31 अक्तूबर 2010

दीवाली का तोहफा ....

रेक्स यानी राही सुबह से देख रहा था .....खुशबू कलसे अलमारी की सफाई कर रही है ...कुछ किताबें कुछ फोटो बार बार देख रही है ..फिर कहीं खो जाती है ....दस बजे खुशबू रोज की तरह टाइम स्क्वेर के ऑफिस में जाने को निकल गयी ....रेक्स घर पर रहा ...शाम की शिफ्ट रिक्वेस्ट करके ले ली ...वो अलमारी टटोली ...वो किताबें ख़त फोटो सभी देखा ...........
फिर निकल गया अपनी कार में ......
दो टिकेट्स ......जयपुर .....
शाम को रेक्स तो ड्यूटी पर चला गया ...कुरिअर आया ...खुशबूने एन्वेलेप खोला ...दो टिकट इंडिया जयपुर ....अपनी और रेहानकी .........सपना सा लगा और खुश भी हुई ....शाम को पॉँच बजे रेक्स का फोन आया ...उसे आज रात को ही ड्यूटी परसे सीधे ही एक कोंफरंस के लिए पेरिस रवाना होना पड़ेगा .....उसने बैग पेक करके ड्राइवर के साथ ऑफिस भिजवा दी...खुद के पेकिंग भी शुरू की ...इंडिया जाने में सिर्फ दो दिन बचे थे ...रेक्स तो पॉँच दिन बाद आने वाला था ....उसने ही टिकट बुक करवाई थी ...इस लिए उसे तो सब पता था .....खुशबू अपने बेटे रेहान को लेकर रवाना हो गयी ....
पुरे दस साल के बाद वो भारत लौटी थी ...रेक्ससे शादी मा बाप को पसंद नहीं थी ...रिश्ता तोड़ लिया था ....ना फोन ना ख़त ...पता नहीं अब बुलाएँगे या नहीं ...पर एक बार देख लुंगी तो तसल्ली हो जाएगी ....रेक्स एक अनाथ था बस उसका यही कसूर था .....प्यार के लिए उसने सब कुछ छोड़ दिया था ...सब विमान यात्रा के दौरान ताज़ा हो गया ......जयपुर वो अपने घर में पहुंची ....वहां पर अब कोई और रह रहा था ...उसे ठेस लगी ...उसने गली में दुसरे पहचानवाले से पूछा अपने फेमिली के बारे में ...तो एक बुजुर्ग ने कहा वो लोग अब पुराने शहर की एक छोटी सी गलीमें रहते है ...सारी दौलत चली गयी ...उसके बापू रिक्शा चलाते है और मा दूसरोके बर्तन साफ़ करती है ...भाई तो आवारा होकर कबका जा चूका ....खुशबू रो पड़ी ...उसने पता लिया और चल दी .......
उस गली उस नुक्कड़ पर ...आज रिक्शा घर पर थी ...सामने टूटी चार पाई पर उसके पिताजी सोए हुए थे ...बीमार थे ...उसने दस्तक दी .....मा बाहर आई ....पुराने खुमार और खूबसूरती अब गरीबी के चोले में दफन हो चुकी थी ...बालों की सफेदी कुछ जल्द ही आ गयी थी ....
मा ...खुशबूने आवाज लगाईं ......
पिताजी खटिया से उठ खड़े हुए ......मेरी तिब्बो ( उसका प्यार का नाम )
मा दौड़कर लिपट गयी ......
मा , बेटी पराया धन है पर आपने मुझे इतना पराया कर दिया ....??????
रेहान सब देख रहा था दरवाजे पर खड़ा खड़ा ...उसे खुशबू ने अन्दर बुलाया ...अपने पिताजी के हाथ में उसका हाथ दिया ...पिताजी ये आपका नाती ...रेहान .....ये तो सूद था ...मूल से भी प्यारा ........तीसरे दिन दीवाली थी ....ये दीवाली इन तीन रिश्तो की असली दीवाली हो चुकी थी ......दीवाली की सुबहमें एक टेक्सी रुकी वहां ....खुशबू ने देखा उसमे से रेक्स उतरा .....बड़ा ही खुश ........उसने सबको पहने कपडे में ही उधर से उठाया ....
जयपुरमें उनकी पुरानी हवेलीके पास गाडी रोकी ....उसकी चाबी अपने ससुर समशेरसिंह को दे दी .....और कागजात भी .....समशेरसिंह क्या कहते ??????कुछ बाकी नहीं रखा था इस दामादने जो बेटेसे भी बढ़कर साबित हुआ .......
खुशबू रेक्सको जानती थी ....उसके चेहरे पर गम का साया ना आने देगा कभी ये शादी के वक्त किया हुआ वादा उसने आज पूरी तरह निभाया था .......
रेक्सने हँसते हुए ससुरसे कहा ...देखो पिताजी आपको मेरे क़र्ज़ तो चुकाना ही पड़ेगा ...दामाद हूँ छोडूंगा नहीं ...आपका तो मैंने शादी का खर्च और दहेज़ भी बचाया है ...वो अब वसूल करने आया हूँ ....बस मेरे मा बाप नहीं है ....उन्हें देखा भी नहीं ...आज आपकी जिंदगी में मुझे दामाद नहीं पर बेटा बना लीजिये ....मुझे दीवाली का तोहफा दे दीजिये .....
समशेरसिंह ने उसे गले लगा लिया ....

