31 मई 2010

मेरे सिरहाने मेरा साथी

गर्मीकी छोटी सी रात हो सर्दीकी कपकपाती हुई लम्बी रातें ,

सारे मेरे राज़ ए दिल जानता है वो मेरी रातोंका हमसफ़र .....

मेरी पलकोंके देखे अनदेखे सारे सपने का गवाह है वह ,

मेरे गिने हुए सारे तारोंका एक लम्बा सा हिसाब है वह ....

मेरी बोजिल आँखोंमें नींद बनकर आता है हर रात वह ,

मेरी झुल्फोंको एक मात्र आसरा है वह .......

मैंने छुपाये सारे गम अपने इस दुनियासे पर वो सब जानता है वह ,

क्योंकि जब वह बहे थे अश्क बनकर खुदको उस की धारामें भिगोता था वह .....

आइये आज इनका तार्रुफ़ आपसे करवा दूँ आज ,

हर रात मेरे इंतज़ारमें जागकर मुझे सुलाता है जो ,

मेरी रातों का हमसफ़र तकिया है वह ........

30 मई 2010

बूंद

एक हरा पत्ता बैठा था कोमलसी शाख पर ,

एक बूंद गिरी उस पर ,

वो कुम्हला गया ,

वो सुख गया ,

क्यों ?

वो बूंद मेरे अश्ककी थी ,

जब वादा करके भी तुम ना आये ....

29 मई 2010

बैसाख की पूर्णमासी

एक चांदनी रातमें चंद फुहारोंको खुद पर बहाकर

इस बहती हवाओंमें श्वेत परिधान किये

श्वेत चादर पर खुदको बिछाकर

बस नींदके दामनमें सरक जानेको जी किया ....

गगन पर निकला वो पूनम का पूरा चाँद

कुछ इश्कियाना मिजाज़ लिए मुझे छेड़ने आ गया ...

आज कुछ मुझसे भी बोलो ,राजे दिल हम पर भी खोलो ....

विस्फारित नयनोसे मैं उसे तकती रही

उसकी नर्म चांदनीमें खुद को बरबस भिगोती रही ....

चाँदने कहा - तुम्हारी भीगी झुल्फोंकी बूंदों की शबनम पिने दो आज

तुम्हारी हलकीसी हँसी को मेरे दिल में बस भी जाने दो ...

नींद बड़ी ही खुशनसीब है रोज तेरी आँखोंमें रात आकर बस जाती है

आज सारी रात जागकर तुम मुझसे गुफ्तगू करने में बिताने दो .....

अगली पूर्णमासीको शायद मैं बरखाके बादल ओढ़कर आऊं ....

और छत पर लेटी हुई इस मासूमसी हँसी सूरत अगले साल देख पाऊं ....

28 मई 2010

रेगिस्तान

मुझे पानीकी बूंदों प्यास नहीं
इस सहराको किसी जिंदगीकी खुदमें तलाश भी नहीं
वजूद हूँ कण कणमें बिखरकर फैला हूँ मीलों तक
फिर भी इस धरतीकी हथेलीमें सिमटा हुआ
मैं रेगिस्तान ...ये रेगिस्तान ....
और मुझे ऑससी पानीकी उड़ने वाली बूंदों की प्यास भी नहीं ....
मीलों तक फैला हुआ सन्नाटा है
दिनभर सूरजकी तपिशको खुद पर सजाकर
मरीचिकाकी लहरों पर बहता हुआ फकीर सा ....
रात मुझे ठंडी ठंडी हवाकी लहरों को
मा के पल्लू की तरह ओढ़ाकर मुझे
सितारों की शाल ख़ामोशीसे लोरियां सुलाती है ....
मेरी आँधियोंमें बहता संगीत सुन ...
रेतकी उड़ती चादर से अपने हुस्न को सजाकर देख....
हरियाली कभी एक बार इस तरफ नजर घुमाकर देख...
अपनी कोमल हथेलीके स्पर्शसे मेरी बालू को सहला कर देख...
प्यार की बुँदे मिलेगी मुझ में भी
मैं हूँ रेगिस्तान .....................

27 मई 2010

सपना

दिनमें ये सितारों की बारात है ,
वो तो गोरी हथेलियों पर चाँदको सजानेकी बात है ,
जिसे ना देखा कभी इन आँखोंसे रूबरू
उसके साथ जिंदगी साथ गुजारनेके वादेकी बात है .....
कभी फूलोंकी शक्लोंमेएक हंसती हुई उस ग़ज़लकी बात है ....
तनहा ही है हम इस कमरेमेउनसे
इस तनहाईमें ख़ामोशीसे की सारी बातें है ....
दावा करते है हम की वो तो हमारे दिलमें है बसे सदा के लिए
कल रात भर के लिए बिछड़ना हुआ उनसे
दिल को समजाया हमने ये तो छोटीसी हिजर की रात है ....
साथ साथ चलना हमारे कदम दर कदम
बस आँखोंके जपकने की बात है
साँसोंमें घुल चूका हो जो पलक झपकते
ही उस हसीं सपने की ओज़ल हो जाने की बात है ....

