30 अगस्त 2009

अलविदा

अय दोस्त जा रहे हो ???

हमें अकेला छोड़कर ??? अपनी यादों के हसीं पलों के साथ बंधकर .....

देखो इस घरका हर कोना घूम फ़िर ध्यानसे देख लेना ...

कहीं कुछ छुट नहीं गया है ना ???

अपनी हर चीज़ संभालकर करीनेसे रख देना

कहीं रस्तेमें ,टूट ना जाए ,गूम न जाए .....

इस घर के खिड़की दरवाजे ठीक से बंद कर दो ,

अब कोई और इसमें रहने आ जाएगा .....

खाली घर की कैमरे से तस्वीर उतार लो ,

ये वह पहली पायदान है जहाँ से तुमने ऊपर जाना शुरू किया है ....

ताला ठीक से लगाना ,चाबी दे देना मालिक को ,

और ये पलक पर आंसू जो आ गया है उसे ताले के छेद में पिरोना ...

कल आकर मैं इस बंद दरवाजे को देखूंगा और ताले को चूम लूँगा .....

देखो तुम्हारे बटुवे में एक खाली कोना है न ???

मैं उसमे याद बनकर बैठा हूँ ...

ये अब तुम पर निर्भर है की जब बटुवा नया लोगे

तब मुझे अब पुराने बटुवे के साथ फेंक दोगे ?

या फ़िर नए बटुवे में भी कैद रखोगे ????

29 अगस्त 2009

मैं वजह ढूँढता रहा ...

दिल जल रहा है ,

धुएं को निगल रहे है ,

ताकि ,

उन्हें पता ना चले हम राख हो गए .....

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तुम्हारी बेवफाई की लो जीत हो गई ,

लो फ़िर उसकी वेदी पर के और वफ़ा कुर्बान हो गई ....

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प्यार करने की कोई वजह होती नहीं पर फ़िर भी ये कर लिया ,

लो वो हमें अकेले छोड़कर चल दिए ,और मैं वजह ढूँढता रहा ....

28 अगस्त 2009

प्लीज़ वोट फॉर मी

इस ब्लॉग को इंडी ब्लॉगर .इन पर इस माह के ब्लॉगर ऑफ़ धः मंथ के लिए नोमिनेट किया गया है ...जहाँ पर मेरी लघुकथा को आप वोट कर सकते है ...

वोटिंग के लिए सिर्फ़ दो दिन बचे है ......


http://www.indiblogger.in/nominations.php?id=4

असमंजस

आज दिल असमंजस में है तुम्हे चाहू या न चाहू ?

तुम्हे अपना मानु या ना मानु

दिल कहता है तुम पर इख्तियार कर लूँ ...

तुम मुझे चाहो या ना हो मैंने तुम्हे चाहकर देख लूँ ......

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मेरे हाथमें तुम्हारा हाथ होगा तो बेहतर होगा ,

ये दूरियां नजदीकी में तब्दील हो जाए तो बेहतर होगा

तुमसे बात चाहे न हो पाए बस नजर ही मिल जाए तो बेहतर होगा ,

हर सुबह तुम्हारे दीदार चाहे न हो तुम रात को ख्वाबमें आते रहो बेहतर होगा .........

27 अगस्त 2009

एक डॉक्टर की प्रेमकहानी .....

इस जोक के लिए मैं सभी डॉक्टर से क्षमाप्रार्थी हूँ ...लेकिन फ़िर भी ...

बेचारे डॉक्टरों की भी क्या जिंदगी होती है ????
आधी जवानी तो पढने में ही पुरी हो जाती है .....अब उनकी प्रेम कहानी कैसी हो सकती है ?????
पढो ये नमूना :

मैं बारहवी कक्षामें था ,वो भी बारहवीमें ही थी ...
मैं एम् बी बी एस में गया ,वो बी एस सी में गई ....
मैं एम् बी बी एस में था , वो एम् एस सी में गई ....
मैं एम् बी बी एस में था , वो पी एच डी हो गई .....
आगे सुनो ....
मैं एम् बी बी एस में था , वो डॉक्टर बन गई .....
मैं पी जी एंट्रेंस दे रहा था , वो दो बच्चोकी माँ बन गई ....
मैं एम् डी कर रहा था ,उसके बच्चे दसवी पास हो गए ....
मैंने हॉस्पिटल शुरू किया , चलो मैं खुश हूँ .....
मगर अफ़सोस उसने परिवार नियोजन अपनाया
और अब मेरी सगाई हो रही है ..........

26 अगस्त 2009

आज का एस एम् एस

He + She = Love

He + She + Love = Marriage

He + She + Love + Marriage = child

He + She + Love + Marriage + child = Family

He + She + Love + Marriage + Child + Family = Problem

इसी लिए तो कहते है :

गो ईस्ट और वेस्ट ,

कुंवारा इस ध बेस्ट .......

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यार , ओनली इन अवर इंडिया :

आम मिला की चुसना शुरू ,

पान मिला की थूकना शुरू ,

लड़की मिली की मटकना शुरू ,

और ........

