कहीं कोई उम्मीद बाकी है
वर्ना रोज खिड़की पर निगाहें नहीं दौड़ जाती !!!!
कहीं कोई उम्मीद बाकी है
वर्ना इंसानियतका नर्म चेहरा यूँ नज़र नहीं आता !!!
कहीं कोई उम्मीद बाकी है
वर्ना तुम पर यूँ ऐतबार कायम ना होता !!!!!
कहीं कोई उम्मीद बाकी है
ना उम्मीदीकी सारी वजह के बाद हमारी यूँ मुलाकात नहीं होती !!!!!
जिंदगी मेरे लिए ख्वाबोंके बादल पर उड़नेवाली परी है .!! जो हर पल को जोड़ते हुए बनती है, और उन हर पलोंमें छुपी एक जिंदगी होती है ....
31 अगस्त 2010
30 अगस्त 2010
ख़ामोशी
कल दूर दर्शन पर ब्लेक एंड व्हाईट एरा की एक ख़ूबसूरत फिल्म देखी ...
"ख़ामोशी "......धर्मेन्द्र ,वहीदा रहमान ,राजेश खन्ना ....
गुलज़ार के संवाद और गीत और असितसेन का दिग्दर्शन ...
ख़ामोशीकी जुबाँ शायद सबसे मुश्किल जुबाँ है समजने के लिए ....एक पागलको ठीक करते हुए एक नर्स को मरीज़से प्यार हो जाता है और ठीक होते ही वो मरीज़ अपने पुराने प्यार के पास लौट जाता है ...हाँ वो नर्स के लिए बड़ा ही शुक्रगुजार रहता है ....
दूसरी बार वैसे ही एक मरीज़ का इलाज करने के लिए नर्स मना कर देती है जिस पर डॉक्टर ऐतराज़ करते तो है पर उसकी मर्ज़ी का पालन भी करते है ...बस उस वक्त एक हादसा उसे इलाज करने को मजबूर करता है और फिर वो उस काम के लिए राज़ी हो जाती है ...पर जब मरीज़ ठीक होता है तो वो पागल हो जाती है ॥
उसकी डायरी से पता चलता है की हर कोई ये भूल गया था एक नर्स के साथ वो एक इंसान भी है जिसके खुद के जज्बात होते है ,उसके एहसास होते है .....
बस ये ख़ामोशी कितनी गलत फहमी या खुश फहमी पैदा करती होगी वो तो वही बता सकते है जिससे इस रहगुजर से गुजरना पड़ा हो ..... आज कल सबके जज्बातों का इस्तेमाल करना आम बात हो गयी है ...लोग पुराने कपडे की तरह लोगो को भी अपनी गरज ख़त्म होते ही जिंदगी के बाहर फेंक देते हिचकते नहीं ....
शायद ये फिल्म देखते मैंने जो भी महसूस किया वो मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती ....पर बस ये जज्बातों की अहमियत को भुला कर जी रहे लोग कहाँ जा रहे ये उन्हें शायद नहीं पता ....
"ख़ामोशी "......धर्मेन्द्र ,वहीदा रहमान ,राजेश खन्ना ....
गुलज़ार के संवाद और गीत और असितसेन का दिग्दर्शन ...
ख़ामोशीकी जुबाँ शायद सबसे मुश्किल जुबाँ है समजने के लिए ....एक पागलको ठीक करते हुए एक नर्स को मरीज़से प्यार हो जाता है और ठीक होते ही वो मरीज़ अपने पुराने प्यार के पास लौट जाता है ...हाँ वो नर्स के लिए बड़ा ही शुक्रगुजार रहता है ....
दूसरी बार वैसे ही एक मरीज़ का इलाज करने के लिए नर्स मना कर देती है जिस पर डॉक्टर ऐतराज़ करते तो है पर उसकी मर्ज़ी का पालन भी करते है ...बस उस वक्त एक हादसा उसे इलाज करने को मजबूर करता है और फिर वो उस काम के लिए राज़ी हो जाती है ...पर जब मरीज़ ठीक होता है तो वो पागल हो जाती है ॥
उसकी डायरी से पता चलता है की हर कोई ये भूल गया था एक नर्स के साथ वो एक इंसान भी है जिसके खुद के जज्बात होते है ,उसके एहसास होते है .....
बस ये ख़ामोशी कितनी गलत फहमी या खुश फहमी पैदा करती होगी वो तो वही बता सकते है जिससे इस रहगुजर से गुजरना पड़ा हो ..... आज कल सबके जज्बातों का इस्तेमाल करना आम बात हो गयी है ...लोग पुराने कपडे की तरह लोगो को भी अपनी गरज ख़त्म होते ही जिंदगी के बाहर फेंक देते हिचकते नहीं ....
शायद ये फिल्म देखते मैंने जो भी महसूस किया वो मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती ....पर बस ये जज्बातों की अहमियत को भुला कर जी रहे लोग कहाँ जा रहे ये उन्हें शायद नहीं पता ....
29 अगस्त 2010
धोखा
उसकी मुस्कराहट हमें हरदम धोका देती रही ,
हम समजते रहे वो खुश रहती है हरदम ,
अश्कोंकी एक जुबाँ होती है चाहे ख़ुशी हो या गम ,
बस एक अदना सी इंसान है वो कोई खुदा नहीं ,
कसक होती होगी उसे भी बस ये गलतफहमी हो गयी एक पलमे
हम समजते रहे वो खुश रहती है हरदम ,
अश्कोंकी एक जुबाँ होती है चाहे ख़ुशी हो या गम ,
बस एक अदना सी इंसान है वो कोई खुदा नहीं ,
कसक होती होगी उसे भी बस ये गलतफहमी हो गयी एक पलमे
28 अगस्त 2010
हेलो हेलो ....अ फोन कोल ...
-सर ,क्या मैं अन्दर आ सकती हूँ ?
- हाँ ,बोलो आज कहाँ जाना है ? =हंसकर आलोकने पूछा ।
-सर ,आज मेरे आंटी अस्पतालमें है ,उन्हें टिफिन पहुँचाना है ।
- ओ .के । यु मे गो ....
थोड़ी देर मे रीटाने सारा काम निपटाया और आलोक की केबिन मे रखकर चली गयी ...उत्सुक वहां पर ही था .उसने आलोक से पूछा - तुम इतनी आसानी से छुट्टी कैसे दे देते हो ?
आलोक ने हंसकर कहा - जो काम उसे कल करना था वो भी आज उसने कर दिया और देखना कल वो जल्दी भी आएगी और डबल उत्साहसे काम करेगी ...एच आर डी पालिसी को नहीं इंसानियत को फोलो करता हूँ ...
थोड़ी देर मे एक बोर क्लायंट को भी बड़ी ही नरमी से बात करके फोन रखा ...
अब उत्सुकने पूछा : यार तुम ऐसे लोग को कैसे सह लेते हो ?
