30 जून 2009

सपने भीग गए ...

कल रात कुछ बारिश हुई ,
हलकी फुहारोंने तकिये को भिगो दिया ,
कुछ सपने सहेजकर रख दिया था वहां ,
भीग गए उस रिमज़िम में ....
निचोड़ कर उन ख्वाबोंसे एक पयमाना भर लिया ,
और उनके खुमार को एक घूंटमें पी गया .....
सपनोंको मैंने डोरी पर सुखा दिया ,
उड़ न जाए तेज हवाओंसे इस लिए क्लिप भी लगा दिया ....
थोडी धुप निकली और तेज हवा भी चली
फ़िर भी सपने सूखे ही नहीं ...
प्यारकी खुशबु ने उसे गिले और सिले ही रखे है ,
अब उन सपनोंको मैंने यूँही तह लगाकर
आंखोंकी अलमारी में फ़िर सहेज कर रख दिया ......

29 जून 2009

पहला ख़त हॉस्टलसे ..

हॉस्टल में रखे गए एक बच्चे का पहला ख़त :

" प्रिय पापा ,मम्मी ,अनू दीदी ...

सादर प्रणाम ,

आप सब ठीक होंगे ? आप मुझे मिस करते होंगे ...मम्मी मैं तुम्हे बहुत ही याद करता हूँ ....मम्मी क्या मैंने तुम्हे इतना सताया की तुमने मुझे हॉस्टलमें छोड़ने के लिए पापा को हाँ कह दिया ? नहीं मम्मी आज भी तुम मेरे रूममें जाकर मेरे तकिये को पप्पू समज कर सहलाती होगी ...मुझे अगले महीने के रविवार का इंतज़ार है ,मम्मी आप जरूर आना ...नहीं तो मैं आपसे किट्टी हो जाऊँगा ...

अनु दीदी आपको अब कोई पढ़ते वक्त तंग नहीं करता होगा ...दीदी बाजु वाले दिन्गु के कुछ कंचे मेरे पास रह गए है ...मेरे टेबल के तीसरे ड्रोवरके पीछे वाले हिस्से में लाल कलर के बैग में छुपाकर रखे है ...आप उसे दे देना ...वो मुझे मारता था इसी लिए मैंने गुस्से में छुपा दिया था ...दीदी इस हॉस्टल में मुझे उसकी बहुत याद आ रही है ..उसे ये बात जरूर बता देना ...और उसे मेरा माउथ ओरगन बहुत पसंद है उसे वो देना ...

इस वक्त राखी के दिन मैंने स्कुल में एक बड़ा प्यारा लकड़ी का बेंगल बॉक्स बनाना सिखाया था वो बॉक्स आपके लिए लेकर आऊंगा गिफ्ट के तौर पर ...

आप मम्मी के पास ही रहना ...वो जब मुझे याद करके रोये तो कहना मैं खुश हूँ ...आप रो दोगे तो मैं आपसे कभी बात नहीं करूँगा ...

बस अब शाम को खेलने का वक्त हो गया है ...मैं जा रहा हूँ ...मुझे ये ख़त का जवाब जरूर लिखना ...

पापा आपको मैंने कैसे भूल सकता हूँ ...आपकी चोकलेट को मिस करता हूँ ...मैं अच्छा बनने की कोशिश जरूर करूँगा की आपको मुझसे शिकायत न हो ...आपको मेरे प्रणाम ...

आपका ही

रवि राज

28 जून 2009

ख़त के नाम एक ख़त ....

आज एक पुराने ट्रंक को खोला ...एक थोडी फटी पुरानी प्लास्टिक बैग निकला ...मेरी बिछड़ी हुई सहेली के दो तीन ख़त मिले .....उसे बहार निकला तो थोड़े फटे से थे ...कुछ अक्षर भी बिखरे थे ...पर ताज़ा थी कुछ यादें ...!!!

