31 अक्तूबर 2009

घायल ...

इंसानियतकी तलाशकी चाहत लिए गली कूचोसे गुजर रहे है ,

इंसान तो मिलते है पर जैसे खोखले शरीर रूहके बिना ,

पैसोंने खरीद ली है इंसानियत उनकी जरा भी उन्हें गम नहीं ,

बस हम अब हम तो है पर कुबूल है की अब हम हम ही नहीं ....

नोचकर देखे हमारे जिस्मसे ऊपर का नकाब

तो लहू तो सबका लाल ही निकला है ...

पर पता नहीं ये वहशीपनका कहाँसे हिसाब निकल चला है ,

बिना छुरी चलाये अब ये भी हम कर जाते हैं ,

सड़क पर घायल को अनदेखा कर हम आगे चले जाते है ....

ऊपरवाले से डरना क्या ? हमने ये पाप कहाँ किया है ?

आपके धर्मस्थान पर कल ही लाख रूपये का चेक दिया है ......

30 अक्तूबर 2009

सुनो दिलकी कभी कभी ...

नई बहारमें नए मंजर की तलाश है ,

सब कुछ पास होते भी ना जाने किसकी तलाश है ,

दिल कहता है वो आएगा जरूर आएगा ,

क्योंकि मुझे नहीं मेरे दिल को उसकी आस है .......

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जब वो मिले तब एक बार भी ना सोचा ,

लेकिन जब पढ़ा उन्हें बार बार उन्हें ही सोचा ,

मिलने पर कुछ कह नहीं पाते कभी उन्हें ,

पर लगा उन्होंने भी अब हमारे बारेमें सोचा ....

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29 अक्तूबर 2009

करवट ......

नर्म लगती रही हर बिसात इश्कमें ,

जब कुछ ख्वाबोंको बुलाने हम सो गए ,

हादसा बन गई वो तमाम यादें तुम्हारी ,

जो नर्म नाजुक अंडोसी टूटती रही ......

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टुटा दिल हमारा भी और तुम्हारे ख़याल ,

डसते रहे एक नागदंशकी चुभन से अब हर पल ......

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कहा था सयानोंने इश्क करना खेल है आगका ,

पर क्या जाने वो दीवानेकी ये आग ठण्ड का अहेसास लिए थी .....

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फूलोंकी सेज पर सोना तो चाह रहा हर कोई ,

तेरे इश्कमें तेरी बेवफाईने हमें काँटोंसी चुभन तो दी ,

न कोई शिकवा किया ना कोई गिला ,

तस्वीर तुम्हारी मेरे जहनमें हरदम हसती ही रही .....

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हर सोफे पर बैठकर हमें जो अहेसास हुआ वो लिख दिया ......

28 अक्तूबर 2009

ठहरे है ख्वाब ...

जिंदगीने न प्यार किया ये शिकवा लब पर रहा ,

हमने जिंदगीको प्यार करना सिखा अब जिंदगी को शिकवा रहा ...

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रातको ख्वाब सो रहे थे ,

मेरी अधखुली आंखोंमें .....

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नींद का ख्वाबोंसे रिश्ता कहाँ ?

नींद उड़ जाती है ,ख्वाब ठहर जाते है .......

27 अक्तूबर 2009

25 अक्तूबर 2009

एक शामियाना ....

दरख्तोंके शामियानेमें कोयलकी कूक शहनाई बन गूंज उठी ,

अम्बियाकी खट्टी सी खुशबू साँसोंको तर करती चली गई ,

बहारों का खुशनुमा मौसम दस्तक देने लगा मेरे दर पर ,

क्यों तेरे इंतज़ारमें बिछी मेरी आँखे तेरी तस्वीर पर ठहरकर नम हो गई ?

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दरारोंको भर रही थी गीली मिटटीसे कल ,

हर दरारमें तेरी यादें छुपकर बैठी थी ....

मिटटीसे उसे भर न सकी मैं ,

टूटे शीशेसी तुम्हारी यादोंको सजाकर बिखरनेका इंतज़ार कर गई ......

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तकरीर तुम्हारी सुन ली प्यार का इज़हार लिए ,

सुन सको तो सुन लो जो मेरी खामोशी बयां कर गई .....