आलोकने कहा : कल रविवार है .इसका जवाब अगर चाहिए तो कल सुबहमे आठ बजे तुम तैयार रहना मैं तुम्हे पिक करूँगा ।
उत्सुक तैयार था .ठीक आठ बजे आलोक उसे लेने आया .आलोकने कार एक ख्रिस्ती कब्रस्तान के सामने पार्क की .एक बेहद खुबसूरत बुके ख़रीदा .और अन्दर एक कब्र पर जाकर मोमबत्ती जलाई और बुके रख दिया .कब्र पर लिखा था जेनी दीसोज़ा .उत्सुक शांत खड़ा रहा .आलोकने मन ही मन प्रार्थना भी की .लगभग पंद्रह मिनट वहां पर बैठने के बाद दोनों बरिस्ता कोफ़ी शॉप मे गए .आलोक ने अब कहना शुरू किया ।
ये जेनी की कब्र थी .एक फ्री लांसर आर्टिस्ट थी .अपना गुजारा हो जाए उतने दिन एड एजेंसीमे काम करती रहती थी .अगर फिक्स अमाउंट मिल गयी तो महीने के बाकी के दिन छुट्टी मनाती थी .बड़ी बिंदास । खुद से बहुत प्यार करती थी .हमेशा खुश .मेरे ऑफिस के लिए भी काफी काम किया है .उसकी टेलेंट जबरदस्त थी ।
एक दिन उसने मुझे कहा : आलू ,वो मुझे आलू कचालू ही कहती थी .आलू ,तुम पेरिस जाओ और फेशन कोरियोग्राफर बन जाओ और फोटो जर्नलिजम भी करो क्योंकि उसमे तुम आसमां छू सकते हो । उसकी बात मे दम था ..शायद मेरा सपना उसने कहा था .पर मेरे पास पैसे नहीं थे .एक दिन उसने मुझे एक एन्वेलाप थमा दिया .पेरिस के सबसे बड़े फेशन स्कुल मे एडमिशन करा दिया था उसने .थोड़े दिन पहले उसने मेरे पास पच्चीस हज़ार रूपये मांगे थे .और छ महीने के बाद वापस करने का वादा किया था । लेकिन ये खर्चा तो पूरा ढाई लाख होता है ।
मैंने पूछा तो बोली : देखो मैंने अपना फ्लेट किराये पर दे दिया मैं एक रूम किचन के स्टूडियो अपार्टमेन्ट मे रहने चली गयी .उससे महीने दस हजार रूपये मिल रहे थे वो बचत और मेरी मा के नेकलेस को मैंने गिरवी रखा तो उस पर साथ हज़ार मिल गए .तुम वापस करोगे तब छुड़ा लुंगी ।
और उसने मुझे पेरिस भेज दिया ...तुम सोच रहे होगे वो मेरी तरह यंग होगी ,पर नहीं वो मुझसे उम्र मे बीस साल बड़ी थी । उसके पति फ़ौज मे शहीद हो गए थे और संतान नहीं थी उसकी .फिर भी जिंदगी उसके लिए खुबसूरत थी .पेरिससे मैं लौटा तब मेरी जिंदगी बदल गयी .दिन रात बिजी रहने लगा ॥
वो मुझे फोन करती तो कहता : आई विल कोल बेक लेटर ओन ...और फोन करता ही नहीं .वो मुझे इ मेल करती तो जवाब नहीं देता ...जब फोन आता तो मैं कोंफरंसमे बीजी होता था .मैंने उसका सारा कर्जा सिर्फ एक महीने मे चूका दिया । अब मेरी लोकप्रियतामे सफलता मे मैं चकनाचूर होने लगा ...मुझसे शायद जेनी दूर होने लगी ...
एक दिन मैं कोंफरंसमे था .उसका कोल आया .मैंने उसकी आवाज सुनकर ही कह दिया .मैं बहुत बीजी हूँ जेन .आई विल कोल यु लेटर ओन ....
दो दिन बीत गए ना उसका कोल आया ना मेल .मुझे लन्दन जाना था ..वहां पर एक सप्ताह रहा और लौटा .मेल चेक किये पर जेनी का नहीं था .आंसरिंग मशीन पर भी उसका कोई मेसेज नहीं ...मैंने कोल किया ...तो कोई रिस्पोंस नहीं .मुझे बेचेनी हो गयी .शाम मैं उसके घर गया तो ताला था दरवाजे पर ।
पडौसीसे पूछा तो उन्होंने कहा : जेनी की दस ग्यारह दिन पहले मौत हो गयी ।
मैं वहां पर बुत सा खड़ा रहा .मुझे आघात लगा .जेनी का आखरी कोल अस्पतालसे था जहाँ वो एक कार एक्सिडेंट की शिकार हो कर जिन्दगी और मौत से लड़ रही थी और उसके ठीक एक घंटे के बाद उसकी मौत हो गयी थी ।
तबसे हर रविवार उसकी कब्र पर आता हूँ .इसी तरह .....ये रीटा पहले जूठ बोलकर छुट्टी मांगती थी .एक दिन मैंने उसे पिटर के साथ एक रेस्टोरंटमे बैठकर नाश्ता करते देखा .दुसरे दिन केबिन मे बुलाया और समजाया .प्यार करना गुनाह नहीं पर जूठ बोलना गुनाह है ..तुम जब भी उसे मिलना चाहो ऑफिस का काम ख़त्म करके जा सकती हो ...और वो ही बात मैंने सबके साथ आजमाई ...मैं अब हर फोन कोल एतेंद करता हूँ ...क्योंकि शायद उसी से जेनी की आत्मा को सुकून मिले ...
उत्साह की आँख से पानी बह चला ........
- हाँ ,बोलो आज कहाँ जाना है ? =हंसकर आलोकने पूछा ।
-सर ,आज मेरे आंटी अस्पतालमें है ,उन्हें टिफिन पहुँचाना है ।
- ओ .के । यु मे गो ....
थोड़ी देर मे रीटाने सारा काम निपटाया और आलोक की केबिन मे रखकर चली गयी ...उत्सुक वहां पर ही था .उसने आलोक से पूछा - तुम इतनी आसानी से छुट्टी कैसे दे देते हो ?
आलोक ने हंसकर कहा - जो काम उसे कल करना था वो भी आज उसने कर दिया और देखना कल वो जल्दी भी आएगी और डबल उत्साहसे काम करेगी ...एच आर डी पालिसी को नहीं इंसानियत को फोलो करता हूँ ...
थोड़ी देर मे एक बोर क्लायंट को भी बड़ी ही नरमी से बात करके फोन रखा ...
अब उत्सुकने पूछा : यार तुम ऐसे लोग को कैसे सह लेते हो ?
आलोकने कहा : कल रविवार है .इसका जवाब अगर चाहिए तो कल सुबहमे आठ बजे तुम तैयार रहना मैं तुम्हे पिक करूँगा ।
उत्सुक तैयार था .ठीक आठ बजे आलोक उसे लेने आया .आलोकने कार एक ख्रिस्ती कब्रस्तान के सामने पार्क की .एक बेहद खुबसूरत बुके ख़रीदा .और अन्दर एक कब्र पर जाकर मोमबत्ती जलाई और बुके रख दिया .कब्र पर लिखा था जेनी दीसोज़ा .उत्सुक शांत खड़ा रहा .आलोकने मन ही मन प्रार्थना भी की .लगभग पंद्रह मिनट वहां पर बैठने के बाद दोनों बरिस्ता कोफ़ी शॉप मे गए .आलोक ने अब कहना शुरू किया ।
ये जेनी की कब्र थी .एक फ्री लांसर आर्टिस्ट थी .अपना गुजारा हो जाए उतने दिन एड एजेंसीमे काम करती रहती थी .अगर फिक्स अमाउंट मिल गयी तो महीने के बाकी के दिन छुट्टी मनाती थी .बड़ी बिंदास । खुद से बहुत प्यार करती थी .हमेशा खुश .मेरे ऑफिस के लिए भी काफी काम किया है .उसकी टेलेंट जबरदस्त थी ।
एक दिन उसने मुझे कहा : आलू ,वो मुझे आलू कचालू ही कहती थी .आलू ,तुम पेरिस जाओ और फेशन कोरियोग्राफर बन जाओ और फोटो जर्नलिजम भी करो क्योंकि उसमे तुम आसमां छू सकते हो । उसकी बात मे दम था ..शायद मेरा सपना उसने कहा था .पर मेरे पास पैसे नहीं थे .एक दिन उसने मुझे एक एन्वेलाप थमा दिया .पेरिस के सबसे बड़े फेशन स्कुल मे एडमिशन करा दिया था उसने .थोड़े दिन पहले उसने मेरे पास पच्चीस हज़ार रूपये मांगे थे .और छ महीने के बाद वापस करने का वादा किया था । लेकिन ये खर्चा तो पूरा ढाई लाख होता है ।
मैंने पूछा तो बोली : देखो मैंने अपना फ्लेट किराये पर दे दिया मैं एक रूम किचन के स्टूडियो अपार्टमेन्ट मे रहने चली गयी .उससे महीने दस हजार रूपये मिल रहे थे वो बचत और मेरी मा के नेकलेस को मैंने गिरवी रखा तो उस पर साथ हज़ार मिल गए .तुम वापस करोगे तब छुड़ा लुंगी ।
और उसने मुझे पेरिस भेज दिया ...तुम सोच रहे होगे वो मेरी तरह यंग होगी ,पर नहीं वो मुझसे उम्र मे बीस साल बड़ी थी । उसके पति फ़ौज मे शहीद हो गए थे और संतान नहीं थी उसकी .फिर भी जिंदगी उसके लिए खुबसूरत थी .पेरिससे मैं लौटा तब मेरी जिंदगी बदल गयी .दिन रात बिजी रहने लगा ॥
वो मुझे फोन करती तो कहता : आई विल कोल बेक लेटर ओन ...और फोन करता ही नहीं .वो मुझे इ मेल करती तो जवाब नहीं देता ...जब फोन आता तो मैं कोंफरंसमे बीजी होता था .मैंने उसका सारा कर्जा सिर्फ एक महीने मे चूका दिया । अब मेरी लोकप्रियतामे सफलता मे मैं चकनाचूर होने लगा ...मुझसे शायद जेनी दूर होने लगी ...
