31 मार्च 2010

बस यूँही आज

पुकारा मुझे सदा देकर उन्होंने

हमें भी अरमान थे उनसे मिलने के ...

पर ये कदम रुकसे गए

पर ये कदम जमते गए

और ये कदम रुक गए

ख्वाहिशोंकी लौ जलने लगी यूँ

मिलनकी तलब लिए ये साँसे भी पिघलने लगी

पर ये क्या ,

चलने को बेकरार कदमोंको वक्त की बेड़ियाँ जकड़ने लगी ...

सोचती हूँ क्यों हुआ ऐसे इस बार ?

उनके जहनमें रहना चाहा है हरदम एक याद बनकर हमने ...

उनको भी साँसोंमें बसाकर रखा है ...

आँखोंमें नूर बनकर चमकती है वहांसे आती महक उनकी ...

आवाज मेरी होती है पर अल्फाज़ उन्हीके होते है ...

बस एक अरमान यही अब तो ,

जवान रहे उल्फत हमारी यूँही

एक आवाज बनकर ....

एक इंतज़ार बनकर ....

30 मार्च 2010

उफ़ इश्क कर लिया हमने भी ....

ना ख्वाहिशें थी पल रही इस नादाँ दिलमें ,

ना शिकवे करे किसीसे ना कोई गीले हुए कभी ,

बस नजरें मिली यूँ तुमसे जिस पल

इश्कने हमें सब सिखा दिया ............................

तनहा होने के एह्साससे रहे थे परे हम अब तक

तुमसे मिलने पर ये तनहाई के पल भी रास आने लगे अब ,

तुमसे यूँ बिछड़ना मिलकर हरवक्त

हमें ये इश्ककी तड़पकी तपिश से पिघला गया ....................................

बड़ा नाज़ था हमें खुमार था अपने दिल पर यूँ

कोई जीत ना पायेगा उसे नज़रोंके निशानों पर ,

महसूस किया तहे दिलसे जब तुम्हारे प्यार की सादगीको ,

बस खुल कर इज़हार करना चाहा है हाँ हमें भी हो गया प्रेमरोग ......

सुना तो ये भी था की हुस्न होता है बड़ा ही शातिर और कातिल भी

जान लेता है ये आगका दरिया भी है ,

पर तेरी दीवानगी यूँ कुछ रंग ला गयी

की ये इश्कने हमें जानिस्सार होना सिखा दिया ......

27 मार्च 2010

ये मतलब ...

मैं राधा हूँ या मीरा

ये नहीं मालूम मुझे ...

मैं तो जान पाई बस इतना ही

मेरे आराध्य तो बस कृष्ण ही ..........

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मिलन या विरह मायने नहीं रखे कभी मेरे लिए ,

मिलने की यादें बिरहमें बहला गयी मुझे वैसे ही

जैसे तुम मेरे पास ही हो ......

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कहाँ जान पाए हम प्यार का मतलब ....

मिलने पर जान नहीं पाए कुछ भी

जुदाईने भी रुला दिया ...

बस देख लेते एक पल की हम तो दिल में रहे थे हरदम

तो ये गिले शिकवे होते कहाँ ?????

26 मार्च 2010

पहेचान

आज मुझे मेरा आसमां मिल गया

मेरे ही घर की छत के तले

ना दीवारों की सरहद थी

सब आर पार बड़ा ही साफ़ .....

ना गर्द ना उठता हुआ धुएं का गुबार

बस पैर टिकने भरकी जमीं का एक टुकड़ा ...

आज मेरे घरके छत के तले आसमां पा लिया .......!!!!!

छितरे छितरे बादल बिखरे रुई के टुकड़ों से

मुंडेर पर सजा कर जाते है कोयल की कूके

नर्तन मयूरका था मन जो थिरक रहा था मेरा

पर ...पर ....

पता नहीं हया के पर्दों के पीछे कोई छिप रहा था ...

अब अब्र के पंख लिए

चाँद की जमीं पर

सितारों के दरीचे पर एक मेरा भी मकाम है ...

गौरसे देखो उस पर लिखा हुआ एक नाम है

वो नाम नहीं किसी और का किसी गैर का ॥

वो तो मेरा ही नाम है सिर्फ मेरा .....