24 अक्तूबर 2009

मेरे वतनकी मिटटी ....

खेतों के हरे दरीचों पर लहलहाती वह फसल ,

सौंधी सौंधी खुशबू जो तर कर रही थी नशेसी ,

खुले पाँव ही उबड़ खाबड़ पगडण्डी पर चलते ,

मैं अपने वजूदसे दूर वतनकी मिटटीमें घुल गया ........

गोबरसे सनी वो दिवाले ओपले बनकर ,

भैंसके गाढे दूधकी धारा ,मक्खन मथते हुए वो संगीत ,

चूल्हे पर चढी हुई वो सरसों दे साग दी खुशबू ,

न कभी ऐसी भूख लगी ,न कभी ऐसी तृप्ति हुई ........

एक छोटीसी चारपाई पर एक दरी पर ,

हाथोंका तकिया बनाकर आसमानमें तारों से बातें ,

एक नन्हींसी परी का सपनेमें आना और

हमें गहरी नींद सुला जाना .....

ऐसा जीवन एक दिन पा जाना और सारे गम भुला जाना ......

घर आकर वो मैली जींस की पेंट निकाली ,

धूल से सनी थी मेरे वतन की ,

ब्रशसे सारी मट्टी झाड़ दी फर्श पर और

फ़िर हथेलीसे इकठ्ठी करके एक डिबियामें बंद कर दी .....

मेरे वतन की याद को ....

23 अक्तूबर 2009

जहेमत

फुर्सत मिलती है फुरकत के लम्होंमें ,

तुम्हे पल भरके लिए रूबरू मिलने आते है ख्यालोंमें ....

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वक्तको जकडा मुठ्ठीमें ,

पसीनेसे तर वो हथेलीमें चिपक गया ,

लम्हे होते वो मीठी यादोंके तो अच्छा था ,

नामाकुल ये तो वो निकले जिनसे मैं हरदम भागता था .....

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जुबानको कुछ कहने की जहेमत दे दो ,

आँखों पर पलकोंकी चिलमन ढककर ....

22 अक्तूबर 2009

बस यूँही कुछ महसूस हुआ

खरोंचे और देखे मैंने खुबसूरत चेहरोंको ,

नाखून तेज नहीं थे फ़िर भी लहुलुहान हुआ मेरा दिल ,

ये खुबसूरत चेहरोंके पीछे छुपे

वो काले दिल जो दिमागी गन्दगीसे थे भरे ....

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कब कहाँ किस जगह कोई मिल जाए ,

पल भरके साथमें भी सारे जनम का सुकून दे जाए !!!!!

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शायद वो तुम ही थे कल रातमें मुझे मिले नकाबमें ,

बस जहनमें रह गई है वो आँखें तकती मुझे प्यारके इकरारमें ...

21 अक्तूबर 2009

बह गई थी वो रात

कुछ बुझे हुए दिए की जली हुई लौ थी ,

पठाखोंकी जली हुई बारूदकी गंधसे भरी हवाएं थी ,

बिखरे हुए रंगोंसे सजा हुआ था आँगन ,

मिठाईओंके खाली बक्सोंकी जमावट थी ......

दिल तो खुशियोंसे भर गया था बहुत ,

पर बदनमें बहुत सारी थकावट थी .....

हाँ ये सारी निशानियाँ गुजरी हुई दीवालीकी रातों की थी .....

18 अक्तूबर 2009

मथुरा वृन्दावन =पावन श्रीकृष्णधाम

मथुरा वृन्दावन !!!!

ये दोनों नाम सुनते ही हर आस्थावान का सिर श्रध्दा से जुक जाता है ।आँखों के आगे माखन चोर नन्हें नटखट कनैया से लेकर कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता ज्ञान देते श्री कृष्ण की छवि राम जाती है ....

सौभाग्य से इस परम पावन भूमि पर दो बार मैं जा चुकी हूँ ...