एक दिन मैं कोंफरंसमे था .उसका कोल आया .मैंने उसकी आवाज सुनकर ही कह दिया .मैं बहुत बीजी हूँ जेन .आई विल कोल यु लेटर ओन ....
दो दिन बीत गए ना उसका कोल आया ना मेल .मुझे लन्दन जाना था ..वहां पर एक सप्ताह रहा और लौटा .मेल चेक किये पर जेनी का नहीं था .आंसरिंग मशीन पर भी उसका कोई मेसेज नहीं ...मैंने कोल किया ...तो कोई रिस्पोंस नहीं .मुझे बेचेनी हो गयी .शाम मैं उसके घर गया तो ताला था दरवाजे पर ।
पडौसीसे पूछा तो उन्होंने कहा : जेनी की दस ग्यारह दिन पहले मौत हो गयी ।
मैं वहां पर बुत सा खड़ा रहा .मुझे आघात लगा .जेनी का आखरी कोल अस्पतालसे था जहाँ वो एक कार एक्सिडेंट की शिकार हो कर जिन्दगी और मौत से लड़ रही थी और उसके ठीक एक घंटे के बाद उसकी मौत हो गयी थी ।
तबसे हर रविवार उसकी कब्र पर आता हूँ .इसी तरह .....ये रीटा पहले जूठ बोलकर छुट्टी मांगती थी .एक दिन मैंने उसे पिटर के साथ एक रेस्टोरंटमे बैठकर नाश्ता करते देखा .दुसरे दिन केबिन मे बुलाया और समजाया .प्यार करना गुनाह नहीं पर जूठ बोलना गुनाह है ..तुम जब भी उसे मिलना चाहो ऑफिस का काम ख़त्म करके जा सकती हो ...और वो ही बात मैंने सबके साथ आजमाई ...मैं अब हर फोन कोल एतेंद करता हूँ ...क्योंकि शायद उसी से जेनी की आत्मा को सुकून मिले ...
उत्साह की आँख से पानी बह चला ........
27 अगस्त 2010
तुम मिलोगे ???
ना मिलना तुम्हारा अब आदत बन चुकी है ,
इश्ककी वेदी पर मेरी मोहब्बत शहादत बन चुकी है ,
तुम मिलोगी तब शायद खामोश ही रह जाऊँगा ,
अब तो यादोंके मेलेमें जीनेमें भी राहतसी मिल चुकी है ...
इश्ककी वेदी पर मेरी मोहब्बत शहादत बन चुकी है ,
तुम मिलोगी तब शायद खामोश ही रह जाऊँगा ,
अब तो यादोंके मेलेमें जीनेमें भी राहतसी मिल चुकी है ...
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26 अगस्त 2010
मौसम छलका
सूखे पत्ते पर लिखा वो पयगाम आया ,
जैसे कोई फिजामें बहारका झोका आया ,
पत्तीकी सरसराहट बुद बुदा रही थी हौले से ,
जिसका इंतजार था उससे मिलन का मौसम आया ...
जैसे कोई फिजामें बहारका झोका आया ,
पत्तीकी सरसराहट बुद बुदा रही थी हौले से ,
जिसका इंतजार था उससे मिलन का मौसम आया ...
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25 अगस्त 2010
कौन हो तुम ???
कोई नगमेका सूर हो तुम ???...
एक तरन्नुम हो या एक ग़ज़ल ???...
एक साज एक आवाज एक बदला सा एहसास हो तुम ....
साँसोंमें समाकर दिल में उतरता हुआ एक अनदेखा ख्वाब हो तुम ....
एक तरन्नुम हो या एक ग़ज़ल ???...
एक साज एक आवाज एक बदला सा एहसास हो तुम ....
साँसोंमें समाकर दिल में उतरता हुआ एक अनदेखा ख्वाब हो तुम ....
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23 अगस्त 2010
एक सर्द हवा का झोंका था
एक सर्द हवा का झोंका था ,
ठिठुरता हुआ आता था मेरी खिड़की पर
दस्तक देकर मांगता था थोड़ीसी अंगीठीकी आंच ,
मैं उसे गर्म कम्बलमें लपेट कर
मा की लोरी के कुछ लब्ज़ याद कर सुलाता था ...
कमबख्त वो सोता ना था कभी ,
शायद इश्क के बुखार का मारा होगा वो भी ,
रात को रतजगेकी बीमारी होगी ,
उसकी सांस बर्फसी जम जाती होगी ....
नब्ज़ देखी जब उसकी साँसे ठंडी होने लगी ,
मेरी गर्म हथेलीको उसके हाथोमें थमा दिया ...
सुबह जब जगा दुसरे पहर तो मेरी जलती दिए की लौने
उसको जिन्दा कर दिया था .....
ठिठुरता हुआ आता था मेरी खिड़की पर
दस्तक देकर मांगता था थोड़ीसी अंगीठीकी आंच ,
मैं उसे गर्म कम्बलमें लपेट कर
मा की लोरी के कुछ लब्ज़ याद कर सुलाता था ...
कमबख्त वो सोता ना था कभी ,
शायद इश्क के बुखार का मारा होगा वो भी ,
रात को रतजगेकी बीमारी होगी ,
उसकी सांस बर्फसी जम जाती होगी ....
नब्ज़ देखी जब उसकी साँसे ठंडी होने लगी ,
मेरी गर्म हथेलीको उसके हाथोमें थमा दिया ...
सुबह जब जगा दुसरे पहर तो मेरी जलती दिए की लौने
उसको जिन्दा कर दिया था .....
21 अगस्त 2010
हमारी संस्कृति
एक नया दिन एक नयी सुबह एक नयी सांस,
फिर ये मन क्यों पुराना ?
पहनी जींस और टी शर्ट है
फिर भी मन क्यों पुराना ? ख्याल को नए ना होने की पाबन्दी है
मेरे दोस्तों ख्याल अगर बदले
तो भारतीय संस्कृति की पहचान क्या रहनी है ?
क्रिसमस मनाएंगे हम खूब धूम मचाएंगे
लेकिन हमारी नयी पीढ़ी को हम
पुरानी पाबन्दी की जंजीरोंमें ही जकडे जायेंगे ....
खायी है कसम ये हमने की हम
अपनी भारतीयताकी पहचान नहीं गवाएंगे ....
20 अगस्त 2010
पर ये गया ...
तुमसे जुदा होना तो ना था
पर हो गए ...
तुमसे दूर जाना ना था
पर चले गए ....
तुम्हारे बगैर जीना ना जानते थे
पर जीना सिख लिया ....
तुम्हारे बिना जी ना पाए
तो लौट भी आये ....
पर हो गए ...