सबसे ज्यादा इंतज़ार का मजा आता था की कब पोस्ट मन आए और चिठ्ठी लाये ..!!!!चिठ्ठी न आने पर मायूसी का आलम और आ जाने पर उसे खोलकर डूब जाना ....

उसी समय में पहुँच कर उस पलोको याद किया तो मन भीग गया ...

आज हाथमें मोबाइल है ...मेमरी में नंबर भी होते है ...लव यु ..मिस यु ...कॉल यु बेक ...छोटे छोटे मेसेज से भरा होता है उसका इन बॉक्स ......बस एक नंबर डायल करो और चंद मिनट तक बात करलो... सच्चे जूठे अहेसास बाँट लो ....किसीकी भेजी हुई शायरी , विचार को फॉरवर्ड कर दो ....उसमे अपनापन ढूँढने की भी फुर्सत नहीं ...बस एक फ़र्ज़ की तरह प्यार को एस एम् एस से निभाया जाने लगा है .....आपने कभी कल्पना की है ?

१.....अच्छा ऐसे कहते वक्त सामने वाले इंसान के हाथ में रिमोट होता है और आप कोई दुःख की बात कह रहे हो और वो लेटेस्ट फ़िल्म का गाना बड़े चाव से देख रहा हो ...उसके मुख मंडल पर जो भावः उस वक्त होता है उसे आप देख लो तो शायद दोबारा फोन भी न करो .....पर एक ग़लतफहमी में जीना हमें रास आ रहा है .....

२....आपसे थोड़े फीट दूर होने वाला व्यक्ति बोल रहा है की अभी तो वह आउट ऑफ़ स्टेशन है ....

३...दुसर जरिए ईमेल ...वो तो आप सब जानते है ....छपे हुए अक्षर में टूटे फूटे मरोड़ की गुथ्थियाँ कहाँ ?

मुझे ये झूठ पर सबसे ज्यादा हँसी आती है ...की इंसान अपने आप को कितना स्मार्ट समजने लगा है और दूसरों को बेवकूफ ....सच कहूँ तो मुझे मिलने वाले व्यक्ति को मैं एक बिल्कुल साधारण व्यक्ति जिसे शायद बात भी करना न चाहे ऐसी लगती हूँ ...मैं उन्हें बेवकूफ दिखकर ही बेवकूफ बनाती हूँ .....दिल्लगी सिर्फ़ वो लोग ही नहीं हम भी तो कर सकते है .....

अगर आपने अपने लिखे या मिले खतों को संभाल कर रखे हो तो उसे फुर्सत में पढ़कर देखना ...सच वो आपके दिल को एक सुकून देंगे ...वह बातें जो लिखी होती है वह पढ़ते वक्त लगता है जैसे वो इंसान हमें ख़ुद ये बात अपनी आवाज में अपनी जुबानी बताता है ...जब चाहे उस ख़त को हम दोबारा पढ़ सकते है ...उसकी शायरी में वो कशिश हमेशा बनी रहती है बिल्कुल तरोताजा गुलाब की तरह ...एक नायाब खजाना होते है ये ख़त जिसकी हमें शायद ही इस ज़माने में कद्र होती है ...

एक ख़त लिखने बैठो ...देखो उन पलों में एक नई दुनिया ही होगी आपके साथ ...वर्तमान सारे टेंशन भूल कर अपनी बात आप लिख लोगे ....लिखने के बाद आप अपने आप को बिल्कुल हल्का महसूस करोगे ...मेरे पिताजी आज के भी दिन पर बधाई देनी हो तो कविता के रूप में लिख कर एक लिफाफा मुझे थमाते है ..ये उनका बेशकीमती तोहफा है ...

कुछ लब्ज़ इन खतों के नाम ;

बिखरी हुई खुशबुओं को सहेज कर बैठते हो ख़ुद में

जब मिलते हो तो बड़े अपने लगते हो

एक सच हुए सपने लगते हो

आप हमारे साथी फ़िर भी शब्दोंके कपडों में लिपटे लगते हो ....