28 अक्तूबर 2010

कुछ टुटा टुटा सा

कुछ टुटा टुटा आज सुबह में पैर में चुभा
एक सपना था ........
कांच का था शायद ....
तीखा नुकीला ..नुकीला ....
खून ना बहा ....
आंसू निकले आँखसे .....
खारे खारे सागर के पानी से ...
जिसने कभी ना प्यास बुझाई मेरी ....

27 अक्तूबर 2010

क्यों ? क्यों ??क्यों ???

तुम्हे क्या कहूँ ?
तुम कभी मेरे ना थे ,
तुम्हे भी कोई हक़ नहीं बक्शा मैंने ,
क्योंकि मैं तुम्हारी ना कोई ........
फिर भी बार बार सामना हो जाता है
कोई पहचान होने का अंदेसा हो जाता है ,
वो तस्वीर दिल की दीवारोंसे फाड़ कर जलाकर
राख तक दफन कर दी थी जमींमें ....
फिर भी आँखें बंद करने पर उभर आती है .....
क्यों ?
क्यों ??
क्यों ???
जो दिल से बना रिश्ता होता है
ना आग जला सकती है ,
ना पानी बहा सकता है ,
ना जमीं दफना सकती है ,
एक कशिश को कसक भी बनाकर
कसक को भी प्यार का नाम देकर
प्यार के नाम दो सुनहरे पल जी लिए जाय .....

26 अक्तूबर 2010

लौट आया पहला प्यार .....

लौट आया पहला प्यार .....
चलो उसकी उंगली थामकर भाग जाते है कहीं दूर .....
जहाँ भीड़ ना हो तनहाई हो
कोई अपना ना लगे ,अजनबी बस अंदाज़ हो .....
एक कोने के पेड़ के नीचे बैठ पंछीका अनसुना गीत सुने ...
और नर्म मुलायम घास पर लेटे हुए
एक गहरी नींद आ जाए .....
ठंडी लहराती हवा मेरा दुपट्टा मेरे चेहरे को ढक जाए ....
एक ठंडी तनहाई ,जहाँ बस मैं और मैं ...मेरे पास ना कोई .....
उस गलियारेमें फोड़े पटाखेंकी बारूद की बास ताज़ा हो गयी ,
पैर के तलवे पर पड़े हुए बुझी हुई फुलजड़ी के वो छाले फिर ताज़ा लगे .....
आंगनकी रंगोली अभी जैसे बिखेर गया है कोई ,
अभी था जो ये रोशन दिया शायद अभी ही बुझा हो ....
एक मिठाई जो सिर्फ जहनमें खा सकते है
भाई बहनके साथ एक बट्टा चार खाई थी ....
पैर छूते हुए दादीमा की चवन्नी फिर याद आई है .....
उस अमीरी के पास आज ग़ुरबत लगे है खाली खाली
चलो भाग चले दूर दूर कहीं लौट आया है मेरा पहला प्यार ....
चलो इस दीवाली वो चाचाकी बेटीसे अचानक मिलने जाते है ,
वो पहली फुलजड़ीको फिर साथ बैठकर एक दिए से जलाते है ...