तुमसे दूर जाना ना था
पर चले गए ....
तुम्हारे बगैर जीना ना जानते थे
पर जीना सिख लिया ....
तुम्हारे बिना जी ना पाए
तो लौट भी आये ....
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19 अगस्त 2010
क्या हम ये कर सकेंगे ???
एक बात रह रह कर मन में उठ रही है ..पिछले चंद रोजसे ...इंसान कितनी तरह के होते है ???कोई शांत होता है तो कोई तूफानी ..कोई अपनी बात किसी भी तरह मनवाने की जिद वाला होता है तो कोई बिना कहे ही कुछ बुरा नहीं मानता जब अपनी जिद पूरी ना हो .....मा को ऐसे बच्चे की शायद ज्यादा फ़िक्र होती है जो कुछ मांगते नहीं हो ...पर कभी कभी ऐसे लोग को जिसे अंग्रेजी में टेकन फॉर ग्रांटेड कहते वैसे ही लिया जाता है ...शायद लोग उन्हें बुध्धू समजते है ...इसे कोई अक्कल ही नहीं हो वैसे ही ....पर क्या उन लोग का दिल नहीं होता होगा ये समजने की दुनिया के पास फुर्सत कहाँ ???कितना मन मारके जीते होंगे वे लोग ...कितनी ख़ुशी का बलिदान देना पड़ता होगा ...ये कोई नहीं सोचता ...हमेशा ये सोचते है की इसे बुरा नहीं लगेगा ....
दुनिया बहुत प्रेक्टिकल हो चुकी है ...यहाँ संवेदना की कोई कीमत नहीं ...पर एक सच्चाई ये भी है की जब हम किसीका हक़ उससे छीन लेते है तब आत्मा तो जरूर कचोटती है ..और ये बात आपकी नींद भी छीन लेती है ...राते में कोने में अकेले सोते हुए हमें दिन में किये हर गलत काम याद आते है ,बस दुनिया के सामने कुबूल करने की हिम्मत हम कभी नहीं कर पाते ...और जो अपनी इच्छा को किसी की ख़ुशी पर बली देने की हिम्मत करता हो वो चैन की सांस जरूर लेता है ........
क्या हम किसी की ख़ुशी के लिए ये कर पाएंगे ????
दुनिया बहुत प्रेक्टिकल हो चुकी है ...यहाँ संवेदना की कोई कीमत नहीं ...पर एक सच्चाई ये भी है की जब हम किसीका हक़ उससे छीन लेते है तब आत्मा तो जरूर कचोटती है ..और ये बात आपकी नींद भी छीन लेती है ...राते में कोने में अकेले सोते हुए हमें दिन में किये हर गलत काम याद आते है ,बस दुनिया के सामने कुबूल करने की हिम्मत हम कभी नहीं कर पाते ...और जो अपनी इच्छा को किसी की ख़ुशी पर बली देने की हिम्मत करता हो वो चैन की सांस जरूर लेता है ........
क्या हम किसी की ख़ुशी के लिए ये कर पाएंगे ????
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सामाजिक दृष्टिकोण
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18 अगस्त 2010
हमतुम वही
वही वादियाँ ,वही गली कुचे ,वही हम तुम !!!!
फिर भी रोज अजनबीसे
मिलते बिछड़ते
याददास्तकी किवाड़ोंके पीछेसे
बकाया कुछ अफसाने
दस्तक अभी देते रहते है मुझे ....
पूछते हुए पहचाना मुझे ???
मुंह फेर कर चले जाना मुनासिब होगा ...
फूलों की चाहतमें एक बार और
शोलोंकी लपटोंको छू लिया था ...
उन छालोंकी जलन नासूर बनी है इस दिल पर
वो रातके कम्बलको लपेटे
तकिये के निचे दबी सिसकिया
अभी ताज़ा है एक अश्क बनकर आँखों के कोने पर ....
फिर भी रोज अजनबीसे
मिलते बिछड़ते
याददास्तकी किवाड़ोंके पीछेसे
बकाया कुछ अफसाने
दस्तक अभी देते रहते है मुझे ....
पूछते हुए पहचाना मुझे ???
मुंह फेर कर चले जाना मुनासिब होगा ...
फूलों की चाहतमें एक बार और
शोलोंकी लपटोंको छू लिया था ...
उन छालोंकी जलन नासूर बनी है इस दिल पर
वो रातके कम्बलको लपेटे
तकिये के निचे दबी सिसकिया
अभी ताज़ा है एक अश्क बनकर आँखों के कोने पर ....
17 अगस्त 2010
जिंदगी से पहले जिंदगी
जिंदगीसे पहले जिंदगी कहाँ ?
मौत से पहले जिंदगी कहाँ ?
जिंदगीसे पहले मौत कहाँ ?
अगर जी रहे है तो मौत नहीं ???
अगर मौत होती है तो फिर जिंदगी ही नहीं ???
फिर क्यों हम मर मर के जीते है ?
फिर क्यों हम हमारा जीवन सिर्फ धनसे जोड़ते है ???
धनी हो तो सुखी ....गरीब हो तो दुखी .....?????
वातानुकूलित कमरे में नरम गद्दे पर नींद कहाँ ?
जहाँ घोड़े बेच कर फूट पाथ पर सोते है उस इंसान के पास गद्दा कहाँ ??
चार मंजिलों वाले कितने घंटे घर पर रह पाते है ?
फूटपाथ पर रहने वाले हररोज शाम का खाना साथ खाते है ....
जिंदगी से पहले मौत नहीं ...पर मरकर जीने वालों की कमी नहीं ....
मौत से पहले जिंदगी कहाँ ?
जिंदगीसे पहले मौत कहाँ ?
अगर जी रहे है तो मौत नहीं ???
अगर मौत होती है तो फिर जिंदगी ही नहीं ???
फिर क्यों हम मर मर के जीते है ?
फिर क्यों हम हमारा जीवन सिर्फ धनसे जोड़ते है ???
धनी हो तो सुखी ....गरीब हो तो दुखी .....?????
वातानुकूलित कमरे में नरम गद्दे पर नींद कहाँ ?
जहाँ घोड़े बेच कर फूट पाथ पर सोते है उस इंसान के पास गद्दा कहाँ ??
चार मंजिलों वाले कितने घंटे घर पर रह पाते है ?
फूटपाथ पर रहने वाले हररोज शाम का खाना साथ खाते है ....
जिंदगी से पहले मौत नहीं ...पर मरकर जीने वालों की कमी नहीं ....
16 अगस्त 2010
उसका वजूद
उसका चेहरा मेरी सुबह है ,
उसकी आवाज़ मेरी आजान है ....
उसकी मुस्कान मेरी आरती है ...
उसका वजूद मेरी जान है ....
बस उस जान का ओज़ल हो जाना पलकोंसे
मुझे कर देता बेजान है ....
उसकी आवाज़ मेरी आजान है ....
उसकी मुस्कान मेरी आरती है ...
उसका वजूद मेरी जान है ....
बस उस जान का ओज़ल हो जाना पलकोंसे
मुझे कर देता बेजान है ....
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15 अगस्त 2010
भारत मा का सपना
आज़ादीके चौसठवे जन्मदिन पर
भारतमा अपने ही हाथो कुछ ऐसे आज़ादी पाई है ...
एक देशभक्त हेकरकी मददसे
हालातोंमें कुछ ऐसे बदलाव लायी है ...
स्विस बेंकसे सारा काला धन बड़े लोगोका पासवर्डसे निकालकर
देशका सारा विदेशी कर्जा खुदने ही चूका दिया ...
धर्मस्थानोमें जमा सारी राशीको धर्मके ठेकेदारोंने ही
पुरे देशको पाठशाला और अस्पतालोंसे सुसज्ज करने में ही खर्च किया ....
भ्रष्ट नेताओंको सत्ताधारी अधिकारीओ ने ही बेख़ौफ़ होकर कैद कर लिया
कोई छुट ना पाया सच्चे इल्जामोंसे और सही न्याय किया गया ...