तहे खोलकर ख़त की जब पढ़ते है

तो चेहरे पर खुशियों की लालिमा छाती है ...

कभी चेहरा शर्मसार होता है ...

कभी आँसू की शबनमसे धूल जाता है ...

कुछ होठोंसे न कह पाए कभी

ये भी अच्छा जरिया है तुम्हे ख़त से कुछ कहने का ...

तुमसे मिले बगैर रूबरू तुम्हारे वजूद को सहलाना है ...

तुम रहो ना रहो हमारी जिंदगी में ये तुम्हारे ख़त ही तो

जीने का हमारे आसरा है ........

=ये बात अभी जारी रहेगी अगले अंक तक .......

27 जून 2009

अय बरखा ...

तेरी राह तक रहे है अय बरखा ,

प्यासी है जिंदगी बस दो बूंद हम पर बरसा जा ......

तेरी शबनमी बूंदों से जलते अरमान सी धरती

कुछ पल के लिए भीग जायेगी

फ़िर अपना सीना चिर कर फसलों को लहलहाएगी ....

आँख मिचौली खेलना तेरी आदत ही सही

अभी छुप गए हो पर पकड़े तो जाओगे ही ....

हमारी याद में अक्सर तुम भी आंसू बहाओगे ही ....

थोडी तड़प ,थोडी सी प्यास और दो घड़ी बढ़ा जाओ ,

पर ये आस या साँस टूट जाए

उससे पहले तो तुम आ ही जाओ ........

26 जून 2009

एक दरख्त का दर्द बांटे ....

हाथमें आज मेरे एक सितारा आ गया ,

चाँद हथेली में होने का अहेसास आ गया ,

कभी न हो ऐसा खुशीका काफिला आया ,

कुछ पलके लिए जिंदगी जीने का मज़ा आया .........

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कभी पूछ कर देखो वो घने दरख्त को भी ,

कितने सालों से यूँ ही खड़े हो ?

क्या तुम्हारे पैर नहीं दुखे कभी ?

क्या तुम्हे धुप, ठण्ड ,बारिश का अहेसास नहीं ?

तुम पर बैठकर कितने ही परिंदे खुशियों के गीत गाते होंगे ?

कितने पंछी तुम्हारी डाली पर घोंसले बनाते होगे ?

कितने फूलोंकी खुशबुएँ तुम्हे महकाती होगी ?

कितने फलोंसे हुई जुदाई कभी तुम्हे याद आती होगी ?

कितने सूखे पत्ते जुदा होकर तुमसे रोये होंगे ?

कितने नई कोपल के फूटने के दर्द तुमने सहे होगे ?

कितनी हरी डालियाँ ?कितने सुने घरौंदे तुम्हारे साथी बने होगे ?

कितनी बार ये याद करते हुए तुम जड़ों से लिपट कर रोये होंगे ?

चलो आज तुमसे बात करके तुम्हारी तन्हाई को बांटती हूँ ....

तुम्हारे तने को एक बार प्यारसे सहलाती हूँ .....

25 जून 2009

एक खुबसूरत धोखा ....

सहरको शाम का इंतज़ार रहा ...

मेरी निगाहोंमें भी आपका इंतज़ार रहा ...

हर आहट पर आपके कदमोंका नामों निशान रहा

हवाके तेज़ झोंकोसे जोरोंसे बंद होने पर खिड़की के किवाड़

दिल कुछ ऐसे जोरोंसे धड़क गया जैसे

ये आपके आने का धोखा था ........

खयालोंमें गुम होकर आपके ही

कुछ खो जाते है यादोंके भंवरमें ...

आप ख़ुद आकर खड़े होते है सामने

और हमें लगता है कुछ यूँ की ये भी नज़रों का धोखा था .....

हाथों में जब हाथ थामें आपका

बैठे रहे थे रूबरू आपके

निगाहोंसे निगाहोंकी गुफ्तगू हो रही थी

तब लगा कुछ पल ये खामोशी का आलम भी धोखा था ....