25 मार्च 2010

एक छोटी सी खता ...

कभी ऐतबार आ जाये खुद पर

बस एक खता कर लेना तुम भी ,

इश्क किया है हरदम तुमको ही जिसने ,

प्यार उससे भी कर लेना तुम भी .....

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एक काले अँधेरे साए के आंचलमें ,

हम बैठे रहे रात भर यूँही तनहा ही ,

शमा भी थी पास ,आतिश भी थी ,

पर ख्वाहिश पल रही थी दिलमे यही की

आयेंगे जब वो मिलने मुझसे ,

चराग को खुद ही रोशन करेंगे और उन्हीका दीदार होगा हमें भी ....

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तड़प थी इस पार भी

तड़प थी उस पार भी

ये भी नहीं था की ना थी नाव साहिल पर ,

और दरियामें भी भरपूर था पानी भी ,

पर बुत बनकर खड़े ही रहे हम ,

क्योंकि उनके आने का ऐतबार

अभी तलक ना कर पाया ये दिल .....

24 मार्च 2010

उसका पन्ना

इस डायरी का हर पन्ना एक दास्ताँ लिख लेता है ,

बंद करके अपने घूँघट को दिलमें उसे सिल लेता है ,

समय की गर्द जमा लेती है परते कई उस पर

ना उसे कोई घुटन होती है ना कोई गीला इस जहांसे .....

वो अपने हर लफ्ज़ हर सफेमें

एक दर्द को चुपके से सिसक लेता है

लेकिन फिर भी खुशियों को चुराकर इस जहाँ की हवाओंमें घोल लेता है ....

कोई गुस्ताख दिल एक दिन

बेअदबीसे पेश आ ही जाता है उस पर

गर्द को झाड़कर उसका घूँघट खोल

दुनियाके सामने उसकी नुमाईश कर देता है ....

वो अलग था

उसका बाहर अलग था

उसका भीतर अलग था

जो गूंजती थी हँसी उसकी फिजाओंमें

दर्द की छलनीसे छनछन कर आया करती थी

अब उसे लग रहा था

वो सरे बाज़ार लुट गया ......जिंदगी की पूंजी सा दर्द कोई लुट कर ले गया ...

11 मार्च 2010

कुछ तो है ...

रुकती चलती बहती हवाओंके थपेड़े

कभी सहलाते ,कभी जैसे एक थपेड़े मारते ,

मेरी तनहाईके संगी साथी है ....

एक सुर बनकर मेरे कानोंमें घुलकर

पियु का संदेसा लाते है ....

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इंतज़ार करनेकी हमें तो आदत नहीं थी ,

ये कम्बखत इश्कने हमें ये भी सिखा दिया ........

नींदोंको ओज़ल करके आंखोसे

ख्वाबोंके संग जीना सिखा दिया .....

10 मार्च 2010

फिर तेरी तलब ....

घुट घुट कर यू हम जीते हैं
अश्कों को अपने पीते है
तलब तेरी दिल में लिये
क्या जाने कब तुझे रहम आ जाये
हमें जीने की वजह मिल जाये !!!!
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किरकिरीसी हाथोंकी लकीरोंको तकते हुए
नज़रसे भर दी हमने उन खाली सतह्को
मेरी तक़दीरको जो मुकम्मल अंजाम दे गया ,
खो गया वो शख्स फिर किस गुबारमें ???
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मुखातिब हुए है तेरी महफ़िलमें फिर आज ....
तेरे रूहानी नूरसे रोशन कर दे जहाँ मेरा फिर आज ....

9 मार्च 2010

परदेसिया ...

आज अलमारीके ऊपरसे एक टूटी संदूक निकली ....

धुल झाड़कर खोला अन्दर तो बैठा था उसमे मेरी संतान का बचपन ,

वो ही लुकाछिपी खेलता ,टूटे खिलौनेके भीतर बैठा ,

वो थोड़े रंगीन चोकके तुकडे भी थे ....

पसवारती रही जैसे बचपनमें गोद में लिटा कर उसके बाल पसवारे थे ....

पूरा बचपन भरा था उसका संदूकमें पर वो पास ना था ....