देशके नेताओके दिमागमें देशभक्ति का वायरस हलचल मचा गया
सारे बकाया काम देशके पुरे करते हुए देश को प्रगति राह चलता किया ....
साठगाँठ टूटी आतंकवादीसे जब देश के गद्दारोंकी
अमन की सांस ले चला देश वासी उम्मीदे जगी एक विकास के राह की ...
दो रुपये किलो आलू और चीनी चार रूपये बिकने लगी
देशकी जवानी अब सायकल चलाकर पर्यावरणके बचाव के लिए लग गयी ...
देखो सशक्त युवाधनने क्या कमाल दिखाया है ,
हर खेलोमें सबसे ऊपर तिरंगे को ही फहराया है ...
चलो इस वायरस का हम खुद ही जतन करने लग जाए ,
अपनी बदनसीबीको अपने हाथो ही मिटा कर भारतमा का सपना साकार करे ...
भारतमा अपने ही हाथो कुछ ऐसे आज़ादी पाई है ...
एक देशभक्त हेकरकी मददसे
हालातोंमें कुछ ऐसे बदलाव लायी है ...
स्विस बेंकसे सारा काला धन बड़े लोगोका पासवर्डसे निकालकर
देशका सारा विदेशी कर्जा खुदने ही चूका दिया ...
धर्मस्थानोमें जमा सारी राशीको धर्मके ठेकेदारोंने ही
पुरे देशको पाठशाला और अस्पतालोंसे सुसज्ज करने में ही खर्च किया ....
भ्रष्ट नेताओंको सत्ताधारी अधिकारीओ ने ही बेख़ौफ़ होकर कैद कर लिया
कोई छुट ना पाया सच्चे इल्जामोंसे और सही न्याय किया गया ...
देशके नेताओके दिमागमें देशभक्ति का वायरस हलचल मचा गया
सारे बकाया काम देशके पुरे करते हुए देश को प्रगति राह चलता किया ....
साठगाँठ टूटी आतंकवादीसे जब देश के गद्दारोंकी
अमन की सांस ले चला देश वासी उम्मीदे जगी एक विकास के राह की ...
दो रुपये किलो आलू और चीनी चार रूपये बिकने लगी
देशकी जवानी अब सायकल चलाकर पर्यावरणके बचाव के लिए लग गयी ...
देखो सशक्त युवाधनने क्या कमाल दिखाया है ,
हर खेलोमें सबसे ऊपर तिरंगे को ही फहराया है ...
चलो इस वायरस का हम खुद ही जतन करने लग जाए ,
अपनी बदनसीबीको अपने हाथो ही मिटा कर भारतमा का सपना साकार करे ...
13 अगस्त 2010
घाव
अय दिल देख वो तेरा दोस्त हमेशाके लिए जा रहा है
तुमसे दूर बहुत दूर....
कितने पत्थर दिल हो तुम ?
तुम तो ऐसे ना थे !!!!!
क्या कहूँ इन मासूमोंसे ....
देखो ये घाव मेरे सर पर ....
पट्टी रंगी हुई है लाल रंग से ....खून से .....
मैंने भी उस पत्थर दिल से टकरा टकरा कर इल्तजा की थी
रुक जा ...रुक जा .......
वो लौट आया ...वापस आया .......
सर का घाव याद दिलाता रहा उसकी चोट ....
घाव ना भर पाया ...
तुमसे दूर बहुत दूर....
कितने पत्थर दिल हो तुम ?
तुम तो ऐसे ना थे !!!!!
क्या कहूँ इन मासूमोंसे ....
देखो ये घाव मेरे सर पर ....
पट्टी रंगी हुई है लाल रंग से ....खून से .....
मैंने भी उस पत्थर दिल से टकरा टकरा कर इल्तजा की थी
रुक जा ...रुक जा .......
वो लौट आया ...वापस आया .......
सर का घाव याद दिलाता रहा उसकी चोट ....
घाव ना भर पाया ...
12 अगस्त 2010
जिन्दा हूँ !!!!
मैं जिन्दा हूँ ये एहसास दिलाना पड़ता है खुद को हरवक्त ....
पता नहीं ये किस मोड़ पर जा चुकी है जिंदगी
पता ही नहीं चलता की ख़ुशी है या गम इन राहों में ....
जिंदगी यूँ दोराहो पर ना छोड़
या तो पूरी तरह गमके कांटे बन बिछ जा जिंदगी में
या फिर फूलों की चादर बनकर बिखरती रह यहाँ .....
तड़प गया हूँ .घुटन हो गयी है ....
बस एक सांस दे दे ...एक सदा दे ....
पता नहीं ये किस मोड़ पर जा चुकी है जिंदगी
पता ही नहीं चलता की ख़ुशी है या गम इन राहों में ....
जिंदगी यूँ दोराहो पर ना छोड़
या तो पूरी तरह गमके कांटे बन बिछ जा जिंदगी में
या फिर फूलों की चादर बनकर बिखरती रह यहाँ .....
तड़प गया हूँ .घुटन हो गयी है ....
बस एक सांस दे दे ...एक सदा दे ....
11 अगस्त 2010
दम ब दम
दम ब दम दिल धड़कने लगा ,
दम ब दम मैं खोने लगा ,
दम ब दम मूंदी आँखोंमें तेरा चेहरा दिखने लगा ,
दम ब दम मैं रातोंकी नींदों में भी जागने लगा .....
================================
सितारोंमें देखते देखते खोने लगे जब ,
तेरे गुमशुदा ख्वाबों को ढूँढने लगे जब ,
बस हीर की चाहत लिए हम जीने लगे ,
तब हीरको ही रान्ज़ाके लिबासमें पाने लगे ...
दम ब दम मैं खोने लगा ,
दम ब दम मूंदी आँखोंमें तेरा चेहरा दिखने लगा ,
दम ब दम मैं रातोंकी नींदों में भी जागने लगा .....
================================
सितारोंमें देखते देखते खोने लगे जब ,
तेरे गुमशुदा ख्वाबों को ढूँढने लगे जब ,
बस हीर की चाहत लिए हम जीने लगे ,
तब हीरको ही रान्ज़ाके लिबासमें पाने लगे ...
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10 अगस्त 2010
सच ये है ...
शीना और सारंग दो अजनबी अचानक एक ट्रेन के डिब्बेमें साथ बैठे थे ...आमने सामने की खिड़की पर ....बारह घंटे के सफ़र के बाद दोनों में एक जान पहचान हो गई जितनी दो हमसफ़रकी होती है ....सारंग उस शहरमें ही रहता था .और शीना उस शहरमें नौकरीके लिए आई थी .उसे कंपनी का एक फ्लेट मिला है .पुरे फर्नीचरके साथ .एक कार मिली है शोफर ड्रिवन ....एक जाने माने अख़बारकी चीफ एडिटर बनकर ...
सारंग जर्नलिस्ट है .फ्री लांस करता है .एक सिलसिले में उसकी मुलाकात शीनासे दोबारा हो गई .दोनों खुश हो गए .दोनों बड़े ही होशियार थे .अपने प्रोफेशनल और पर्सनल जीवनको अलग ही रखते थे .कभी कभी लंच या डिनर साथ होने लगा .धीरे धीरे दोस्ती कुछ और गहराईकी और बढ़ रही थी .तब अचानक एक दिन सारंग को बीना बताये शीना अपने शहर चली गई .लौटी तो कहा उसकी देल्हीमें श्री के साथ एंगेजमेंट हो गयी है ...प्यार तक आगे बढ़ रहा एक रिश्ता वहीँ ठहर गया .....दोनों की दोस्तीमें कोई बदलाव नहीं आया ....