25 अक्तूबर 2010

तलाश तलाश .....

नज़रे मत झुकाओ
तुम्हारे नज़रकी आतिशकी
रौशनी बह जाने दो
मेरे दिल को उसका इंतज़ार ही है .....
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खफा खफा से रहना
हसीनोकी आदत है ...
उन्हें क्या पता उनके रूठे रुखसार के
हम तो कायल है ....
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कहाँ जाएँ मंजिल का पता नहीं मालूम
चल पड़े हम फिर भी
सोच कर यूँ की
कदम जहाँ पर रुकेंगे मंजिल वहीँ होगी .....

24 अक्तूबर 2010

वो बरगदका पेड़ घना ...

उनसे मिलनेको दिल कर रहा बड़ा
कितने अरसेसे उन्हें मिले नहीं
पता नहीं मेरे पास उनका
कोई उनके शहरका नाम नहीं
यादोंकी बस्तीमें आशियाना था उनका ,
एक बरगदके पेड़ के नीचेकी चौपाल ,
शाख पर बैठे घरौंदेमें पंछी
हमारे मिलनके है साक्षी
हमारे दिलकी बातें उन्हें भी समजमें आती
एक दिन ....
एक दिन .....
उन्ही पंछीके घोंसलेसे बड़े हुए बच्चेकी तरह
हम उड़ गए दूर ....
अपने अपने आकाशकी तलाशमें दूर दूर ...
आकाश के एक सिरे को दुसरे छोर की तलाश अब
चलो एक बार उस चौपालसे जाकर पूछ लूँ
क्या वो आये थे ,क्या किसी टहनी पर पता छोड़ गए थे ......???
मैं उस छोर पर था वो इस छोर पर बरगद की छाँवमें
टहनी पर पता ढूंढते ढूंढते एक दूजे से टकरा गए .....

23 अक्तूबर 2010

हाइकु : चाँद

चाँद तश्तरी
दूध भरा तालाब
डूब जाए यूँ .....
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चाँद दुल्हन
शर्माती है रातोंमें
अकेली यूँ ही ....
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चाँद कंगन
पहन कर खुश
पागल रात .....
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बिंदिया चाँद
सजा गयी चेहरा
घूँघटमें हँसी .....
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खुबसूरत
कौन है ? चाँद या
महबूबा है ?
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नशीले जाम
रात भरके लायी
चांदनी नशा .....

22 अक्तूबर 2010

शरद पूर्णिमा ...

आज पूनमके चाँदको भी रात का इंतज़ार होगा ,
धरतीसे मिलने उसका दिल भी बेकरार होगा ...
तारोंकी बारात भी क्या खूब सजाकर लायेगा ,
सफ़ेद दूधकी धारामें नहाकर आता होगा ,
अपने पुरे रूपमें क्या वो दाग सजाता होगा ?
या उसकी माँ ने भी उसे नज़र का टिका लगाया होगा ????
आज छत पर लेटे लेटे देर तक तेरी चांदनी को पी लेंगे ,
धुपमें तपती रही इस रूहको शीतलता की चादर ओढा देंगे .......

21 अक्तूबर 2010

तुमसे मिलने पर ....