इस वक्त की समग्र यात्रा का वर्णन मेरी १९८२ की यात्रा पर आधारित है ।जब मैं अपने माताजी और पिताजी के साथ गई थी .पिताजी ने बहुत ही अद्भूत और रोचक संस्मरण लिखा है जिसका हिन्दी में भावानुवाद आपके समक्ष पेश कर रही हूँ ,मेरी कलम आज विराम लेगी :

यमुनाजी के घाट पर विश्राम घाट पर आरती के दर्शन के लिए जाना यही एक अविस्मरनीयअनुभव है ।यमुना का नीर मट्टी से मिला हुआ था पर आस्था उन सबसे ऊपर है .यहाँ पर अधिक गुजराती यात्री आने के कारण यहाँ के चौबे ,महंत , गाईड सभी शुद्ध गुजराती भाषा में बातचीत करते थे ...

वासुदेव मध्यरात्रि को कृष्ण के जन्म के बाद इसी यमुना से गुजरकर सामने वाले किनारे गोकुल पहुंचे थे ये कल्पना जहन में साकार होने लगी ...

हाँ यही यमुना थी जहान पर कृष्ण ने कालीय नाग का दमन किया था ,वह ग्वालों के साथ खेले थे ।गोपियों की मटकियां फोडी थी ,माखन चुराया करते थे ...

द्वारकाधिश के बड़े मन्दिर में दर्शन करे ।बाज़ार बंद था .मन्दिर के मैदान में ही बैठ गए .बहुत ही प्राचीन मन्दिर पर इतना लुभावना !!इसके बड़े से घुम्मत पर श्री कृष्ण के जीवन प्रसंग चित्र स्वरूप में बनाये गए थे ...

दूसरा है कृष्ण जन्मस्थान का मन्दिर ।उसके पीछे एक मस्जिद बनी हुई है .कहा जाता है कौमी दंगो के दौरान दोनों ने एक दूसरे के धर्म स्थानों को सात बार नष्ट किया था .आख़िर कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार ये मन्दिर बन गया . (२००५ में अति भव्य स्वरूप हमने दोबारा देखा .ये अति भव्य मन्दिर है जो हमें श्री कृष्ण जन्म के वक्त टी वी पर लाइव टेलीकास्ट में दिखाया जाता है ).उस वक्त डोंगरे महाराज ,बिरला और दाल मियां ने २२-२२- लाख रुपये दान में दिए थे .दूसरे दानों का तो कोई हिसाब नहीं ...

कृष्ण जन्म वाली जेल को यथा स्वरूप रखा गया है ।वहां पर मेरी ऑंखें अश्रु से भर गई . मेरा जीवन धन्य हो गया ...ये ऐसी जगह है जहाँ पर हम आस्था के साथ जाते है तो कृष्ण जन्म के समय को भी अनुभूत कर सकते है ...हमारा रोम रोम जैसे एक बिजली जैसे कंपित हो जाता है .... यहाँ से आधे घंटे की दूरी पर वृन्दावन है ।पुरी जगह श्री कृष्ण लीला के साथ गूँथ ली गई है ।यहाँ पर गौ चराने वाले ग्वाले की लीला अब तक अमर हो चुकी है .वहां पर अनेक गौशालाएं है . यहाँ पर बूढी गायों का वध नहीं होता ,उन्हें पाला जाता है .मथुरा की बेटियाँ मथुरा में ही हो सके वहां तक ब्याही जाती है ...

वृंदावन है मंदिरों की नगरी ।अगर आप सप्ताह भर भी रुके तो मन न भरे .गाईड ने हमें मुख्य मन्दिर ही दिखाए ...

रुगनाथका मन्दिर ॥आगे बड़ा सा आँगन और विशाल कमाने ..अन्दर दाखिल होते ही कृष्ण भक्त मीरा बाई की मूर्ति जो डोल रही थी उसका सुंदर पुतला ।पीछे रेकॉर्ड बज रही थी "मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई ..."

एक बेहद खूबसूरत जगह ।मीरा बाई के पदों की पंक्ति याद आती रही .जीवन से जिसे वैराग्य हो चला था वो कृष्ण में लीन हो चुकी थी .भक्ति जब दिल की गहरायिओं से जागती है तो मोह माया के सारे आवरण से मुक्ति मिल जाती है .जो प्रभु के शरण में जाता है उसका कोई कुछ बिगाड़ नही सकता .आज कृष्ण और मीरा कहाँ है ????रह गई है उनकी भक्ति की अमर गाथाएं ...