शहर में दंगे हो गए .उस वक्त शीना को चौबीस घंटे अखबारके ऑफिस में रहना पड़ा काम के सिलसिले में .उस वक्त सारंग भी उसके साथ ही रहा .शीना ने महसूस किया की सारंग उसका कितना ख्याल रखता है .उसे कुछ भी कहना नहीं पड़ता .वो उसको खुद शीना से भी ज्यादा जानता है ।
उसे श्री याद आया .एक साडी खरीदते वक्त उसे ऐसी साडी लेनी पड़ी जो सिर्फ श्री को पसंद थी और उसे कतई पसंद ना थी .उतना ही नहीं श्री ने उसे वो साडी पहनकर उसे एक पार्टी में साथ जाने को मजबूर भी किया .......
अचानक श्री ऑफिसमें आ गया .दंगो की खबर उसे यहाँ खिंच लाइ ...उसे सारंग का उधर होना गंवारा ना हुआ .उसका शीना के साथ झगडा हो गया । जाते वक्त शीनाने सगाई की अंगूठी उसे वापस कर दी ........
सारंग हक्का बक्का रह गया .शीनाने सिर्फ इतना ही कहा की एक जबरदस्तीसे खींचा हुआ रिश्ता क्या कामका ???
दुसरे महीने शीनाने अपना तबादला अपने शहर करा लिया .....जाते वक्त सारंगने पूछा ,"शीना क्या तुम मेरे साथ जिंदगी गुजारना पसंद करोगी ??"
शीनाने कहा ," सारंग तुम कल्याणी को चाहते हो ना ? जब मेरी सगाई हो गई तब तुम्हारे जीवनमें वो आ गयी थी मैं जानती हूँ ...मेरी तक़दीर मेरी है ...मैं उसके कारण कल्याणीकी ख़ुशी नहीं छीन सकती ......."
ट्रेन छूटने लगी और शीना देर तक सारंग की और हाथ हिलाती रही ...
सारंग जर्नलिस्ट है .फ्री लांस करता है .एक सिलसिले में उसकी मुलाकात शीनासे दोबारा हो गई .दोनों खुश हो गए .दोनों बड़े ही होशियार थे .अपने प्रोफेशनल और पर्सनल जीवनको अलग ही रखते थे .कभी कभी लंच या डिनर साथ होने लगा .धीरे धीरे दोस्ती कुछ और गहराईकी और बढ़ रही थी .तब अचानक एक दिन सारंग को बीना बताये शीना अपने शहर चली गई .लौटी तो कहा उसकी देल्हीमें श्री के साथ एंगेजमेंट हो गयी है ...प्यार तक आगे बढ़ रहा एक रिश्ता वहीँ ठहर गया .....दोनों की दोस्तीमें कोई बदलाव नहीं आया ....
शहर में दंगे हो गए .उस वक्त शीना को चौबीस घंटे अखबारके ऑफिस में रहना पड़ा काम के सिलसिले में .उस वक्त सारंग भी उसके साथ ही रहा .शीना ने महसूस किया की सारंग उसका कितना ख्याल रखता है .उसे कुछ भी कहना नहीं पड़ता .वो उसको खुद शीना से भी ज्यादा जानता है ।
उसे श्री याद आया .एक साडी खरीदते वक्त उसे ऐसी साडी लेनी पड़ी जो सिर्फ श्री को पसंद थी और उसे कतई पसंद ना थी .उतना ही नहीं श्री ने उसे वो साडी पहनकर उसे एक पार्टी में साथ जाने को मजबूर भी किया .......
अचानक श्री ऑफिसमें आ गया .दंगो की खबर उसे यहाँ खिंच लाइ ...उसे सारंग का उधर होना गंवारा ना हुआ .उसका शीना के साथ झगडा हो गया । जाते वक्त शीनाने सगाई की अंगूठी उसे वापस कर दी ........
सारंग हक्का बक्का रह गया .शीनाने सिर्फ इतना ही कहा की एक जबरदस्तीसे खींचा हुआ रिश्ता क्या कामका ???
दुसरे महीने शीनाने अपना तबादला अपने शहर करा लिया .....जाते वक्त सारंगने पूछा ,"शीना क्या तुम मेरे साथ जिंदगी गुजारना पसंद करोगी ??"
शीनाने कहा ," सारंग तुम कल्याणी को चाहते हो ना ? जब मेरी सगाई हो गई तब तुम्हारे जीवनमें वो आ गयी थी मैं जानती हूँ ...मेरी तक़दीर मेरी है ...मैं उसके कारण कल्याणीकी ख़ुशी नहीं छीन सकती ......."
ट्रेन छूटने लगी और शीना देर तक सारंग की और हाथ हिलाती रही ...
9 अगस्त 2010
रत्ती भर जगह ....
मुझे मेरी तनहाईने तनहा न किया
तेरी याद हर पल साथ चलती रही ......
=============================
तेरी यादोंमें कल बरसात बहुत थी ,
छाता लेकर चल रहा था फिर भी भीगता रहा .....
================================
कोरे कोरे से दिल पर नाम लिखने की कोशिश की ,
तेरी यादोंने उस सफे पर रत्ती भर जगह ना छोड़ी थी ....
तेरी याद हर पल साथ चलती रही ......
=============================
तेरी यादोंमें कल बरसात बहुत थी ,
छाता लेकर चल रहा था फिर भी भीगता रहा .....
================================
कोरे कोरे से दिल पर नाम लिखने की कोशिश की ,
तेरी यादोंने उस सफे पर रत्ती भर जगह ना छोड़ी थी ....
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अन्दाजें बयां
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8 अगस्त 2010
ये दिल तो ??!!
दफन करके लौटा हूँ
वो सारी मुलाकातें तुम्हारी ,
यादें तुम्हारी ,किस्से तुम्हारे ,
तुमसे निजाद पाने का एक रास्ता ये भी था ......
==================================
नयी कोपलें फुट कर बाहर आ गयी
जहाँ मेरे अरमान दफन थे ,
फिर सहेजे उसे अहेसासकी बूंदोंसे
फिर दिल ज़ख्मवार होने बेताब था तो ....
वो सारी मुलाकातें तुम्हारी ,
यादें तुम्हारी ,किस्से तुम्हारे ,
तुमसे निजाद पाने का एक रास्ता ये भी था ......
==================================
नयी कोपलें फुट कर बाहर आ गयी
जहाँ मेरे अरमान दफन थे ,
फिर सहेजे उसे अहेसासकी बूंदोंसे
फिर दिल ज़ख्मवार होने बेताब था तो ....
7 अगस्त 2010
तह्बंध सपने
आपकी जिंदगीमें कभी कभी सवाल उठते है जो आपको पूछता है की क्या आप उसी मक़ाम पर हो जिसकी आपको चाह थी ???आपका करियर हो या आपकी जिंदगी का हमसफ़र !!!!!!
शायद हममें से कई का सर ना में हिला है ना ???यस !!!!
ये फर्क है हमारी अपेक्षा और हमारे हासिल के बीच में ....सोच हमेशा ऊँची होती है पर प्रयत्न थोड़े कम पड़ जाते है या फिर बहुत मेहनत के बाद भी मंजिल नहीं मिल पाती ......इसका एक कारण ये है की दुनिया जहाँ की बाते जानते है पर अपने आपको नहीं जानते .....मैं देश की एक अच्छी एथलीट बनना चाहती हूँ ...मैं अगर शारीरिक रूपसे कमजोर हूँ तो मैं दो काम कर सकती हूँ : एक तो अपने को स्वस्थ और मजबूत करके मैं ये काम कर सकती हूँ या फिर अपने नसीब को कोस सकती हूँ ...अपनी सारी स्थितियों को कोस सकती हूँ और किसी को इलज़ाम लगा सकती हूँ की इनकी वजह से मैं ये नहीं कर पायी ......
पर सच इन सब से अलग ही है ....हमें दुनिया में वही मक़ाम मिलता है जिसके लिए हम लायक होते है .......हमारा मन अगर हमारी मंजिल के बारे में ही सोचता रहे वह भी बड़ी ही शिद्दत से तो कैसे भी हम उस मक़ाम पर पहुँचते है ......पर वो वक्त अपना नहीं होता ...वो व्यक्ति वो नहीं होता जिससे हमने उम्मीद की थी .......