दूर सुदूर परदेसमें बैठा था वह अपनी परदेसी नू के साथ ,

बस अब तो डॉलरके नोट लिफाफेमें फ़र्ज़ का जामा पहनकर

कर्ज उतारती हो परवरिशका इस कदर महीने भरमें एक चिठ्ठी आती है .....

वक्त इतना महंगा हो चूका है की डॉलर भी फोन का बिल भरने सक्षम नहीं ....

तेरी तस्वीर को नहीं पोछा हमने कभी कपडे से ...

अब तो हर सहर वो आंसूसे भीगे ममताके आँचलसे पोछी जाती है ....

8 मार्च 2010

नारी दिवस मुबारक हो ....

नारी दिवसकी हार्दिक शुभकामनायें ...........

१००वे नारी दिवस के दिन हमारी लोक सभा में ३३% अनामत का बिल भी पास होने जा रहा है तब एक बात याद आई है ...

हर नारी दिवस पर मुझे एक द्रश्य याद आ ही जाता है ....

मेरे घरके पास कुछ आदिवासी जो मजदूरी करके अपनी गुजर चलाते है ऐसे चार पॉँच कुनबे रहते है ...एक बड़ी सुबह मैं चलने के लिए गई तब मैंने देखा अपने तीन चार माहके बच्चे को एक औरत खूब दुलार देकर उससे खेल रही थी ...पास ही एक लकड़ी के चूल्हे पर एक मट्टी के तवे पर उसका मर्द मक्के की बड़ी बड़ी रोटी उतार रहा था ...और बच्चेके साथ खेलते हुए वो औरत नाश्ता कर रही थी ...नाश्ता कम लंच मर्द बना रहा था फिर सूरज उगते ही दोनों मजदूरी पर जायेंगे ...बच्चे को कपडेके झोलेमें सुलायेंगे ...और कंधे से कंधे मिलाकर पूरा दिन काम करके लौटेंगे .......

ये लोग कुछ पढ़े लिखे नहीं है ...पर उनके लिए औरत का सम्मान कितना सहज है ...वे लोग कन्या भ्रूण हत्या भी नहीं करवाते ....

एक बार फिर एक बात दोहरा रही हूँ :

कोमल स्पर्श ,कोमल ह्रदय ,और कोमल भावनाएं है मेरी पहचान .....जो हर कठिन कार्य को मख्खनसा मुलायम बनाकर आसानीसे मंजिल तक पहुँचानेकी क्षमता रखती है .....

हाँ मैं औरत हूँ : फूल से भी कोमल और वज्रसे भी कठोर .......

आपकी जिंदगीकी पहली सांस से आखरी सांस तक अलग ही रूप में मिलने वाली एक संजीवनी यानी की मैं औरत .............

मुझे नाज़ है अपने नारी होने पर ...

मुझे गौरव है नारीत्व का ....

गरिमा एक नारी की बनेगी मेरे आत्मगौरव की पहचान .....

6 मार्च 2010

शुरुआत यहीं से हो

इंसानको सबसे ज्यादा ख़ुशी होती है जब उसकी जिंदगीमें उसके अपने खुनसे सिंची हुई प्रतिकृति उसकी संतान का आगमन होता है ...बहुत सपने सजाते है हम उस संतानके लिए ...अपनी ढेर सारी उम्मीदोंको जोड़ते है उसके साथ ...पर ....हाँ ...पर ....

आज ये बच्चे क्या हमें भविष्यमें एक सुरक्षित मुकाम पर नज़र आते है क्या ???क्यों ??? हम सब अख़बारमें आते समाचारसे वाकिफ तो है ही पर कभी उचित कारण जाननेकी कोशिश की है ???

ना !!!!

एक बात जो मैं कई बार दोहरा चुकी हूँ की संतान अपने खूनसे पैदा होनेके बावजूद वह एक स्वतन्त्र व्यक्ति है उसका स्वीकार करो ...अपनी सोचको उस पर लादनेसे पहले उसकी सोच को समजने की कोशिश करो ...एक दिन का बच्चा भी अपनी रोने की आवाजसे समजा देता है अपनी माँको समजा देता है की उसे भूख लगी है या फिर सु सु करदी है ....तो फिर उसकी जिंदगीका निर्णय उसे करने की आज़ादी क्यों नहीं देते हम ??? खुद तो डरे होते है पर ये डर अगले वक्त तक आगे ले जाते है ...