एक के बाद एक मन्दिर देखते चले गए ।हर जगह आराम से बैठ ने को दिल करता था लेकिन वक्त की पाबन्दी थी ...

वृंदावन के रस्ते बिल्कुल कुञ्ज गली कहलाने के लायक ही है ।संकरी गलियों में से होकर गुजरते रहो .यहाँ पर बांसुरी की धुन पर गोपियाँ कैसे दौड़ी होगी ! कैसे रासलीला करते होंगे कृष्ण !!! बस एक कल्पना ही आती रहती है . कहा जाता है अभी भी पूर्णिमा की रात को वृन्दावन के जंगल में कृष्ण का महारास होता है . जो उसे देखने की कोशिश करता है वह जिंदा वापस नहीं आता है ...

रस्ते में एक विधवा आश्रम भी आया । यहाँ निराधार २००० विधवाओं का पालन पोषण किया जाता है . उन्हें प्रातः थोड़ा काम करके पूरे दिन भक्ति में बिताना होता है .यहाँ पर दान भी मिलता रहता है ...

एक और दाउजीका बड़ा मन्दिर है जो भक्त गण के जाने पर खोला जाता है । अब तो २००५ में और भी कई सुंदर मन्दिर बन गए है पर वक्त की पाबन्दी फ़िर बिच में आ गई थी ...

श्री कृष्ण जिसका महात्म्य अब पूरे जगत ने स्वीकार किया है वहां पर जाने पर दोनों बार मैंने देखा अभी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है । सरकार ने इन पुरी जगह के रखरखाव और धार्मिक और सांस्कृतिक गरिमा के हिसाब से कोई ध्यान नहीं दिया है . यहाँ जाने के लिए आस्था ही बड़ा काम करती है पर जगह की दुर्दशा को देख कर मन थोड़ा भारी हो जाता है ....

कल हमारा नव वर्ष है और फ़िर भाई दूज ...अब दो दिन के विराम के बाद मिलना होगा ...

आप सबके लिए आने वाला नव वर्ष हर खुशी लेकर आए ये मंगल कामना करते हुए ...

आप सबको मेरा नूतन वर्षाभिनंदन ......

17 अक्तूबर 2009

दीपावली



दीपावली के पर्व पर हार्दिक शुभकामना


नव वर्ष मंगलमयी रहो .....

16 अक्तूबर 2009

उम्मीदकी नई किरण लेकर आई है दीपावली

उम्मीद की नई किरण लेकर आई है दीपावली ,
तिमिर से तेज तक का नया सफर है दीपावली.....
बुझती हुई जिंदगी में आशा की नई किरण है दीपावली,
जिंदगी में ख़ुशियाँ उजागर करती है दीपावली ......
निराशा से बुझ रहे दीप में आशा का तेल है दीपावली ,
हकीकतों से नए ख्वाबों तक का सफर है दीपावली ......
दुश्मनों से प्यार से गले मिलने का पर्व है दीपावली ,
बिछड़े हुए अपनों से मिलने का अवसर है दीपावली......
सूरज-चाँद -सितारों से भले देदीप्यमान हो साल भर की सब रातें ,
अपने आँगन में दीप बनाकर उन्हें कैद करने की रात है दीपावली ......
पटाखों की शरारतें, रंगोली का रंग भरा अहसास,पकवानों की मिठास है दीपावली,
लक्ष्मी पूजन का सुअवसर है तहे दिल से उसका स्वागत है, आज है दीपावली ....
अपने सारे ग़मों को विदा कर दो इस बहती हुई रात के साथ ,
आज नई उम्मीदों का सूरज लेकर आई रात है ये दीपावली ....

15 अक्तूबर 2009

एक कश्मकश फ़िरसे!!!!!!!!!!!!!!!!

कुछ गुजरे हुए पल समेटकर रख लूँ ,

कोई सरकती रेत के कण को मुठ्ठीमें जकडकर रख लूँ ,

मेरे वो अनमोल पलों को कैद कर लूँ अपने जहनमें ऐसे ,

मुझसे कहीं न बिछड़ जाए कहीं .....

तेरी यादोंसे तो सजे थे जो दिन गुजारे थे हमने तुम बिन ,

आज वो यादें मुझसे बिछड़ ना जाए ये डर लगने लगा है ....