एस एम् एस मिला की फोरवर्ड करना शुरू .....

तो गुरु !!!! देख क्या रहे हो ...

हो जाओ शुरू ........

25 अगस्त 2009

कभी कभी .....

कभी कभी ऐसा भी होता है की मन बेवजह खुश होता है ,

कभी कभी ऐसा भी होता है मन बिना मतलब दुखी होता है ....

कभी कभी बेतुकेसे ख्याल आ जाते है बेवजह मनमे ,

कभी कभी बेमतलबसा जीना भी अच्छा लगता है ......

कभी कभी टहलने निकल जाते है यूँही दूर तक ,

कभी कभी बेसुरा गाना भी अच्छा लगता है ....

कभी कभी मंजिलके पास होने पर भी उससे दूर रहने को दिल करता है ....

कभी कभी मंजिलको पाने की ख्वाहिशमें जानिस्सार करने को दिल करता है ...

कभी कभी आपको ये समज आ जाए

की ये तो आपके साथ भी अक्सर होता है ,

तो फ़िर यारों गम किस बात का बस सोचो यही ,

बहुत कुछ बाकी है जिंदगी में ये बेमतलब नहीं हुई अभी ,

अभी भी गुन्जायिश बाकी है इसमे क्योंकि प्यार कभी भी हो सकता है .....

24 अगस्त 2009

बस इतनी सी इल्तजा है ....

धूएँ धूएँ सी उठी है बेतरतीबसी लकीरें कुछ ,

इस शहरकी अटपटी गलियोंसे ....

झख्म हर रोज एक नया हरा होने को मिल जाता है ,

नया साज़ लेकर भरे हुए नासुरोंको छेड़ जाता है ......

बेरंग लग रही है मुझे ये खिड़कियाँ ,

ये दरवाजें ये दीवारें बदरंग

इस किराए के मकानकी

जहाँ हरदम खौफसी सन्नाटेकी गूंज सुनाई देती है ..........

क्यों ?

क्यों कोस रहे हो इस शहर को ?

इस मकानको ,इस गली को दे रहे हो गाली ?

जिसे कभी एक पल के लिए भी तुमने अपना माना ही नहीं ....

अनसुनी कर दी है हर वो सदा

जिसे अनजानोंने दी थी तुम्हे अपना समज कर ....

उनकी सदा जिन्होंने दिल खोल कर एक गैर को अपना जिगर माना ,

पर तुने बेमुरव्वत सिर्फ़ अपने शहर को ही अपना माना ....

कई बेकसूरोंको तुने तुझसे प्यार करने की सजा दी है

उनका कसूर सिर्फ़ इतना था की तुझे उन्होंने पनाह दी है .......

जा ......चला जा वहीं ....

लौट जा वहीं जहाँ से तू आया था ....

और कसम है तुझे जो कभी भूलेसे हमें याद भी किया ,

और हमारे प्यारको भरे बाज़ार तुने ज़लील किया ........

23 अगस्त 2009

गणपति बाप्पा मोरिया ...




वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येशु सर्वदा ॥


हे रिध्धि सिध्धि के स्वामी ,

आपको हर भक्तका कोटि कोटि वंदन ...

हमारे राहमें आए विघ्नको हरें, हम पर आपकी कृपा सदा सर्वदा बनी रहें ....

गणपति बाप्पा मोरिया ,

पुढच्या वर्षी लवकरिया ..

22 अगस्त 2009

माफीनामा

आज तुझे भूल जानेकी चाहता हूँ इजाजत ,

इस रईसीमें हो जैसे गुरबतकी हिमायत ...

गुलदान सजा लूँ तेरी यादोंके गुलोंसे बस थोडी सी है जहेमत ,

अब तो सायेसे भी अपने हो गई है खिलाफत ....

इश्कमें कैसे तेरे हो सकू कैसे कुरबां ?अब ये चाहता नसीहत ....

कह दे मुझे अय मेरे खुदा कैसे करूँ तेरी इबादत ?

माफ़ कर देना मुझे क्योंकी अब इश्क बन गया है मेरी इबादत .......

21 अगस्त 2009

सिर्फ़ तुम ही ....

कहकहोंमें न सुन पाए कभी मेरे दर्दकी सदा ,

हमारे हँसते लबोंकी कहानीमें छुपी थी दर्दकी कराह भी ,

एक चिलमन रही हमेशा मलमलकी दरम्यां हमारे ,

एक हमदर्दीकी फूंकसे हटा ना पाए तुम उसे .........

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सिसकियाँ सुन पाए आज बुझी हुई अंगीठीकी ,

गुमसुम लकडियाँभी थी जल जाने के इंतज़ारमें ,

धान पड़ा है पानीके संग उबलकर खिल जाने को भी ,

पर दहलीज पर खड़ी है अभिसारिका किसीके इंतज़ारमें ..........

20 अगस्त 2009

कांच का घर ......