मुझे चुप रहना भी आता था ,
पर उनसे नज़र क्या मिली जुबाँ ने सारे बंधन तोड़ दिए .....
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सुकूनसे बसर करने की आदत थी वक्त को भी ,
बस तुमसे मिलने आते है तब वो क्यों पंख लगाकर उड़ने लगता है ??
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तुम्हारी आँखोंसे देखी दुनिया तो
क्यों इतनी बदली बदली सी नज़र आती है ??

19 अक्तूबर 2010

हाइकु : दिल

दिल तो दिल
धड़के तो जिंदगी
बंद तो मौत .....
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दिल बेजुबां
अनकही दास्तान
आँखों से बयां
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टूट जाता है
आवाज नहीं आती
आंसू आते है ....
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ख़ुशीमें डोले
धड़कन चीखती
बोलती रही .....
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कांच का घर
नजाकत है हुस्न
शीशेसा साफ़
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दिल खिलौना
कभी किसीने खेला
तोड़ भी दिया ....
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जुबाँ जूठी है
दिल को नहीं आती
जूठी नौटंकी
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मर्द का सख्त
औरत का कोमल
दो रूप है दोनोंके ....
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दिल क्या कहे ?
धड़कन की जुबाँ
दिल समजे ......
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18 अक्तूबर 2010

वक्त .....

उस टूटे हुए खंडहरकी टूटी दीवारों पर
कुछ कुरेद कर देखा
अनकही दास्तानोंकी किताबें थी ,
पढ़ते पढ़ते रात गुजर रही ,
ना उजाला था ना शमाकी ज्योत ,
सोचा अँधेरे को पढने अँधेरे को ही रौशनी बना लेते है ....
कान में फुसफुसा कर बीते सुनहरे पलोंको उजागर करती रही ,
ख़ामोशीसे अश्क भी बहते रहे उसकी दरारोंसे ,
कही अनकही हर दास्ताँने कहा
यहाँ कायम कुछ नहीं वक्त के सिवा ...
वक्त आता है वक्त जाता है
हर लम्हे पर अपना निशाँ बनाते चला जाता है .....

16 अक्तूबर 2010

एक नन्ही परी ...


कल गुडियासे खामोश बातें कुछ ऐसे थी :
उसने मेरी आँखमें आँख डालकर कहा
अय नेनी मुझे पता है तुम हो शैतानकी नानी
पर अब सुधर जाओ मैं आ गयी हु
अब आप थोड़ी गुड गर्ल बन जाओ ना !!!
तो मैंने कहा हमारे सुधरने के कोई चांस दूर दूर तक नहीं
अब तो हमें शैतानी का ओफ़िशिअल परवाना मिल गया ....
अब हम बंदरको चाबी भरकर नाच नचाएंगे
गुडिया की शादी भी रचाएंगे ,तेरे साथ भालू का नाच देखने जायेंगे
और रिमोट वाला हेलिकोप्टर भी साथ उड़ायेंगे .....
और बच्चू तुम को आये तो एक घंटा भी नहीं हुआ
हम तो अडतालीस साल से यहाँ विराजमान है ...
ये मम्मी पापाको बच्चे को डाँटते रहनेकी जन्मजात बीमारी होती है
हम नाना नानी दादा दादी उस बीमारी का अक्सीर इलाज है ...
तुम्हे डांटसे बचायेंगे ,तुम्हारे मा बापको इस बहाने हम भी सतायेंगे ...
सोच लेना हमारी दोस्ती सिर्फ फायदेका सौदा है ...
हमसे ये दोस्ती करना एक मस्त अनुभव रहेगा ...
तुम नाना की खिचड़ी मुछे खींचना और बाल भी नोच लेना
ऐसे मस्त काम जब तुम करोगी हर वक्त दो चोकलेट दिलवाएंगे ....
तो दोस्ती पक्की समजू ना ?????
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कल हमारे परिवारमें बीस साल के बाद दुर्गाष्टमीके पर्व पर लक्ष्मी का आगमन हुआ उस परी को पहली बार गोदमें उठाने के अविस्मरनीय एहसास उसी के नाम .......