एक छोटा सा उदहारण देती हूँ ...बचपन में हमेशा में यहाँ के आकाशवाणी के बच्चों के प्रोग्राममें हिस्सा लेने जाती थी ...पर फिर पढ़ाई के कारण छोड़ दिया ...जब ऍफ़ एम् का जमाना आया तब वो लोग अपने श्रोताओ को बुलाने लगे ...मेरा पुराना शौक जागा पर जाने की मंजिल नहीं थी रास्ता नहीं था ....पर एक दिन ये सच हुआ ....यहाँ के एक आर जे ने अपने प्रोग्राम में मुझे श्रोताके सेगमेंट में आमंत्रित किया और मैंने एक घंटे तक हिस्सा लिया स्टूडियो में बैठकर ..........कहाँ कब कौन वो मायने नहीं रखता पर एक सोच जो सपना बनकर किसी भी वक्त आपके पास एक मौका देने आती है उसे पहचानो तो मायूसी नहीं रहती ....
बस सोचो ऐसा कुछ आपके साथ भी हुआ है कभी ????
शायद हममें से कई का सर ना में हिला है ना ???यस !!!!
ये फर्क है हमारी अपेक्षा और हमारे हासिल के बीच में ....सोच हमेशा ऊँची होती है पर प्रयत्न थोड़े कम पड़ जाते है या फिर बहुत मेहनत के बाद भी मंजिल नहीं मिल पाती ......इसका एक कारण ये है की दुनिया जहाँ की बाते जानते है पर अपने आपको नहीं जानते .....मैं देश की एक अच्छी एथलीट बनना चाहती हूँ ...मैं अगर शारीरिक रूपसे कमजोर हूँ तो मैं दो काम कर सकती हूँ : एक तो अपने को स्वस्थ और मजबूत करके मैं ये काम कर सकती हूँ या फिर अपने नसीब को कोस सकती हूँ ...अपनी सारी स्थितियों को कोस सकती हूँ और किसी को इलज़ाम लगा सकती हूँ की इनकी वजह से मैं ये नहीं कर पायी ......
पर सच इन सब से अलग ही है ....हमें दुनिया में वही मक़ाम मिलता है जिसके लिए हम लायक होते है .......हमारा मन अगर हमारी मंजिल के बारे में ही सोचता रहे वह भी बड़ी ही शिद्दत से तो कैसे भी हम उस मक़ाम पर पहुँचते है ......पर वो वक्त अपना नहीं होता ...वो व्यक्ति वो नहीं होता जिससे हमने उम्मीद की थी .......
एक छोटा सा उदहारण देती हूँ ...बचपन में हमेशा में यहाँ के आकाशवाणी के बच्चों के प्रोग्राममें हिस्सा लेने जाती थी ...पर फिर पढ़ाई के कारण छोड़ दिया ...जब ऍफ़ एम् का जमाना आया तब वो लोग अपने श्रोताओ को बुलाने लगे ...मेरा पुराना शौक जागा पर जाने की मंजिल नहीं थी रास्ता नहीं था ....पर एक दिन ये सच हुआ ....यहाँ के एक आर जे ने अपने प्रोग्राम में मुझे श्रोताके सेगमेंट में आमंत्रित किया और मैंने एक घंटे तक हिस्सा लिया स्टूडियो में बैठकर ..........कहाँ कब कौन वो मायने नहीं रखता पर एक सोच जो सपना बनकर किसी भी वक्त आपके पास एक मौका देने आती है उसे पहचानो तो मायूसी नहीं रहती ....
बस सोचो ऐसा कुछ आपके साथ भी हुआ है कभी ????
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सामाजिक कारण
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6 अगस्त 2010
उसे खो दिया ....
मेरी खुली खिड़की पर वो रोज आकर
खड़ी हो जाती थी बिना कुछ कहे ...
फिर एक आवाज लगाकर भाग जाती थी ......
जब पहले मुझे फुर्सत होती थी मुझे
ये हरकत भातीथी उसकी ....
अब तो मैं बड़ा आदमी हो गया हूँ ...
मुझे थोड़े वक्त में कितने सारे काम करने होते है ......
मैं कितने लोगोको खुश करने में लगा रहता हूँ ....
क्योंकि मैं सफल कहलाना चाहता हूँ .....
अब भी वो आती है , आवाज लगाती है ...
अब उसकी हरकत मुझे ना भाती है ....
उसे कुछ ना कहते हुए बस उसे टालना शुरू किया ......
एक दिन अचानक ....
उसने आना बंद कर दिया ....
ना आने का कोई बहाना भी ना किया ....
बस खुली खिड़की भी उसका इंतज़ार करने लगी मेरी तरह ....
पर वो ना आई .....वो ना आई ....
अब सोचा मैंने भी ...
क्या माँगा था उसने ??? कुछ नहीं ...
कभी कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं बस दे जाती थी
एक प्यारी सी मुस्कान एक मीठी सी आवाज ....
आज दूसरों को खुश करते हुए मैंने उसे ही नाराज़ कर दिया ....
पूरी दुनिया को पाने की धुन में उसे ही खो दिया ...
खड़ी हो जाती थी बिना कुछ कहे ...
फिर एक आवाज लगाकर भाग जाती थी ......
जब पहले मुझे फुर्सत होती थी मुझे
ये हरकत भातीथी उसकी ....
अब तो मैं बड़ा आदमी हो गया हूँ ...
मुझे थोड़े वक्त में कितने सारे काम करने होते है ......
मैं कितने लोगोको खुश करने में लगा रहता हूँ ....
क्योंकि मैं सफल कहलाना चाहता हूँ .....
अब भी वो आती है , आवाज लगाती है ...
अब उसकी हरकत मुझे ना भाती है ....
उसे कुछ ना कहते हुए बस उसे टालना शुरू किया ......
एक दिन अचानक ....
उसने आना बंद कर दिया ....
ना आने का कोई बहाना भी ना किया ....
बस खुली खिड़की भी उसका इंतज़ार करने लगी मेरी तरह ....
पर वो ना आई .....वो ना आई ....
अब सोचा मैंने भी ...
क्या माँगा था उसने ??? कुछ नहीं ...
कभी कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं बस दे जाती थी
एक प्यारी सी मुस्कान एक मीठी सी आवाज ....
आज दूसरों को खुश करते हुए मैंने उसे ही नाराज़ कर दिया ....
पूरी दुनिया को पाने की धुन में उसे ही खो दिया ...
5 अगस्त 2010
क्या करूँ कुछ कह ना पाऊं
खामोश ,मौन ,निशब्द एक बोल
निगाहोंसे छलक गया पैमानेसे
एक नज़र उठी एक नज़र झुक गयी ,
बचपनसे अलविदा थी उस पल और
जवानीकी देहलीज़ पर छोड़ गया .......
================================
मैं उन्हें ना कह पाऊं की मोहब्बत है ,
वो इंतज़ार करे नज़रें बिछाए बैठे है ,
मेरी राहों पर तकती रहती उनकी निगाहें
मेरे बढ़ते क़दमों पर बेडीसी बन अटक जाती है ....
निगाहोंसे छलक गया पैमानेसे
एक नज़र उठी एक नज़र झुक गयी ,
बचपनसे अलविदा थी उस पल और
जवानीकी देहलीज़ पर छोड़ गया .......
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मैं उन्हें ना कह पाऊं की मोहब्बत है ,
वो इंतज़ार करे नज़रें बिछाए बैठे है ,
मेरी राहों पर तकती रहती उनकी निगाहें
मेरे बढ़ते क़दमों पर बेडीसी बन अटक जाती है ....
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4 अगस्त 2010
चाह ...
आज आसमांके आंसू की भाषा समजी
बेबस थे वह भी ,ना जाने वो संदेस
जो भेजा था किसी बावरीने पियाको अपने ,
बूंदोंके साथ कहीं फिसल गया .......