तुम ना आए थे जब मेरी जिंदगीमें

कितना सुकून था इसकी सतह पर तैरता हुआ ....

तुम बारिशके पानी की तरह इसकी मिटटीमें कुछ घुले ऐसे

और जर्रे जर्रेमेंसे गुजर पतली दरारोंसे मुझमें समाते गए .....

सतह पिघलती रही तुम्हारे धारोंकी तपीशसे

और पिघलने लगी में मोम बनकर बह चली

किस ओर बह चलूं यहांसे ??

अब ये तुम ही मुझे बताते जाओ ......

जहाँ मिली थी कहीं ढलान बह चली थी

जाना था कहाँ वो नाम पता भी भूल गई थी

हर मंज़र पर ये खुबसूरत भ्रम था मेरे संग संग चला

और मैं खुशबूकी खोजमें कांचकी दीवारोंसे टकराती रही ...........

देखो ये कांच का घर मेरा ...!!!!

दीवारें रंगी हुई है मेरे एहसासोंके रंगोंसे

और आख़िरकार इस मकानको देखो ...

अब मेरे घरकी सूरत मिल गई .....

19 अगस्त 2009

कभी ऐसे भी जिया करो .....

कसमसाने दो इस जिंदगी को अभी ,

दो पाटोंके बीच पीस जाने दो ...

घुटन सीनेमें होने दो और दिलकी लौ को जलने दो ,

बरबस हो जाने दो ,मजबूर हो जाने दो ......

अफ़सानोंसे भर जाते है सफे उसके

फ़िर भी हर अफ़साने अधूरेसे लगते है ...

टूटे टूटे से लगते है सारे किस्से

जबरन जुड़े हो जैसे ऐसे आभासी लगते है .......

साँस कुछ टूटी टूटी सी लिया करो

दो साँस के बीच एक पूरा का पूरा आसमान है ,

जिंदगीको पनपने की जगह शेष वहां ही है ,

दो किस्सोंके बीच पुलके नीचे जो दरिया बनकर बहती रही है ....

18 अगस्त 2009

दही मक्खन

एक दूधभरे गिलासकी तरह है जिंदगी ,

कभी खटासका छींटा पड़ जाने से फट जाती है

ये पानी और गठ्ठेसी अलग हो जाती है ....

एक छोटेसे चम्मचभर जामन मिला लो ,

लिपट जाता है जर्रा जर्रा दहीं बनकर

और देखो कैसे जम जाती है जिंदगी !!!

मीठी रगोंको उसकी फीकी खटास जच जाती है ......

पानीकी धारोंके संग मथने लगती है जब

मक्खन को जनम दे जाती है ,

आग पर उबलकर घृत के चोलेमें

रेशमसा स्निग्ध रूप धर जाती है जिंदगी .......

जिंदगीसे खेलते रहे हम यूँ हर लम्हे ,

एक सीधीसे जिंदगीको बस यूँही छेड़ते रहे हम .............

17 अगस्त 2009

नाखुदा ....

हम इंसान है ये हम भूल गये थे ,

हर खता तुमसे हुई हम माफ़ करे चले थे ,

अब ये गम तेरे प्यारमें पल रहा ,

ना मैं इंसान रह चला ना खुदा बन सका ...

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कश्ती साहिल पर इंतज़ार कर रही थी नाखुदा का ,

हवा के तेज झोंकेने सदा सुनी उसकी ,

और फ़िर क्या हुआ ...!!!!

लहरों पर बहाकर उसे नए सरजमींके सैर पर ले चला ....

16 अगस्त 2009

तन्हाई के आलममें .....

मुझे तनहा छोड़ दो आज ,

मुझे कोई सवाल ना करो कोई ,

जिंदगी के किस मकाम पर खड़ा हूँ ?

कौन दिशा जाना था ? कहाँ आकर थमा हूँ ?

ये जरा सोचने की इजाजत दे दो ,

मुझे बस कुछ पल की तन्हाई दे दो .........

मैंने एक जिंदगी चाही थी अपने लिए ,

जी न पाया कभी ये अपने लिए ,

तुमसे तो क्या गिला शिकवा कर सकू हूँ ?

मुझे अपने आपसे ये शिकायत करने दो आज ..........

एक कांचकी दीवार का घर हो ,

मैं तुम्हे देखूं तुम मुझे देख सको ,

बस कुछ और महसूस ना हो मुझे ,

न तुम्हारे आने पर खुशबू बिखरे ,

न दिल धडके ,न नजर ही मिले ,

बस एक दिन फुरकत का दे दो ..........

कल और निखरकर आऊंगा ,

नए ख्वाब सजा दूंगा ,

थोड़ा सा हस लूँगा ,थोड़ा सा गुनगुनाऊंगा ,

बस आज ये कुछ पल खामोशी के हवाले कर दो .......

15 अगस्त 2009

जयहिंद ........




एक बासठ साल का जवान है मेरा भारत ...

देशके हर कोनेसे मोबाइलसे जुडा हुआ है मेरा भारत ....