कहीं कोई नया मोड़ आ रहा है जिंदगीका इस राह से परे ,

अनजानी राह पर तुम बिन चलने को डर लगता है .....

फ़िर सोचते है ये तो कोई नया सिलसिला नहीं ,

ये पहली बार नहीं ये आखरी बार भी नहीं .....

बस कोई शख्सियत मेरे वजूद की आदत न बन जाए

ये ही मेरी असमंजस का एक हल लगता है ....

14 अक्तूबर 2009

इस दीवाली

ये मोमबत्ती क्यों ?

तेल के दिए जलाये नहीं ?

माँ ,ये मोमबत्ती खरीदी तो किसीके वहां एक पकवान बनेगा ,

ये दिए का तेल सामनेवाले मजदूर को दिया पुडी बनानेको.........

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ये पटाखोंकी गूंजमें मुझे एक मुस्कानकी आहट सुननी थी ,

मेरी फुलजडी मैंने वो बच्चे को दी तेजमें नहाने को .....

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आज मेरी कामवालीकी नन्ही बेटी और मेरी बेटीने साथ बैठ खाए पकवान ,

उसके दिलमें खुशी थी और मेरे दिलमें सुकून ,हम लाये एक चेहरे पर मुस्कान ....

13 अक्तूबर 2009

साजिश ...

साजिश करते है फूल कभी शाम होते ही

अपनी पंखुडियों में सिमट जाते है ,

कोई गुल सूरजसे शर्माता है

और रात में निखर आता है .....

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जब मिलते है एक अनदेखी दूरियाँ होती है ,

आंखोंमें हरारत होती है और फ़िर भी हया की चिलमन होती है ....

12 अक्तूबर 2009

अनछुए खयालात ....

जश्न बहारोंका

फिजा आई मेहमान बन .....

दो पल रुकी ,

तोहफा दिया मैंने एक हरे पत्ते का .....

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शोर भरे गलियारेमें

खामोशी चलती है अजनबी बनकर ......

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तुम तक पहुँचनेकी चाहत

जकडे कदम जंजीरसे फ़िर भी .....

11 अक्तूबर 2009

एक पैगाम

परिंदे के पर पे लिखा एक पैगाम है ,

वो पंख मेरे महबूबकी अटारी पर गिराना ......

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मोहब्बतकी सलामतीकी दुआ क्यों ?

खुदाकी हयाती पर आज शक क्यों ?

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ऑसकी बूंद नूर लायी ,

तेरे फिराकमें बहे अश्क का ...

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कांचको तराशा एक मूरत बनी ,

ना जाना ये तो पत्थरका सीना लिए है ......

10 अक्तूबर 2009

बदलते मौसम

सांवरीसी सूरत पर उलझकर अटक जाती है एक लट

उस एक तारी जालमें उलजकर कितने मौसम खुशगवार हो जाते है !!!!!!

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राहों पर पथरा रही नज़र ,

तुम्हारे दीदार पर ,

सुलगती तीली दियेकी तरह

अंगुली को चटखा गई ........

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दीवालीका ये तोहफा मुझे दे दो ,

वतन पर जांनिसार करनी है ,

मुस्कान ओढ़कर लबों पर ,

सरहद पर जाने की इजाजत दे दो .....

9 अक्तूबर 2009

जब ......आना

जब खिचडी जले आना ,

जब चावल कोयला भये आना

श्रीमती खन्नासे बात तुम्हारी

अधूरी ना छोड़ आना .....

जब बासी कढ़ी हो फ्रिज में पड़ी और

साथ में हो ये खिचडी जली

हर रोजकी तरह तुम फिर से

मुझे आधा भूखा सुला जाना .....जब खिचडी जले आना

पुरा पका खाना मुझे पचता नहीं ,

आधा कच्चा पका खानेकी आदत है ,

जब मइके जाओ तुम मुझको

ना साथ ले जाना ........जब खिचडी जले आना

डॉक्टर भी मुझे चिढाते है ,

हाजमे का राज बताने को ,

क्या मैं कहूँ किस्मत मेरी

तुम भी ना लिखा आना .....जब खिचडी जले आना .....

( फ़िल्म चित्तचोर के जब दीप जले आना ...के राग पर ये कविता गा सकते है ....)