26 मई 2010

कभी कभी तुम्ही

कभी खामोश रहकर ,

कभी नज़रें उठाकर ,

कभी नज़रें झुकाकर

कभी हवामें बहती खुश्बूसे

कभी उड़ते हुए एक सूखे पत्ते की तरह

कभी इंतज़ार की शमामें जलते हुए

कभी मिलनके पलों में भीगते हुए

कभी नगमों को बोलोंको घोलकर

कभी ख़ामोशी की लहरोंमें सदा की तरह

कभी भीड़ में भी तनहाईके आलमको सजाकर

कभी अकेले में यादों की भीड़ लगाकर

मेरी जिंदगीमें क्यों समां गए हो तुम इस कदर ??????

जैसे चल रही हो तुम्हीसे हमारी साँसे .....

25 मई 2010

बस तुम और ???

आलम क्या है ये दिलका ?

ये समजा ना पाए हम कभी उनको ...

अब तो हमें शब्दों की भी शक्लें नज़र आने लगी है ....

बहार लिखे तो समां फूलोंकी खुशबुसे तर हो जाता है ...

पतझड़ लिखें तो कलमसे भी स्याही सूखने लग जाती है ....

हुस्न लिखें तो आपकी शक्ल रूबरू नज़र आने लगती है ....

इश्क लिखे तो मिलने की तड़प छा जाती है ....

इबादत लिखें तो सज़देंमें तुम्हारे एक बंदगी मुकम्मल हो जाती है ....

24 मई 2010

आए हो मेरी जिंदगी में

किसीके आने से बहार आ जाए वो लम्हे का है इंतज़ार ,

बस तुम क्या आ गए अब बहार का इंतज़ार भी कहाँ ????

बस दिल की धड़कन हो गए और सांस बनकर महक गए ,

अब इस दुनिया से हमारा वास्ता कहाँ ????

23 मई 2010

कदम

बस चुपचाप उठते कदमकी एक आह्ट

गर्दके कुछ जर्रे को पांवोके नीचे थाम

छाँव देती चली गयी थी उसे बिना कोई गिला

पैरोंके छालो को ढंककर उसने भी हमदर्द का वादा निभा दिया ....

22 मई 2010

आज की शाम

कल कहीं खो ना जाना इस दुनिया के झमेलेमें ,

बस आज की शाम हमने तुम्हारे नाम कर दी है ,

नज़रोंसे ओज़ल रहेंगे हम कल से

पर वो तुम्ही हो जिससे हमने मोहब्बत कर ली है ...

21 मई 2010

शबनम ...

शबनम सरकती नज़र आ रही थी ,

सुबहकी कोमल किरन भी आपको झुलसा रही थी यूँ ,,,,,

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तुम्हे पा लेने की तड़प भी अब नहीं रही ,

कहते है जनाजे पर इंसानकी रूह होती है

जब चाहे जहाँ चाहे जिसे चाहे

वहां पर वो जाने तमन्नाका दीदार कर सकती है .....

20 मई 2010

४६ डिग्री गरमी के आलम में ...

आसमांकी गरमा गर्म हवामें एक खूंटी पर

टांग दी गयी हो जैसे मेरे घर की छत ...

मुंडेर पर ठहरा घडी भर एक परिंदा

थोड़ी सी छाँव की आस में ...

मट्टी के मटकेसे रिज़ रही थी कुछ गलते जल की बुँदे

जैसे मटके को भी पसीना आ रहा था .....

बस उस बूंदोंसे प्यास बुझा कर अपनी

वो पर फडफडाते हुए उड़ गया गगनमें दूर कहीं ....

और इस पर हँसते हुए सूरजकी

खिल्खिहत गूंजी ख़ामोशीका लिबास पहने ...

आगकी कुछ और तेज लपटें उगली गयी उस पर

और ये गर्म बैसाख कुछ और झुलसा गया ......

19 मई 2010

एक बेकरारी ...

ना निगाहें मिली थी ना कोई फ़साना बना था

बेगानोंके इस जहाँमें फिर भी कोई अपना सा था .....

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इंतज़ारका शहद घोलता गया

इकरार भी प्यास छोड़ता गया ,

आँखोंमें उनके आने का बहाना ,

मिलनेकी बेकरारी छोड़ता गया .......