चाँद पर झंडा फहरा चूका है मेरा भारत ....

ओलम्पिकमें मैडल लेकर आया है मेरा भारत ....



बिजली से अब रोशन हो चूका है मेरा भारत ...

खेतोंकी हरियालीमें खुशियोंको लहराता हुआ मेरा भारत ...

कल पुर्जोंकी दुनियामें नयी ताकत बनकर उभरा मेरा भारत ...

विदेशोंकी कम्पनीको खरीद रहा है आज मेरा भारत ....



क्रिकेटकी पूजा करता और बोक्सिंग भी करता मेरा भारत ...

सायनाको दुलारता और सानिया को भी पुचकारता मेरा भारत ...

शिक्षासे विभूषित हो रहा है मेरे देश का हर कौना,

फिर भी भाषा -जाती -धर्म के नाम पर झगड़ता हुआ मेरा भारत .....

भ्रष्टाचारसे परेशां है और आतंकवादसे जूझ रहा है मेरा भारत ....

कोखमें मर रही है जो बच्ची जन्म पाने का हक़ है खो रही ,

उसके आंसूको ना समजता वो भी है मेरा ही भारत ........

फिर भी मुझको लगता सबसे प्यारा मेरा भारत ........



मैं खुशकिस्मत हूँ की भारत के हर प्रान्त के बाशिंदों के बीच मेरी परवरिश हुई है इसी लिए मैं गुजराती से अच्छी हिंदी बोल सकती हूँ ...और अंग्रेजी ठीक से बोल नहीं पाती उसके लिए शर्मिंदा नहीं हूँ ....

14 अगस्त 2009

बांसुरी ...!!!




मुझे एक बार बांसुरी बन जाना है .....

बांसके खोखले भीतर को सूरोंसे भर जाना है ....

अपने जिस्मको छेदकर अपनी हयातको सुरमई बनाना है ......



आज मुझे बांसुरी बन जाना है .....

कान्हा तेरे होठोंसे लगकर तेरे ही गीत बनकर बह जाना है ....

राधाको रिझाना है ,गोपियोंको खिजाना है ....

दूर चली गयी है वो गौ सब उसे वापस बुलाना है ....



आज मुझे बांसुरी बनकर ही रहने दो ....

सारी कायनात को सूरोंसे भर लेने दो ....

रासलीलामें फिर मगन हो जाने दो ...

मीराके कटोरेसे विषपान कर लेने दो .....

अर्जुन के सारथि बन जीवन युध्ध जितने दो ....



लो अब मैं बांसुरी ही बन गयी ....

राधासे बिरह हुआ ,मीरा भी दीवानी हो गयी ...

बाललीलासे महाभारत तक ........

हर लोग कान्हा तुजसे मिलते रहे बिछड़ते रहे .....

एक मैं ही तो हूँ जो तेरे संग ही रही ..........

जय श्री कृष्ण

तेरी बांसूरीके सूरमें कैद है ये बाला,
आज उसे ये कैदसे छुडाने फिर मथुराकी कैदमें आजा,
रुठी यशोदा बेताब है तुम्हे लोरी सुनाने ,
झूठी डांट लगाने,घर घरमें फिर मक्खन चुराने आजा.....
गोपियोंकी मक्खनभरी मटकियां राह तके तेरी,
उसे कंकरी मारके तोडने फिर आजा......
प्रेमदिवानी एक मीराके हाथमें है विषप्याला,
उसे जीवनदानका वरदान देने आजा............
द्रौपदी पुकारे कौरवोंकी सभामें तुम्हें आज भी,
उसके चीर पूरने फिर आज आजा.....
इस कलिकालमें अर्जुन निराश होकर बैठ गया संग्राम छोडकर,
फिर उसे श्रीमद भागवत गीताका गान सुनाने आजा......
राधाका प्यार बिसरा न सके हम कभी ,
उस दास्तांको अमरत्व देने आज एक बार फिर धरती पर आजा............

13 अगस्त 2009

खामोश रहो

जब कुछ समज ना आए ,खामोश रहो ,

बहुत गुस्सा आ जाए ,खामोश रहो ,

जब भीड़ बोल रही हो ,खामोश रहो ,

जब खूब खुश हो ,खामोश रहो ...........

जब दिल डूबा सा लगे ,खामोश रहो ,

जब प्यार हो जाए, खामोश रहो ,

जब दिल टूट जाए ,खामोश रहो ,

प्यार के इजहारमें या फ़िर इनकारमें खामोश रहो ......

क्योंकि खामोशी की जुबान बहुत बोलती है ,

बिन बोले सारे राज खोलती है ,

समज सको तो समज लो क्या कहती है ,

अगर समज ना सको तो भी खामोश रहो ...........

12 अगस्त 2009

बाकी है कुछ ....

डायरीके पन्नेमें सूखे गुलाबकी पत्तियां देख लो ,

देखो अभी उसमें भी खुशबू बाकी है ....