दीवाली दहलीज पर है ....


दीवाली का महापर्व दहलीज पर खड़ा है और हमारे घरकी किवाड़ पर दस्तक दे रहा है तब ....


तब हम महिलाएं घर की साफ़ सफाईमें झूट गई है ...पता है कितनी ही यादे फ़िरसे उभर रही है ...कोनेमें पड़े सामानको सहेजते वक्त कितनी चीजें निकलती है जिसकी खास याद जुड़ी होती है ...आज बॉक्स पलंग साफ़ करते वक्त कुछ तस्वीरोंके एल्बम निकले ...मेरी बेटी के पुराने कुछ खिलौने टूटे फूटे निकले ...मेरी कुछ कोलेजकी डायरी भी निकली ..जिसके पिछले पन्नो पर लिखे कुछ पुराने फिल्मी गाने थे और कुछ ख़ुद की लिखी बिल्कुल शुरुआती दौर की शायरियाँ निकली ..कुछ निक्कमे कपडे भी ....कितने चाव से ख़रीदे थे उस वक्त ...कितने खुश होकर पहने थे ...कितनी तारीफें बटोरी थी ...उसमें पड़ा वो छेद जो रिक्शासे उतरते वक्त पड़ा था ...उसे रफू करवाया था ...ये खिलौना उसे लेने के लिए बेटी कितनी रूठ गई थी ...अब ये ऐसे ही पड़ा है ...फ़िर भी कुछ चीजें मैं फ़िर से रख देती हूँ जिनसे जुदाई मैं बर्दाश्त नहीं कर पाती ...शादी के वक्त की साड़ीमें बहुत छेद बन गए है ...फ़िर भी ये अनमोल है ...पतिदेव का शादी के वक्त का सूट जो अभी उन्हें बहुत छोटा पड़ने लगा है ...पर बेशकीमती है मेरे लिए ....


जब ये सब नया था तबकी सारी यादों का सैलाब साथ साथ चल रहा था ...शायद ये एक पर्व होता है जब पुराने रिश्तों से पुराने कपड़े ,चीजों तक की यादों से हम सब वाबस्ता होते है ....पुरानी टूटी चीजें कबाडी के हवाले की जाती है ..नई चीजें अपनी जगह बना लेती है ....बस जीवन का ये ही तो चक्कर होता है ....


अगर जीवन को सरलतासे जीना होतो पुरानी चीजोंको जो शायद अब काम ना आएगी उसे दूर करनी पड़ती है ...किसीके लिए कड़वाहट हो उसे भी कचरा पेटी के हवाले कर देते है तो मन भी मकान की तरह साफ़ सुथरा बन जाएगा और दीवाली की रोशनी मन को भी जगमगा देगी ...बस मन और मकानकी सफाई के बाद रौशनी से जगमगा देंगे इस छोटे से मकान को जिसे हम "घर " कहते है .....


चलो सब मिलकर इस महापर्व का इंतज़ार करते है जो कुछ ही कदम पर आने के लिए दस्तक दे रहा है .....

8 अक्तूबर 2009

चाँद और मैं ....


कल सपने तैर रहे थे मेरी बंद होती पलकों पर रातमें ,

खिड़कीसे चौथ का चाँद झांक रहा था ....

मुस्कराहटका कोई न कोई राज तो होगा ही ,

पूछा नहीं क्योंकि तैरते सपने बह जाने का डर था ,

गर जबां खुल जाती पल भर के लिए भी .....

चाँदसे बातें की है कभी आपने भी ?

रातकी तनहाई बांटते हुए सितारोंसे ,

वो कभी कभी अकेला ही रह जाता है ,

बादलकी चुनरमें छुपकर चुपके सो रो जाता है ......

कल रात ऐसी ही ठंडक थी समांमें एक बार फ़िर से ,

तैरते सपनों की तादाद बढ़ गई और वह बहने लगे फिजामें ,

चाँदके पास एक सपना पहुँच गया और चाँद हंस पड़ा ......

7 अक्तूबर 2009

बेघरको आशियाने की है तलाश

किसीकी अमानत को बरसों तक सहेज रखा है ,

अपनी जानसे ज्यादा संभालकर रखना है ,

कल बेदखल कर दिया गया अपने ही घर से ,

ठिकाना न रहा जब अपना अब अमानतके लिए ठिकाना ढूँढना है ?