अगर आपके बच्चे छोटे है तो ये जरूर पढ़ें :

१...उसको चलते वक्त गिरने की आज़ादी दे ...वो समज जायेगा की वह क्यों गिर रहा है और गौर से देखोगे तो ना गिर पड़े उसके कई विकल्प वो खुद ढूंढ लेगा ...

२...उसे रेत के ढेरमें खेलने की गंदे होने की आज़ादी देना ...सर्दी हो जाएगी ऐसे कहकर उससे बारिशमें भीगकर कागज़की नाव तैराने की आज़ादी मत छीन लेना .......सच बात तो ये है की अगर वह गर्मी और सर्दी को सहन करना सीखेगा तो उसका शरीर उसका मुकाबला करना सीखेगा ...खूब ढँक कर रखने से उसके शरीर की स्वरक्षाकी प्रणाली होती है वो कमजोर पड़ जाती है ...

३....दीवार पर पेन्सिलसे और क्रेयनसे उसकी कल्पनाके चित्र बनानेके लिए घर का एक कमरा या दीवार उसके लिए खाली रखना ...देखना उसे गौरसे कहीं ना कहीं उसके ख्यालोंकी तस्वीर उसमे नज़र आही जायेगी ...

४....होमवर्क ना करे तो कोई बात नहीं पर उसे आसपास के बच्चोके साथ हमउम्र लोगो के साथ खेलने की आज़ादी मत छिनना ...शायद उनमे कोई सचिन या सानिया नज़र आ जाए ....

५.....उसे स्कुलमें सिखाई गयी कवितायेँ या रेडियो टी वी सुने गाने जोरोंसे गानेकी आज़ादी देना ...क्योंकि जब ये बड़े हो जायेगे ...बड़ी क्लासमें पढेंगे तब उन्हें ये सब के लिए वक्त नहीं होगा ..और आपके घर की ख़ामोशी ये दिन याद करके चुपके से रो पड़ेगी ....

६....कोई अन्यायके लिए वह लड़ता है तो अगर ये बात जायज हो तो उसे न्याय जरूर दिलवाए तो उसके दिल में असुरक्षितताकी भावना बचपनसे घर नहीं करेगी ....

७... आप दोनों मिया बीबी व्यावसायिक हो तो भी रोज अपने बच्चे के लिए एक घंटा किसी भी हिसाब से जरूर निकाले ...उसे सलाह देने के लिए नहीं पर सिर्फ उसके साथ बच्चे बनकर खेलने के लिए ...आपकी ये छोटी सी कोशिश आपको उसके और अपने आगेके जीवनमें देखना कितनी सफल नज़र आएगी ...शाम को नहीं तो सुबह में सही ...कमसे कम हफ्तेमें छुट्टी का पूरा दिन उनके नाम कर दो ....

८....सबसे अहम बात अब आती है की जब वो इम्तिहानमें फेल होकर आये तो उसे डांटनेकी जगह उससे सहानुभूति से पेश आओ ..उसे ये सिखाओ की बेटे /बेटी ,जिंदगी में एक इम्तिहानमें फेल होते है तो कोई बात नहीं ,अगली बार आप उसमे ज्यादा ध्यान दो और दिल लगाकर मेहनत करोगे तो जरूर कामियाब होगे ...और उतना ही नहीं इस बार उसकी नकामियाबी की वजह आप ढूंढो उसे दूर करने में उसकी मदद करो ....चाहे खेल हो या पढ़ाई असफल होने पर कभी अपने बच्चे को नीचा दिखाने की कोशिश मत करो ...उसे मदद करो उसकी मुश्किल को समजो ....उसे अपने पंख फेलानी की आज़ादी दो .....अगर वो गणितमें तेज है और इतिहासमें कमजोर हो तो कहो बेटे इस विषयमें आप मेहनत करो ताकि थोड़े और अच्छे नंबर आये ....उसकी मुश्किल में दोस्त बनो ताकि वो अपनी हर बात आपसे बांटे और सही मार्गदर्शन पा सके ...उसे ये समजा दो की सिर्फ पढाई नहीं उसका निजी कौशल्य भी जिंदगीमें कामियाब होने के लिए बहुत मायने रखता है ....