सूखे पत्ते लेकर सहला लो हथेलीमें घडी दो घडी ,

पिछले बसंतकी बहारकी नमीं अभी बाकी है ......

भूल गए आप मुझे ये कहकर शिकवा ना किया करो ,

यादोंके मंज़रको टटोलकर देख लो ,

कभी लिखा होगा मेरा नाम उस पर भी तुमने

स्याही शायद फ़ैल गयी है पाती पर

बिखरे है अल्फाज़ भी पर मेरे नाम का निशाँ बाकी है ........

क्यों और कैसे कह गए तुम ?

की कोरे ही कोरे रह गए हो तुम ?

अभी तो इब्तदा हुई है हमारे प्यारकी

जुदाई के इन लम्होंमें हमारा प्यार और परवान चढ़ना बाकी है ...........

11 अगस्त 2009

क्यों ??

जानती हूँ न आओगे कभी मुड़कर मुझे मिलने ,

फ़िर भी ना जाने क्यों पयगाम भेजती रही मिलने का ???

जवाब ना आएगा भूलेसे कभी तुम्हारा ,इंतज़ार उम्रभर का होगा ,

क्यों फ़िर भी हर रोज एक उम्मीदमें जीकर पाती भेजती हूँ ???

न शिकवा कर सकते है तुमसे ,ना वफ़ाकी कोई आस है अब ,

बस हरदम तुम्हारा ख़याल ही हमारे आस पास है .......

10 अगस्त 2009

सड़क

कभी कभी मेरे दिलमें ख़याल आता है ,

ये सड़क जिंदगीसे भी लम्बी होती होगी कभी ....

हम आधी सड़क पर जुड़ते है एक हुजूम के साथ ,

चलते है उसकी राहों पर यूँही कुछ सपने संजो कर ,

रुकते ,थकते ,सुस्ताकर चलता तो रहना है हमें ,

टेढी राहों पर संग संग किसीके हमसफ़र बनकर .....

ये साँसों की डोर छोड़ती है जब साथ ,

सफर रुकता है हमारा वहीं पर उसी पल ,

पर ये तो सड़क है ,अभी थमी नहीं ,रुकी नहीं ,

बस उसे तो चलते रहना है उम्र से भी आगे ही आगे ......

9 अगस्त 2009

डर र र र र र र ..........

डर ..........!!!!
ये अनुभूति सर्वस्वीकृतिसे एक नकारात्मक अनुभूति ही कही जा सकेगी ..बस आज ये डर पर डरते डरते कुछ लिखने को दिल कर रहा है ......
मिलने पर बिछड़ने का डर , एक्जाममें फ़ैल हो जाने का डर , बारिशके कीचड़में कपड़े गंदे होने का डर , किसीसे मिलने का डर , दोस्ती टूट जाने का डर ,हमारी धन सम्पति कम हो जाने का डर ...एक लम्बी लिस्ट तैयार कर लेते है ...कई चीजें इसमें बिल्कुल कोमन मिलेगी हर व्यक्तिकी लिस्ट में ...
अब ये सोचते है की जिस बातका हमें डर था उसमेंसे कितनी बात है जो सच साबित हुई है ??? लगभग इस का जवाब भी कोमन होगा की लगभग ८० प्रतिशत सच साबित नहीं हुई है .....फ़िर हम ये काल्पनिक डरसे पीड़ित क्यों है ????
ये एक हकीकत है की जब हम डर के जज्बातसे गुजर रहे होते है तब उस पल में जो खुशी मिलती है उसे भी पूरी तरहसे समेत नहीं पाते है ...फ़िर भी डर हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है इसे हम झुठला नहीं सकते ।

मेरे विचारसे हमें जीने का एक मकसद चाहिए होता है ...और दूसरा हमें हर वक्त किसी का साथ भी चाहिए होता है ...डरते है हम ख़ुद के अकेलेपन से ही ....हम समाजकी स्वीकृति हर हाल में चाहते है हमारे हर कार्य में ...इसी लिए हमारा मन कभी कोई ऐसी बात करना चाहे जो समाज के लिहाज से ठीक ना हो तो हम ये डर से नहीं करते की कोई देखेगा तो क्या कहेगा ????मसलन हमें कभी घरमें जोर जोर से गाना गाने का मन करता है ....या फ़िर एक अनजान व्यक्तिसे दो पल हंसकर बात करने को दिल करता है ...चुपचाप अपने प्रेमी या प्रेमिका को मिलने का दिल करता है ... हम भले ये सोचते है की हर व्यक्ति हमें देख रहा है ....पर किसीको हमारे उस कार्य को देखने की फुर्सत नहीं होती और हम उस खुशीसे वंचित रह जाते है ....