===============================
बस एक चाह बन गयी है
तुम्हे भूल जाऊं
सब कुछ भूल गया हूँ
बस तुम्हे भुला ना पाया ....
बेबस थे वह भी ,ना जाने वो संदेस
जो भेजा था किसी बावरीने पियाको अपने ,
बूंदोंके साथ कहीं फिसल गया .......
===============================
बस एक चाह बन गयी है
तुम्हे भूल जाऊं
सब कुछ भूल गया हूँ
बस तुम्हे भुला ना पाया ....
3 अगस्त 2010
वो फिर ना आएगा कभी ....
बज़्म सजी थी ...
एक हुजूम था दोस्तोंका ...
नज्मे मेहमान बनकर आई थी ,
इरशाद और अर्ज़ किया है की गुजारिशे थी ........
वो आया ...
दरवाजे पर खड़ा रहा था ....
उससे नज़र मिली ,पर वो तशरीफ़ ना लाया ...
बज़्म मैंने भी न छोड़ी ये सोचकर कि मिल लेंगे बाद में ...
वो लौट गया ....खाली खाली निगाहें लेकर .....
दुसरे दिन उस वक्त नज़र दरवाजे पर गयी ,खाली लौटी ....
फिर निगाहें दरवाजे को तकती और खाली हाथ लौटती रही .....
अब तो भरी बज्मे भी खाली महसूस होने लगी थी ....
अब तो नज्मे भी बे मतलब लगने लगी थी .....
भरी महफ़िल भी तनहा करने लगी थी ......
रस्ते पर पसीना पोंछने रुमाल निकाला ....
ये वही रुमाल था जिससे उसने मेरे आंसू पोंछे थे ....
मैं जिंदगी हार गया था तब जीत की उम्मीद दिलाई थी .....
उसे संदूकमें संभालकर रख दिया कीमती जेवर के साथ ....
अभी भी लौटती है नज़रें खाली हाथ दरवाजे से होकर .....
वो अब फिर ना आएगा कभी ये संदेसा लेकर ....
एक हुजूम था दोस्तोंका ...
नज्मे मेहमान बनकर आई थी ,
इरशाद और अर्ज़ किया है की गुजारिशे थी ........
वो आया ...
दरवाजे पर खड़ा रहा था ....
उससे नज़र मिली ,पर वो तशरीफ़ ना लाया ...
बज़्म मैंने भी न छोड़ी ये सोचकर कि मिल लेंगे बाद में ...
वो लौट गया ....खाली खाली निगाहें लेकर .....
दुसरे दिन उस वक्त नज़र दरवाजे पर गयी ,खाली लौटी ....
फिर निगाहें दरवाजे को तकती और खाली हाथ लौटती रही .....
अब तो भरी बज्मे भी खाली महसूस होने लगी थी ....
अब तो नज्मे भी बे मतलब लगने लगी थी .....
भरी महफ़िल भी तनहा करने लगी थी ......
रस्ते पर पसीना पोंछने रुमाल निकाला ....
ये वही रुमाल था जिससे उसने मेरे आंसू पोंछे थे ....
मैं जिंदगी हार गया था तब जीत की उम्मीद दिलाई थी .....
उसे संदूकमें संभालकर रख दिया कीमती जेवर के साथ ....
अभी भी लौटती है नज़रें खाली हाथ दरवाजे से होकर .....
वो अब फिर ना आएगा कभी ये संदेसा लेकर ....
2 अगस्त 2010
नया दर्द ...
नए दर्द की कोई गुंजाईश नहीं
जो थे अब तक कम ना थे कभी ,
बस ये दर्द को घूंट कर दवाई बना लूँगा
तब शायद दिल का मर्ज़ मिटा पाउँगा ......
============================================
हंसती आँखेमें कभी गम सैलाब बनकर आया ना था ...
बहाकर ले गया तेरी यादें सब और दिल हल्का कर गया ...
जो थे अब तक कम ना थे कभी ,
बस ये दर्द को घूंट कर दवाई बना लूँगा
तब शायद दिल का मर्ज़ मिटा पाउँगा ......
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हंसती आँखेमें कभी गम सैलाब बनकर आया ना था ...
बहाकर ले गया तेरी यादें सब और दिल हल्का कर गया ...
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1 अगस्त 2010
हैप्पी फ्रेंडशिप डे.........यादें
बसमें जल्दी चढ़कर तेरी सिट रोकते थे ,
रिसेसमें गोलाकार बैठकर नाश्ता करते थे ,
स्कुलकी छुट्टीकी घंटी बजते ही
शोर मचाते क्लाससे बाहर दौड़ते थे ......
गणपतकी सायकलकी चाबी चुराकर
तुम मुझे सायकल चलाना सिखाते थे ....
धक्का देकर कब्बडीमें हम जब तुम्हे गिराते थे ,
तेरे छिले घुटनों पर अपना नया रुमाल बांध देते थे ....
नयी पेन्सिल ना देते मुझे एक बार
हम तुमसे रूठ कर घर अकेले आते थे ....
दुसरे दिन अलग बेंच पर बैठकर हम गुस्सा दिखाते
तब वैसीही नयी पेन्सिल तुम धीरे से मेरी बेंच पर रख जाते थे ....
किट्टी बत्ती हो जाती थी और
एक दुसरे के कंधे पर हाथ रखकर हम घर लौट आते थे .......
==============================================
आज ए सी वाली कार में तेरी सायकल याद आती है ,
फ्रेश फ्रूट ज्यूसके गिलास में तेरी कच्ची आम और पके बेर सताते है
डिजाइनर कपड़ोमें जब देखता हूँ आयना ,
तेरी वो पेंट जो खुश होकर मैंने पहनी थी एक दिन
उसका पेट से बार बार सरक जाना रुला जाता है ....
अनचाहे लोगोसे मुस्कुराकर मिलते वक्त
तेरा तु रूठ मैं मना लू वाला फंडा याद आता है .....
प्लेन ट्रेन में रिजर्व सिट पर बैठते हुए
तु बस में मेरी सीट रोकता नजर आता है .....
तेरी अनगिनत यादे मेरी आँखों को रुलाती है
और तेरा हँसता हुआ चेहरा हरदम दिख जाता है ...
रिसेसमें गोलाकार बैठकर नाश्ता करते थे ,
स्कुलकी छुट्टीकी घंटी बजते ही
शोर मचाते क्लाससे बाहर दौड़ते थे ......
गणपतकी सायकलकी चाबी चुराकर
तुम मुझे सायकल चलाना सिखाते थे ....
धक्का देकर कब्बडीमें हम जब तुम्हे गिराते थे ,
तेरे छिले घुटनों पर अपना नया रुमाल बांध देते थे ....
नयी पेन्सिल ना देते मुझे एक बार
हम तुमसे रूठ कर घर अकेले आते थे ....
दुसरे दिन अलग बेंच पर बैठकर हम गुस्सा दिखाते
तब वैसीही नयी पेन्सिल तुम धीरे से मेरी बेंच पर रख जाते थे ....
किट्टी बत्ती हो जाती थी और
एक दुसरे के कंधे पर हाथ रखकर हम घर लौट आते थे .......
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आज ए सी वाली कार में तेरी सायकल याद आती है ,
फ्रेश फ्रूट ज्यूसके गिलास में तेरी कच्ची आम और पके बेर सताते है
डिजाइनर कपड़ोमें जब देखता हूँ आयना ,
तेरी वो पेंट जो खुश होकर मैंने पहनी थी एक दिन
उसका पेट से बार बार सरक जाना रुला जाता है ....
अनचाहे लोगोसे मुस्कुराकर मिलते वक्त
तेरा तु रूठ मैं मना लू वाला फंडा याद आता है .....
प्लेन ट्रेन में रिजर्व सिट पर बैठते हुए
तु बस में मेरी सीट रोकता नजर आता है .....
तेरी अनगिनत यादे मेरी आँखों को रुलाती है
और तेरा हँसता हुआ चेहरा हरदम दिख जाता है ...
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