इस दुनिया को जरूरत है उजाले की ,
चलो आज दिल को खुद के रोशन करते रहे ......
दिया जलता जब तक तेल बाकी है ,
ये दिल है इसमें अभी कुछ कर गुजरने का अरमां बाकी है ...,
ये उजाले की लौ को ना ख़त्म होने दे....
आज कोई अँधेरी गली को रोशन कर चले .....

1 नवम्बर 2010

शिकवा शिकायत ..

शिकायत है आपको
हम कुछ बोलते नहीं
खामोश रहते है ...
मिलते है तो सिर्फ सुनते है .....
पर ये शिकायत आपकी जायज नहीं ....
हमारे बिन कहे आप सब तो समज जाते है ....
हमें कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती ....
ये जहाँ हमारी कही बात ना समज सका अब तक ,
एक आप ही तो है जो हमारा दिल पढ़ लेते है ,
हमारे अरमान बिन कहे सुन लेते है ....
बस ये अदा ...बस यूँही खाली शिकवा ????