लेकिन आज का मेरा विचार है अकेलेपन का डर ....हम घरमें ,ऑफिस में ,स्कुल में ,किसी अनजान रह पर ,अजनबी शहरमें अकेले होने पर क्यों डरते है ? क्योंकि अकेलेपनमें मानसिक तौर पर भी हम अकेले होते है ..तब बिना आयने को देखे हमारे ख़ुद की शख्शियत हमारे सामने उभर आती है ...और मैं दावे के साथ कहती हूँ की प्रेमीजनोंको छोडे तो उसमे हमारी गलतियाँ , हमारे जीवन के बुरे पल , दुःख , सारी नकारात्मक बातें एक फ़िल्म की तरह हमारे सामने होती है ...हमने किसीको ठगा हो तो वो चीज़ उसे भले पता न हो पर हमें जरूर याद रह जाती है ...क्योंकि उस वक्त हम और हमारी अंतरात्मा आमने सामने आ जाते है .....हमारी आत्मा हमें हमेशा ग़लत करनेसे रोकती है ...हमारी गलतियाँ बताती है ...और हम इसी पल से डरते है ...और इसे घर बना लेने देते है ...क्यों हम ऐसा करते है ???ये ही तो वक्त होता है जब हम अपने किए पर शर्मिंदा महसूस हो सकते है ...हमारी गलती सुधार कर एक अच्छे इंसान बन सकते है ....समाज नहीं सुधरता पर अगर एक एक करके इसी तरह इंसान अपनी बुराई से उबरता रहे तो अपने आप पुरा समाज सुधर सकता है .....
अपने अकेलेपन से दोस्ती कर लीजिये ..सच बहुत ही मजा आएगा जीने का ....मैं ऐसा करती हूँ ...मुझे अकेलेमें रहना अच्छा लगता है ....अपने जीवन के सारे सुखद पल याद करके खुश हो जाती हूँ ...पुराने गाने बेसुरे आवाज में खुल कर गा लेती हूँ .....कभी अकेले ही सड़क पर साइकिल लेकर निकल जाओ ...जहन में प्यारा गाना गुनगुनाओ ...एक प्यारे से बच्चे से हँसते हुए बात कर लो ....या फ़िर घरके विडियो पर बिल्कुल अकेले ही एक भुत प्रेत की फ़िल्म देखो ...सचमुच इतना मज़ा आएगा .........और फ़िर ये काल्पनिक डर से आप दूर होने लगोगे ...क्योंकि ऐसे डर से उबरने के आसान रस्ते भी आपको इसी तन्हाई में नजर आने लगेंगे ......

ये पोस्ट आपको पसंद नहीं आई तो ????फ़िर एक डर ......हा ....हा ....हा ....हा ....हा .......

8 अगस्त 2009

सिर्फ़ तुम ....!!!

तेरे साथ जीना नहीं ये तय कर लिया ,

लो हमने तुम्हारा शहर भी छोड़ दिया ,

दूर तेरे शहरसे जाकर एक नया घर बना लिया ,

हाथ हम भी किसी और का थाम ले ये दिल हुआ ,

पर ये हो न सका ,

पर ये हो ना सका क्योंकि

दूर तो गया हमारा जिस्म ,दूर बसा हमारा जिस्म ,

पर हमारी रूह तो तुम्हारे पास रह गई ,

तुमने तो भुला दिया हमें इस कदर पर

फ़िर भी तुम्हे ख्वाबमें मिलने की आस रह गई .....

तुम्हारी बेवफाई पर कसीदे पढने भी चाहे ,

कागज़ दवात तैयार भी कर लिए ,

पर हम लिख न पाए ,

पर हम ये लिख ना पाए कलमसे ...

क्योंकि हमसे बेवफाई हो न सकी ........

7 अगस्त 2009

खयालों के बारे में एक ख़याल

जब ख़याल कुछ पक जाते है ,

कुछ खुशबू छोड़ने लगते है ,

इजाजत चाहते है किसीके नजर होने की ,

किसीकी ख्वाहिशमें पलने की जुत्सजू चाहते है .........

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जिसकी जुत्सजू करते रहे थे हम खयालोंमें

उनके दीदार पर दिल संभल न पाया हमारा ,

इजहार करने का मौका तो पा लिया था फ़िर भी ,

खामोश लबों से अफसाना बयां न हो पाया ......

6 अगस्त 2009

मर्यादा मेरी

शायद बेवजह किसी ख्यालमें गुम रहने की आदत है हमें ,

और अक्सर हमारे ख्यालोंमें आ जाने की आदत है उन्हें .......

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एक मेरे अदद वाचक है जो मेरे शुभचिन्तक भी है ...वे मुझे बड़े ही प्यार से एक सुधार लाना चाहते है मेरी लिखावटमें .....उनकी बातों से मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ ...पर कहते है की हर व्यक्तिकी एक मर्यादा या कमी होती है ...बस ऐसा ही कुछ होता है जब मैं लिखने बैठती हूँ .....मुझे अल्फाज़ जैसे मेरे जहन पर लिखे नजर आते है ...मैं उन्हें फ़ौरन शब्दोंमें कलमके द्वारा बाँध लेती हूँ ....उसमे जितनी शक्य बन पड़ती है उतना सुधार भी कर लेती हूँ ..और उसे मेरे ब्लॉग पर रख देती हूँ ...