९...उसे घर का ही नहीं, दोस्तों का ही नहीं पर रिश्तेदारों का भी जीवनमें अहम् स्थान है ये समजने दो ....

ये छोटी छोटी बातें जो बहुत कम समय मांगती है पर अमल में ला पाओगे तो कोई बच्चा इम्तिहान के डर से आत्महत्या नहीं करेगा ...उसके सपने को pura karne के लिए घर से नहीं भागेगा ....

4 मार्च 2010

ये परीक्षा ...ये वेकेशन ....

आजसे बोर्डके इम्तिहान शुरू हो रहे है ...

अब लगता है होली का गुलाल रंगहीन बन गया है और माँ सरस्वतीकी आराधना अत्र तत्र सर्वत्र की जाने लगी है ..आज के ऐनक लगे, कंधो पर भारीभरकम बेग मजदूर जैसे किताबों का बोजा लादकर जा रहे मासूमोकी दया उसके माँ बाप को भी नहीं आ रही वो आने वाले दिनोंमें दिखने वाले कुछ धुंधले भविष्यके नज़ारे है .....

आजसे दो साल पहले मेरी बेटीने जब अपने करियरको लेकर मेरी राय मांगी तब मैंने उसे बेहिचक येही कहा बेटे तुम क्लिनिकल सायकोलोजीमें डिग्री ले लो ...क्योंकि आने वाला युग ये है की ये लोगोंकी जरूरत लोगों को सबसे ज्यादा पड़ने वाली है ...क्योंकि अब तो दसवी बोर्ड की एक्साम को भी लोगोने महाभारत के रणसंग्राम से भी ज्यादा गंभीर समजना शुरू कर दिया है ...खैर बेटीने तो अपने पसंदके विषय में आगे पढना बेहतर समजा ...पर मेरी बात को गौर से समजो तो वजूद नजर आ जाएगा ...

एक अच्छी स्कुलमें के जी में एडमिशनसे लेकर ही स्ट्रेस शुरू होता है जो जीवनके आखरी सांस तक पीछा नहीं छोड़ता ...और बहुत ही खेद जनक बात ये है की इसके लिए जिम्मेदार हम खुद है और कोई नहीं ...कोई कोई इक्के दुके माँ बाप तो जब तक संतानकी जान नहीं चली जाती तब तक ये बात नहीं समज पाते की संतान उनके जिस्म का एक अंश होने के बावजूद उसका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व है ....

पहले के जमानेमें वेकेशन का इंतज़ार हुआ करता था ...मामा चाचा के घर जाकर हुडदंग मचाना हर बच्चे का हक़ हुआ करता था ...फिर सब हमारे यहाँ भी आते थे तब उनको अपने शहर का चिड़ियाघर दिखाने ले जाते वक्त कभी थकान नहीं महसूस होती थी ...ममेरे चचेरे भाई बहन में कोई फर्क नज़र नहीं आता था ...चाचा चाची ,मामा मामी का दुलार अभी भी याद आता है ...ये रिश्ते हमारी साँसों के जितने ही कल भी जरूरी थे और शायद आज तो ज्यादा जरूरी बन गए है और अफ़सोस ! अनदेखे भी !!!

आज कल आई. क्यू जितना जरूरी है उससे भी थोडा ज्यादा जरूरी बन चूका है इ. क्यू ...याने की इमोशनल कोशंत्त ....और इसके लिए जरूरी होते है रिश्ते ...आज कोई मेहमान आता है तो भी उसका हंसकर बुलाना तो दूर पर उसके जाने का इंतज़ार पहले होता है इस हद तक शहरी इंसान स्वार्थी हो चूका है ...हाँ महेंगाई जरूर बढ़ गई है पर ये दिल का कोरापन खल रहा है ...इंसान इंसान से कट रहा है ...रिश्तो से दूर भागता है -करियर को इतनी ज्यादा अहमियत दी जा रही है ...और आखिर कर ये उसकी महत्वकांक्षा ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी ये बात उसे तब समजमें आती है जब वो पूरी तरह से टूट जाता है ...