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तुम्हारे दिल में घर बनाना है मुझे

पर उसमे तो बड़ी भीड़ लगी रही है ...

एक जर्रे भर की जगह की तलाश है मुझे

साँस भरनेके लिए एक खिड़की खोल देनी है ....

6 अक्तूबर 2009

इल्तजा

चलो रोक लो आज बहते वक्त को ,

रोक लो ये भागती जिंदगी को ,

रोक लो ये हांफती साँसों को ,

बस थोड़ा सुस्ताकर फ़िर चलते है .....

ये तेल जो कम हो रहा है दिए का ,

उसमे फ़िर थोड़ा सा तेल डालो खुशी का ,

आज वो दिली मुस्कराहट छुपायी है ,

अलमारीके चाबी वाले लोकरमें निकाल लो ,

आज तुम्हे जो भी मिले उसे बाँट लो वो हँसी ,

देखो दीवाली के आने से पहले

आलम खुशगवार कर दोगे ......

ये इल्तजा है मेरी ,

क्या आप उसे पुरा कर दोगे ??

5 अक्तूबर 2009

बिखरना है मुझे एक बार फ़िर


आँख बंद की तेरे दीदार को ,

छूकर निकल गया वह भी तनहा छोड़ ....

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शब्द बांधे कुछ

तुम तो सब अल्फाज़से परे नजर आए ....

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धड़कन बनाकर रखा

दिल बस तुम्हे सुनता रहा ....

मेरी सदायें भूल गया ....

4 अक्तूबर 2009

ये दूरियां

कभी कुछ रंग बादलसे चुराए थे ,

नयनकी बारिशने धो ही दिए ....

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तुम्हे जाना न मैंने कभी जब नजदीक थे ,

बस दूर क्या गए तुम तुम्हारे सिवा अब कोई नहीं .....

3 अक्तूबर 2009

इंतज़ार कब तलक

कहीं न कहीं कोई ना कोई तो होगा

जिसे मेरा भी इंतज़ार होगा ....

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कोई फूल होगा खुशबू बिखेरता हुआ दूरकी वादियोंमें

उसे भी उसकी खुशबू किसीके पास पहुंचाने का इंतज़ार होगा ....

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वो देखो एक अभिसारिका कैसे राह पर नजरें बिछा रही है !!!

उसे भी इस दीवाली पर अपने फौजी सैंया का इंतज़ार होगा ...

2 अक्तूबर 2009

हैप्पी बर्थडे टू गांधीजी ...

खाली कमरेकी दीवार पर लगी है

हंसती हुई गांधीजी की तस्वीर ....

सारे खिड़की दरवाजे और बिजलीकी रोशनी बंद करके

आज एक सच गांधीजीके सन्मुख बोलना है ........

मुझे हर वो जूठ का पता है

जो मैंने जान बुझ कर बोले है ...

मैं सिर्फ़ अपने बारेमें ही सोचता हूँ

चाहे मेरे कामसे औरोंको परेशानी से गुजरना पड़े ....

मुझे अपने वजूद को टिकाना है किसी भी हाल में

चाहे इसके लिए कितनों की जान लेनी पड़े ...

मुझे सिर्फ़ अपना पेट भरना है

चाहे इसके लिए कितनों की रोटी छीन लेनी पड़े .....

मेरा वक्त कीमती है इस छोर से उस छोर तक पदयात्रा नहीं कर सकता ,

चाहे इसके लिए मुझे सिर्फ़ चार्टर्ड प्लेनमें ही उड़ना पड़े .....

मुझे हमेशा आपकी हसती हुई तस्वीर ही लुभाती है

जो सिर्फ़ हरे हरे नोटों के कागज़ पर नज़र आती है ....

बत्ती जलाकर देखा तो आपकी तस्वीर ही गूम हो गई है

तभी आपकी आवाज हवामें गूंजती है ....

कहते है पाँच पैग पेट में डालते आदमी सच बोलने लगता है ,

इसी लिए आज सच सुनने के लिए मैं शराबखाने में बैठ गया हूँ ............