आपके आगे निसंकोच कहती हूँ की अगर उस वक्त उस ख्यालको अगर शब्द का जामा नहीं पहना पाती तो वो शब्द किसी गहरी गर्ता में गुम हो जाते है ...मैं अपने दिमाग पर एक शब्द लेकर कितना भी जोर लगा दूँ पर वो ख्याल दोबारा नहीं आता ...ज्यादातर मैंने रात को सोने जाती हूँ तब जाग्रत अवस्था से नींदके मंजर तक का जो सफर होता है उसमे कितनी ही बेहतरीन शायरी और कविता मेरे जहनमें उभरती है जिनको मैं आज तक कलमसे उतार नहीं पायी हूँ ...और मैं ये कहूँगी की अगर वो शब्द आज कविता या शायरी बन गए होते तो शायद उनका शुमार मेरी बेहतरीन रचनाओंमें होता ...आज तक उसका एक लब्ज़ मैं नहीं पकड़ पायी ...और हैरत की बात है की मैं उर्दू बहुत नहीं जानती फ़िर भी वो गुमनाम रचनाओंमें बहुत ही नजाकतसे उर्दू शब्द पिरोये हुए होते थे .....इस लिए कभी कभी मेरी रचनाएँ आपको बिखरी सी भी लग सकती है पर ये मेरी मजबूरी है क्योंकि फ़िर ये ख्याल मेरे जहनमें दोबारा नहीं आ पाते है ....उस निशब्द खयालोंकी घुटन मैं अपने में महसूस कर लेती हूँ ....

लेकिन फ़िर भी आप सबकी कमेंट्स मुझे मायूसीसे बचा लेती है और बेहतर लिखने को प्रेरित करती है .... मैं आप सबकी तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ अपनी हौसला अफजाई के लिए ......

हर किसीकी किस्मतमें गुलाब बनकर खिलना लिखा नहीं होगा ,

पर हम हिफाजत करने उसकी कांटे बनकर उसके साथ ही रहे ....

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अल्फाज़ जब जबान पर रुक जाते है ,लगता है निगाहोंसे समज लेंगे वो मेरी बात ,

जब निगाहें भी न मिल पाए उनसे तो कैसे समजा पाएंगे हम दिल की बात ????

5 अगस्त 2009

राखी ...!!!!

कच्चे धागेमें बंधा प्यार भेज रही हूँ ,

आज बचपनकी यादोंको इस पातीके साथ भेज रही हूँ ,

दिलमें हर दुआ तेरे लिए निकल रही है

मेरे भाई आज राखीके दर्पणमें अपना बचपन भेज रही हूँ .....

दूर देस जो ब्याह दी है बाबुलने जिगरके टुकड़े को ,

बस अगले सावनमें मिलनेकी आस भेज रही हूँ ,

मांगती नहीं आज कुछ तुमसे ,

शोकेसमें वो बैठी गुडिया बतौर उपहार मांग रही हूँ .....

4 अगस्त 2009

उनसे मिलकर ....

चुपचाप लंबे रस्ते पर हमकदम बनकर चलते रहे एक शाम ,

रुके थोडी सी देर के लिए एक मिलके पत्थर पर बैठे ,

एक शब्द ना उन्होंने कहा था , हम भी चुप्पी साधे चलते रहे थे ,

पर फ़िर भी ये लग रहा शायद बहुत सारी बातें हो गई थी ......

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उनकी दांतमें ऊँगली दबाने की अदा जैसे बातें कर गई ,

उनकी जुकी हुई पलकें शर्मो हयासे हमें कायल कर गई ,

बढ़ते बढ़ते रुक जाते थे जो कदम उनके साथसे मचल गई ,

उनके रुखसार पर आ कर अटक गई जुल्फ हमें घायल कर गई .........

क्या कहें ? क्या ना कहे ? क्या कोई जरूरत लगी उसकी ....

हमारे बीच थी जो खामोशी वही बातें करती रही ,सन्नाटे को चीर गई .........

3 अगस्त 2009

फर्क तो बस इतना सा ....

पूछा कभी बहारोंसे खुशबू कहाँ से लाती हो ?

कहा उसने खुशबू कहाँ है ? ये तो आपका नजरिया है .......

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मुझे कभी अपनेसे प्यार करना कहाँ आया ,

ये तो तुम थे जिसने मुझे प्यार करना सिखाया ,

अपने आपसे नहीं बेगरज किसीसे प्यार करके तो देखो ,

जहांसे ही दिल भरकर प्यार मिल जाया करेगा ....

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क्या फर्क है जन्नतमें और जहन्नम में ?

फर्क तो बस नजरिये का ही है ....

क्या होती है इब्तदा और इन्तेहाँ ?

फर्क तो बस नजरिये का ही है .....

जहाँ इन्तेहाँकी आखरी कड़ी है

वहां पर ही किसीकी इब्तदा होती है .........

2 अगस्त 2009

ये दोस्ती ....

आज दोस्ती दिवस है ...