15 अक्तूबर 2010

एक दास्ताँ

वो ख़ुशी जो आँखे बयां कर गयी अश्कके मोती बनकर ,
बस कुसूर इतना रह गया की जुबाँको खामोश कर गयी ....
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कोई क्या कहेगा जब दीवारें सामने हो ,
कभी ये भी देख लेते तो पता चलता
दीवारों के भी कान होते है ,वो सुनती है ,
इतिहास गवाह है दास्ताने भी सुनाती है वह ....

14 अक्तूबर 2010

रोबोट

कल एक फिल्म देखी "रोबोट "....
एक सायंस फिक्शन फिल्म ...जिसे हम एक अच्छी फिल्म कह सकते है जो भारत में बनी है ....वैसे तो जो लोग इंग्लिश फिल्मे देखते है उन्हें ये फिल्म कुछ खास नहीं लगेगी पर ...जरा हटके स्टोरी ...विज्ञानकी मददसे हमने रोबोट बनाया और फिर उसमे मानव का एहसास भी भरा जाए तो क्या हो सकता है उसका भारतीय स्टाइल में अद्भुत चित्रण ....शाहरुख़ ,आमिर ,सलमान से अलग रजनीकांत क्यों साउथ इंडिया में इतना पोप्युलर है ये पता चलता है ...गानों का फिल्मांकन भी कुछ हटके है वैसे ऐसी फिल्मों में गाने ना हो तो भी चले ....मानव की बनायीं गयी मशीन मानव के लिए कितनी परेशानी पैदा कर सकता है उसका अच्छा चित्रण ....फिल्म में सिर्फ और सिर्फ रजनीकान्त है ....फिल्म की एक्शन हमें सिटमें बांधकर रखती है ...अंत थोडा ज्यादा ही खिंचा गया है ...पर कुछ अलग देखना चाहते हो तो एक बार देखें ....
एक बात थोड़ी सी अखरी...अमिताभ बच्चन जैसा मिलेनियम स्टार का नाम भी सिर्फ अमिताभ बच्चन ही लिखा जाता है पर रजनीकांत का नाम सुपरस्टार रजनीकांत लिखकर आता है .....
वैसे फिल्म देखनी हो तो दिमाग और तर्क को घर की तिजोरी में लोक करके जाइए ..तो मजा आएगा .......

13 अक्तूबर 2010

चाँद भी ना !!!

कल चाँदने सिफारिश की तुम्हारी मुझसे
कहा ये लो थोड़े सितारे और लिख दो ग़ज़ल
मुझे कागज़ बना लो लिख दो मुझ पर एक पैगाम ,
महबूबा पढ़ लेगी जिसने तुम्हारे इंतज़ारमें आँखें बिछा दी है ......

12 अक्तूबर 2010

दूर एक ख्याल बैठा मुस्करा गया ...

मन पंख लगाकर उड़ चला कहीं दूर ,
अब जिस्म क्या करेगा तनहा यूँ जीकर ?????
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कभी आंसू की बूंद को सूरज की किरणके सामने उंगली पर रख देखा है ?
उसने भी एक मेघ धनुष्य छुपा रखा है अपने अन्दर .....
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आज उल्ज़ी उल्ज़ीसी जुल्फोंको सुल्ज़ा रही थी वो खिड़कीमें आकर
और दूर एक ख्याल बैठा बैठा मुस्कुरा रहा था मेरे होठो पर ...

10 अक्तूबर 2010

तोहफा

तनहाईकी गली से गुजर कर देखा तो बहुत थे वीराने
वीरानोके बीच सूखे पत्ते से थे उड़ाते हुए कुछ अफ़साने
अफ़सानेके सफों पर उठाकर देखा तो
तेरा और मेरा नाम लिखा था ...
कुछ पहचाना कुछ अनजानासा पयगाम लिखा था ...
ये सफे पता नहीं किस किताबसे उड़कर बिखरे है ???
पर इनसे मुझे पता चला
कोई मोहब्बत जाया नहीं जाती है ...
दिलकी कलमसे लिखा हर खामोश अफसाना
कह जाता है बहुत कुछ जो अनकहा भी रहा हो ....
उठाकर उस पत्ते को मेरे साथ ले आया
सबसे कीमती तोहफा मुझे मिला
आज मेरे नए जन्मदिन पर ......