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शिकवे शिकायत का ये मौसम तो नहीं ,

दूरी भी बन सकती है मजबूरी कभी

ये हमें आपको बयां ना कर पाए कभी

क्योंकि ...

एक निगाह काफी है इजहारे इश्कमें

कोई लम्बी तकरीर की जरूरत नहीं .....

18 मई 2010

मायका ....

आज हमने घडीकी सुइयां ही निकाल दी ,

ये सोचकर की वक्त यहीं थाम जायेगा ....

आज हर साल की तरह फिर हमें विदा होना है ,

बाबुल के आँगनसे पिया की गली जाना है ....

आज ना मेंहदी रची है हथेलियों पर

आज ना शादी का जोड़ा ही पहना है ,

आज न कोई बारातका भी आना होगा

पर आज हमें फिर एक बार पिया के आँगन जाना होगा ....

कुछ पल हमने गुजार लिए बचपनकी गलियोंसे गुजरकर

पापाकी अलमारीसे सारे पुराने आल्बम निकालकर

सारे बचपनके संगी साथी रिश्ते नातीको उंगलीसे सहला लिया है

आज फिर इन सबको छोड़कर यादोंके हँसी मोड़ पर पियाके घर जाना है .....

बाबुलका आँगन छोड़नेकी कसक फिर वैसी ही बोझिलसी है

पियासे मिलने की कशिशमें भी वैसी ही ताज़गी भी है ...

आज फिर बचपनकी यादें और पिया का प्यार हो गए है आमने सामने

हमें फिर एक को अलविदा कह दूजे के पास जाना है ......

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बेटी चाहे कितनी बड़ी ना हो जाए ये गर्मी की छुट्टीमें अपने मइके जाने दिल तरसता है और फिर जब वापस आना हो अपने घर तो ये एहसास से हर बेटी गुजरती है ...है ना .....????

7 मई 2010

वो लौट कर आ ही गए ....

रीझते झख्मोंसे लहू के कतरे

अरमानोके धागे पिरोकर

टीसके साथ चुभोकर सुइयां

सीते गए ....सीते गए हम .....

बीचमें रह गयी कुछ जगह यूँही ...

वहीँसे झख्म भरते गए ...

हाले दिल बीमारका है अच्छा

ये ही हर ख़तमें लिखते रहे हम ...

पर ये बावरे नयनोसे

धंसकर आ गयी ये बागी अश्ककी बूंद .....

लिखे थे जो सफे पर पिरोकर जज्बातोंको अल्फाजोंको

फैलाकर बहा ले गए ....

ना कहते हुए कुछ भी हाले दिल बयां करते गए .....

आये वो ...आखिरकार एक दिन वो भी लौट कर वापस आ गए .....

ठीक वक्त पर लौटना हुआ ....

थोड़ी और देर कर देते तो

शायद जनाजे पर आखरी फुल भी अदा ना कर पाते ...........

6 मई 2010

सपने ....

आतिश और उर्जा !!!!

बचपनसे आज तक खेले ,पले और पढ़े साथ साथ ...

बहुत अच्छे दोस्त थे दोनों ...बस कल शाम आतिश के पापा का तबादला दिल्ही हो गया ...बस एक हफ्तेमें वो लोग जानेवाले है ...वो शाम आतिश और उर्जा के लिए बहुत ज्यादा भारीपनसे गुजरी ...दोनोंने मुश्किलसे ही कुछ बात की होगी ...अभी दो दिन पहले ही आतिश और उर्जाने अपने सपने को एक दुसरेसे बांटा था ...आतिश एम् बी ए करके एक अच्छी नौकरी करना चाहता था ...और उर्जा एयर फ़ोर्समें पायलोट बनकर आकाश छूना चाहती थी ...

आज की शाम उन्हें महसूस हुआ पहली बार की दोनोने एक दुसरेके बगैर जीना पड़ेगा ये कभी सोचा ही नहीं था ...हाँ ,दोनों प्यार में तो बिलकुल नहीं थे बस अच्छे दोस्त थे पर आज पहली बार लगा की ये दोस्ती कुछ एक कदम आगे पहुँच रही थी ....

खैर वक्त ने वक्त का काम कर ही दिया ...आतिश दिल्ही चला गया ..और उर्जा मुंबईमें अकेली रह गयी .......

आतिशके मम्मी पापा उसे शादी के लिए जोर दे रहे है पर वो मान ही नहीं रहा है ...पता नहीं क्यों पर जिसकी कोई खैर खबर नहीं उस दोस्त की याद उसे खूब सता रही है ...उर्जा और आतिश दोनोने अपनी दोस्ती के सारे पल अलग होकर भी खूब जी लिए है ....और यही बात आतिशके दिल में एक अरमान जगा रही थी की एक बार सिर्फ एक बात उर्जा की खबर मिल जाए ....