हम इतने मशरूफ हो गए है की हम दोस्ती जैसे हर पल साथ रहने वाले एहसास को भी साल के एक दिन सुपुर्द कर चले है ..भौतिकवाद की चरमसीमा ये मनाने वाले दिन की लिस्ट को देखकर ही समजमें आ जाती है ...

कुछ अरसे पहले मैंने इस जगह एक लघुकथा लिखी थी : मिस्ड कोल .....अगर आज मैं आपको ये कहूँ की ये कोई काल्पनिक कथा नहीं थी तो ? हाँ ,ये सच है की ये काल्पनिक कथा नहीं है ..एक अंत को छोड़कर इस की सभी घटनाएँ मेरे जीवनमें सचमें ही घट चुकी है ...नाम बदले है पर वो एक मैंने जिया यथार्थ ही है ..यहाँ तक की उसमें लिखे संवाद भी वही है जो हमने बोले थे ....

दोस्तीको उम्र -रूप -रंग -फासले -करीबी किसीसे वास्ता नहीं होता ...आज भी ये पोस्ट लिखने से पहले मैंने वो सभी मेरी नन्ही दोस्तोको एक और मिस्ड कोल कर दिया ...मेरा सबसे छोटा दोस्त ६ साल का है ...राहील ...मेरे घरके नीचे ही रहता है ...वो मुझे आंटी नहीं अपनी बेस्ट फ्रेंड कहता है ...अपनी नोट बुक में मिला हर स्टार मुझे दिखाकर एक चोकलेट वसूल करता है ...स्कुल में जो इनाम मिलता है अपने पिताजी की गाड़ी से उतरकर सीधा मुझे दिखाने चला आता है ...अपनी छोटी छोटी बातें मुझसे शेर करता है ...

पिछले साल उसका पुरा फेमिली वडोदरा से हमेशा के लिए अहमदाबाद चला गया था ...वहां पर सेटल होने ही गए थे ...उस घड़ी अकेले में मैंने खूब रोया करती थी ...लगता था मुझसे मेरी जिंदगी का एक हिस्सा कट गया ...उसके जनमदिवस पर उसने मुझसे चोकलेट ही मांगी ..फोन पर ...जब एक दिन मिलने आया तो लेकर गया बड़े हक़ से ...

तीन महीने के बाद कुछ ऐसा हुआ की उन्होंने अपना निर्णय बदला और फ़िर एक बार वे लोग वडोदरा लौट कर आ गए ...इसे हम क्या कहेंगे ...हमारी ये मासूम दोस्ती का ये पल भी मैंने खुशी के आंसू बहाकर ही सहला लिया ....

मेरे बचपन की सब सहेली तो दुसरे शहरमें बस गई है ...उनकी याद आज खूब आ रही है ....ये इन्टरनेट की दुनियाने मुझे कितने दोस्तसे मिलवाया है जिन्हें कभी मिली नहीं और शायद मिलूंगी भी नहीं फ़िर भी उनकी मेरे जीवन में एक खास जगह है ....

आप सबको एक गुजारिश है ...अपने दोस्तों को एक पल के लिए जरूर याद कर लो ...उनके गिले शिकवे झगडे भी आज बहुत मीठे लगेंगे ...ये वो रिश्ता है जो हमने ख़ुद चुना है ...रूठों को मना लो , बिछडे दोस्तों को मिला दो ...अपनी दोस्ती का फ़र्ज़ निभा लो ...आज एक रोते हुए को हंसा दो ....एक नया दोस्त बना लो .....

1 अगस्त 2009

हैप्पी फ्रेंडशिप डे.....


तपते शोलों पर साथ साथ हमसफ़र बनकर चला है तू ,

जिंदगीके तूफानोंमें हरदम ढाल बनकर खड़ा है तू ,

गिरते संभलते,रुठते मनाते बड़ी ही अदबसे पका है तू ,

रिमज़िम बारिशमें नंगे पाँव से एक छतरीके नीचे चला है तू .........


दूरियाँ कभी मीलोंकी बन गई नहीं मायने रहे उसके

जब दिल उदास हुआ था एक सुकून बनकर मिला है तू ,

मेरे साथ हर गम में साथ मेरे रोया है तू ,

खुशी जब बनकर आई मेरी देहलीज़ पर मुस्कान बन खिला है तू ........


साल -महिना -दिनमें जिया नहीं कभी तुझे मैंने

बस कुछ पलोंके लिए भी मुझसे बातें कर गया है तू ,

खूनसे रिश्ता नहीं बना फ़िर भी अनकहा एहसास

रिश्तो की भीड़में एक गहरा रिश्ता बन गया है तू .........


मेरे लम्हों की रौशनी है अंधेरोंमें , फूलोंकी खुशबू सा

मेरे सूखे जीवन को बगिया बना गया है तू ,

उम्र जिस्म पर ,चेहरे पर छोड़ गई है जो जुर्रियाँ ,

उसकी गहराईमें हमारी दोस्ती बनकर जिया है तू .........