8 अक्तूबर 2010

एक सुबह

एक उजलीसी किरन हंस पड़ी
खिल गयी एक कली उसे देख ,
बस भंवरे को इंतज़ार था उसके खिलनेका ,
एक फूल से भौरां उड़कर गाने लगा एक तराना ....

7 अक्तूबर 2010

दहलीज पर नवरात्री है आज

आज पितृ पक्षका आखरी श्राध्ध है .श्रध्दा का दिन ,तर्पण का दिन , अपने बुझुर्गोके प्रति नमन करने के दिन ....
पर कलसे हमारा गुजरात रात को जागेगा ...नौ रातो तक आपको देखने मिल सकती है यहाँ पर गरबा की हिलौर ...यहाँ बच्चे से लेकर सभी पर इसका खुमार चढ़ चूका है ...बाज़ार में पारंपरिक परिधान खरीदने के लिए खूब भीड़ जम चुकी है ...नए नए डिजाइन आ चुकी है ...उसके साथ उसके अनुरूप गहने भी ...जींस टी शर्ट पहनकर घुमने वाली लड़की चनिया चोली में नज़र आएगी ...गरबा ग्राउंड अपनी सजावट की चरम पर है ....
मा की मूर्ति रखी जायेगी ...और बड़े बड़े म्यूजिक सिस्टमसे सज्ज हो रहे ये मैदान ...चकाचौंध रौशनी ...
ये ऐसा माहोल है जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है ...इसके लिए एक बार आकर यहाँ देखें तो पता चले की गुजरातमें बहु बेटियां रात देर तक गरबा खेलती है बिलकुल निर्भय होकर ...मा की भक्ति और आराधन का पर्व है ये ...यहाँ के गली चौबारे भी छोटे छोटे गरबे का आयोजन करते है .....
एक छोटे से मिटटी के मटके में छेद होते है उसमे दीपक प्रज्वलित करके रखा जाता है जिसे गरबा कहते है ...और जो गीत गए जाते है उस रूप में मा शक्ति की आराधना की जाती है और इस गीत को गरबा के नाम से प्रसिध्ध किया गया है ....प्राचीन और अर्वाचीन दो स्वरूप होते है इस के ....समूह में की जाती ये एक तरह से मा शक्ति की उपासना का ही रूप है ये .....
घर में भी एक टोकरी में ज्वार उगाकर उसे मिटटी के घड़े वाले गरबे के साथ प्रस्थापित किया जाता है और मा शक्ति का अनुष्ठान किया जाता है ...बहुत कठिन उपवास भी किये जाते है ...अष्टमी को हवन भी होता है ...नौवे दिन समापन होता है तब ज्वार और गरबा को नदी या जल स्थल में विसर्जीत किया जाता है ...मा के मंदिर में भीड़ लगी रहती है .....आप उसको इंटरनेट पर देखते हो और खुद आकर देखो इसमें बहुत फर्क होता है ....
और ये जरूर कहूँगी मेरे शहर वड़ोदरा का गरबा तो पूरी दुनिया में मशहूर है ...क्योंकि इसके प्रारूप में अभी भी प्राचीन गुजरात की महक है .........

6 अक्तूबर 2010

आज क्विज़ टाइम

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मारे हुए इंसान के मुंहमें क्या डालना चाहिए ?
-बिरला प्लस सीमेंट ..क्योंकि इस सीमेंट में जान है .....
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१३ का क्यूब रूट क्या है ?
=सुरूर ..क्यों की तेरा गुना तेरा गुना तेरा =सुरूर
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कंगारूमा क्या बच्चा खो गया तब वो क्या बोली ?
=हायला ,मेरी पॉकेट किसीने मार ली ...
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जो लड़की कभी हंसती ना हो उसे क्या कहते है ?
=हसी=ना
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जिसका दिल टूट गया हो उसे क्या जनरल नोलेज क्यूँ नहीं देना चाहिए ?
=क्यों की जब दिल ही टूट गया तो जी .के .क्या करेंगे ???
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अगर तेरा प्यार पाना है ...
वाह वाह ...वाह वाह ...
अगर तेरा प्यार पाना है ....
................
तो मेरा प्यार स्क्रू ड्रायवर है ...