बचपनमें हमें कोई स्ट्रेस नहीं था उसका एक जरूरी कारण ये भी था ...हम गम ख़ुशी को बाँट लेते थे और दिल पर कोई बोज नहीं पड़ता था ...वेकेशनके दो महीनोमें हमारे बच्चोको पूरी तरह उनकी इच्छा से ही गुजारने की इजाजत दे दो ..उनकी पसंद की हरकते ,एक्टिविटी करने दो ...और पढ़ाई से तो बिलकुल दूर रखो ...हाँ टीवी ,वीडियो ज्यादा करीबी मत रखने दो ......खुद मेहमान बनो और मेहमानों को बुलाओ ...हाँ पहले पंद्रह दिन के लिए जाते थे अब तीन चार दिन के लिए तो आ जा सकते हो ....ये शुरुआत अभी करोगे तो थोड़े बरसोके बाद ये जरूर लगेगा की हमारा स्ट्रेस हमारे पडोसीके स्ट्रेस से कितना कम है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

कुछ इश्की मिजाज था ....

वो बादलोंमें नजर आता वो चेहरा ,
वो रिमज़िम बुँदे बारिशकी ,
ठंडी हवाओंके ज़ोके कुछ पयाम लेकर आते थे ,
कौन किसीसे जुदा हुआ कभी ?
ख्यालोंमें अभी भी वो अक्सर बिना मेरी इज़ाज़त ही चले आते है ........
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झूमकर बहती जिंदगी को एक साहिल का इंतज़ार ,
एक छोटीसी कश्ती और सागरकी लहरों का आनाजाना ....
बैठकर देखते रहें आज यूँही किनारे ,
सागरका यूँ सूरजको निगल जाना !!!!!!
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हलकसे निगलते हुए पानी भी सुराही को तराश देता है वो मखमली अंदाज है ,
संगेमरमरभी शर्मोहयासे रूबरू होते कतराते है वो हँसी नजाकत है ,
हूर या परी को तो ना देखा कभी हमने ख्वाबोंमें कभी ,
एक तेरा दीदार हो जाए फिर क्या जन्नतकी जरूरत है !!!!!

3 मार्च 2010

चल कहीं दूर ....

चल कहीं दूर निकल जाएँ .......

बहती हवाओंमें घुलकर मौसमका एक राग बन जाए ,

किसी बांसुरीकी तानमें खो जाएँ ,

बस इस रूह की पंखो पर बैठ दूर कहीं निकल जाए ....

राहोंमें मिलेंगे कई परिंदे उसके गान की तान पर

एक नया गीत लिख जाए ...

फिर एक बार उन गीतोंको हम मुस्कानोंमें भर जाए .....

धीरे धीरे हमें भी आ ही गया देखो यूँ खुल कर जीना इन पंछियों सा ,

कोयलकी कूक बन मन वीणा पर गीत गाते रहना .....

और देख काले घन पिहू पिहू कर मयूरसा

पंखोको ओढ़नी खोल कर जी भर भर के डोलना ...

चलो दिल आज इन्ही वादियोंमें गूम जाए ...

खुदके जिस्मसे आज़ाद हो ...

रूह के बल इन वादियों गूम जाएँ .....

2 मार्च 2010

स्क्रेपबुक

कोई कहीं से आये और कुछ गुनगुना कर चला जाए ...
बस धून रह जाती है गुनगुनाती जहनमें आपकी याद बनकर .....
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कब कोई कहाँ मिल जाए है ये तो हम ना जाने है
पर याद बनकर जो रुक जाए है बस वह दोस्त कहलाये है
यहाँ पर उम्मीद करी जाती है कम बस साथ हो वही काफी है
गम हो या ख़ुशी कोई अपनी पहले उसकी ही तस्वीर नज़र आती है ....
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तुम्हे देखते ही ख्याल आया हम मिलें है कही कभी ,
पहली बार की पहचान ये तो नहीं होती ,
चलो आसमान पर लिखी तक़दीर को पढ़े ,
कोई रास्ता चलते चलते मिल गया है अपनी राहों से ...
हाथ थामलो मजबूती से अब साथ ये साथ साथ चलता रहे ...