मा बाप के जोर देने पर एक दिन आतिश हैदराबाद जाकर उनके दोस्तके बेटी के साथ रिश्ते के लिए तैयार हुआ ..पहले देखने के लिए वे तीनो गए ...सब कुछ पसंद आ गया ....अगले महीने सगाई और दीवाली के बाद शादी तय हो गयी ...शाम हैदराबाद एयरपोर्ट पर एक लड़की को देख आतिश चौंका ..हाँ आपका अंदाज़ ठीक है वो उर्जा ही थी ...एक एक्जेक्युटिवके गेट अपमें बिलकुल अलग ,बहुत स्मार्ट लग रही थी ...आतिश उसके सामने जाकर खड़ा हो गया ...एक मेगेजिन पढ़ रही उर्जा ने नज़र उठाकर ऊपर देखा ...बचपन का दोस्त था पर डील डौल काफी बदल गया था ...क्लीन शेव चेहरा ,एक रूआबदार युवक आतिश को दो पल तो वो पहचान ही नहीं पाई .....

फिर खड़े होकर बड़ी शिद्दतसे गले मिले ....आतिश उसे अपने मम्मी पापा के पास ले गया ....सब खुश हो गए ...उर्जा ने आतिश को बधाई दी ....

पर दोनोंने जब अपने कारोबारके बारेमें बताया तो दोनों ही चौंके ...उर्जा एम् बी ए करके आज एक बड़ी इंटरनेशनल कंपनी में सी इ ओ है ...और आतिश एयरफ़ोर्समें फ्लाईट इन्जिनेअर है ...दोनोने सपने बदल दिए थे एक आशा में की दोनों शायद इस राहसे मिल जायेंगे ....

उर्जा के घर का फोन नंबर और पता आतिश ने लिख लिया ...उर्जा की फ्लाईट अनाउंस हो गई और वो चली गई ....पंद्रह मिनट के बाद एनाउंस हुआ ..की मुंबई जाने वाली फ्लाईट उड़ान के तुरंत बाद क्रेश हो गयी है ...आतिश और उसके मा बापने तुरंत अपने टिकट केंसल करवा कर उर्जा को ढूँढने पहुंचे ...उसको हॉस्पिटलमें भर्ती करवाया ...उसे हाथमें फ्रेक्चर हुआ था और पैरमे मोच आ गयी थी ...चेहरे पर चार पॉँच स्टिच थे ...पर एक महीने में वो बिलकुल ठीक हो जायेगी ऐसे डॉक्टरने बताया ...अब आतिशने उर्जा के मा बाप को मुंबई फोन किया और अगले पॉँच घंटेमें वो भी उधर पहुँच गए ...

उर्जा को अभी तक होश नहीं आया था ...डॉक्टर का कहना था की बारह घंटे तक होश आ जायेगा ॥

जब उर्जा को होश आया तो आतिशको सामने पाकर उसे ताज्जुब हुआ ...आतिशने बड़े प्यार से उसका हाथ थाम लिया ...उस स्पर्शमें दोनोंके मा बापने प्यार का इकरार पढ़ लिया और इशारों इशारोंमें कुछ तय भी कर लिया ...दोनोके सपने पले थे ...बढे थे ....और एक दुसरे की तलाशमें एक दुसरेमे जाकर पुरे भी हुए थे ...उर्जामें एक आतिश था और आतिशमें एक उर्जा थी .....

4 मई 2010

हाइकु : जन्मदिन पर मेरे ...

सपने देखो

सूरजकी लालिमा

न्यौता दे रही आज ...

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ख़ुशी के पल

चल दिए गम भी

हंसके दूर ......

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जश्नका मौका

भूलाकर गमको

हँसते रहो .....

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गुजारिश है

गूंजती रहे गली

हँसीसे सदा ........

3 मई 2010

खता एक सजा भी

कुछ कहने को दिल करे और जुबान साथ ना दे

बस बंद पलक आँखों पर से उठने का नाम ना ले ,

दवात कागज़ पर स्याही छोड़ने का इनकार करने लगे

कांपते होठ बस यूँही सिल कर रह जाने लगे ,

कोई कुछ तो बता दे की ये दिलने खता कर दी है

इश्क करनेकी फिर भी इज़हारसे अब क्यों ये डरने लगे ????

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देखो ये कितनी सजा मुझे मिल गयी जिंदगी की ,

काफिर हूँ फिर भी जुबानसे निकले हर अल्फाज़ बंदगी के ......

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अजनबी चेहरे पर ठहर जाती है नज़र

तलाश फिर भी रह जाती है दीलमे कोई अपने की ...

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...