5 अक्तूबर 2010

कल आये थे वो

कल सपनेमें वो आये थे चाँद बनकर ,
आधा चाँद ढका हुआ परदेमें ,
शर्म से लाल थे रुखसार ,
कांपती उंगलिया ,
थरथराते होठ ,
झुकी हुई पलके ,
बस एक इल्तजा लिए
इकरारे मोहब्बतकी बैठा रहा
तकिये पर खुली खिड़की पर पलकें बिछाकर
वो चाँदसे उतर आयेंगे
और इजहार करके जायेंगे ....

4 अक्तूबर 2010

टुकड़ा टुकड़ा ....

शायद तनहासे शायद अकेलेसे
दो पलके बीच छुपे वक्तसे हम ....
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ना मिलना तुमसे ये तय कर लिया
बस फासलेका एक बहाना बना लिया .....
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बेमुरव्वत कभी ना था ये जहाँ किसी के लिए
कुछ कमी रह गयी हमारी कोशिशोंमें तुम्हे शिद्दतसे पा लेने की ....
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ख्वाबोंके चंद टुकड़ो पर पल गया
एक हाथमें बचपन और दूजेमें जवानी लेकर
मेरी जिंदगीका एक टुकड़ा ......

3 अक्तूबर 2010

सूखे पत्ते पे सवार

दिनके मंज़र पर रातका सवाल
खामोशसा खड़ा इंतज़ारमें है ,
वो चाँद आज किस रूपमें आएगा ???
पूरा खिला होगा या फिर रातके अँधेरे में छुप जाएगा ???
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सूखे पत्तेकी रगों में एक नज़्म मिली
एक दास्ताँ थी मोहब्बतकी बेजांसी
जिसमे महक इश्क की अभी भी बाकी थी ,
बस इक दीदार हो जाए तो वो हवाके साथ बह जाए ....!!!!

2 अक्तूबर 2010

एक देशवासीका इकरारनामा

मैं गाँधी नहीं हूँ ,
सत्य मेरा सिध्धांत नहीं ,
अहिंसाके साथ असहिष्णु हूँ
हरी नोट मेरा मजहब है ....
क्योंकि मैं गाँधी नहीं हूँ .........
गरीबीके पहनावे पर
भ्रष्टाचार मेरा गहना है
निरक्षरतासे लाज नहीं आती मुझे
इसी लिए मैं गाँधी नहीं हूँ ......
औरत जात को मान देते वक्त अपने को हीन पाता हूँ ,
विज्ञानंके उपयोगसे बच्चीको कोखमें ही मिटाता हूँ ,
फिर भी मेरा देश है महान ,
शायद इस लिए के मैं गाँधी नहीं हूँ .....
मेरी आत्मा कचोटती है आज मुझे
इसी लिए आपको हेप्पी बर्थडे कहते हुए शर्माता हूँ
कैसे नज़र मिलाऊ आपसे जिसने हमें आज़ादी दिलवाई ,
सिध्धांतोको आपके कुचलकर कैसे कहूँ की मैं गाँधीके देश का वासी हूँ .....

1 अक्तूबर 2010

तलाश ....

तेरे इंतजारमें बिछी आँखोंको
सुकूनकी तलाश तेरे दीदार की ,
या तो खुद आ जा
या संदेसा भेज तेरे आने का ...
इतनी भी देर मत कर यारा ,
तेरे इंतज़ारमें मेरी रूह
निकल जाए दूर किसी राह पर
बस तेरी तलाश बनकर .....