कल फ़िर सहरको एक शामका इंतज़ार होगा ...

कल फ़िर हमें आपका और आपको हमारा इंतज़ार होगा .....

24 जून 2009

बदलते रिश्ते

यकीं नहीं अब उस पर रहा ,
हर पल खाते थे कसम दोस्ती की ,
फ़िर भी परदा ही करते रहे हर बात पर ,
अब बेवफा हमें कह दिया ???
दोस्तीके मायने गर समज न आए तो
दोस्ती किसीसे ना कीजे ...
अगर ख़ुद पर यकीं ना रहे तो
औरों को बेवफा मत समजिये ...
मूड जाते है अब इसी मोड़ पर
एक हँसी अंजाम देकर ,
गर मिल गए फ़िर से रास्ते
बस पहचानकर एक मुस्कान दीजे ...

23 जून 2009

हाइकु :मौसमकी पहली बारिश

आंधी तूफान

संगी साथी है तेरे

पहली वर्षा .....

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चुपके छुई

रात बुन्दोने भूमि

फिजा महकी .....

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चुपके हुआ

धरती का नर्तन

बुन्दोंमें नहा ....

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जुल्फें बरसी

शबनमी मौसम

भीगा चेहरा ......

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खता तेरी है

प्यार हो ही जाना था

भीगे हुस्न से ......

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21 जून 2009

हैप्पी फाधर'स डे .......

आज जून महीने का तीसरा रविवार ....पाश्चात्य असर के नीचे हम भी आज के दिवस अब फाधर'स डे मनाते है ...

फाधर, पिताजी ,बापू , डेड ,डेडी,पो, पा,पोप्स ,पापा ...हमारी जिंदगी के अभिन्न अंग तो है ही लेकिन ये किरदार से ज्यादा तवज्जो हमने माँ ,और मातृत्व को हमेशा दी है और ये ग़लत भी नहीं ...पर आइये आज हमारे पापा को मिलते है ...

हमारे वजूद में घुले है ...सुबह में काम पर जाने वाले ...टिफिन लेकर ,शाम को घर लौटने वाले हमारे पापा से ज्यादा हमेशा घर में रहने वाली नर्म दिल माँ के पास हम ज्यादा रहे है ..उसने हमें ज्यादा प्यार दिया है ..वह हमें डांटती भी है पुचकारती भी है ...लेकिन कभी बाप की नजर से देखो ...अपने परिवार की हर खुशियों को लाने के लिए वह सुबह से ही इस दुनिया से उलज़ने निकल जाते है ...माँ उनकी कमाई से घर चलाती है ...हमारी हर छोटी बड़ी चीजों के लिए ये पापा पुरे दिन महीने सालों से खून पसीना बहाते है ...हमारी हर सुविधा के पीछे उनका योगदान उतना ही होता है ..लेकिन इन्होने कभी ये जताया नहीं ...हमारे लिए उनके दिल में कितनी चिंता है ये जताना उन्हें कभी आता ही नहीं ...वो जब हम सो जाते है तो हमारे सर में बाल में हाथ घुमाते तो है पर उन्हें लोरी गाना नहीं आती ....पर हमें वो चाहते है उसके सबूत वो दे नहीं पाते .....वो ये सब काम माँ के सुपुर्द करके उसे सब वाह वाही बटोरने देते है ......हमारे माँ बाप के बीच पति और पत्नी के रिश्ते को कभी हम नहीं सोचते ..जब संतान का जन्म होता है तबसे माँ का पुरा ध्यान जाने अनजाने में अपनी संतान के प्रति ही बंट जाता है ...कभी कभी तो वह अपने पतिके प्रति भी बिल्कुल बेपरवाह बन जाती है .....उनके निजी रिश्तों में बारीक दुरी भी आ जाती है पर ये पिताजी इस बात को बिल्कुल खामोशी से जी जाते है ...अपने संतानोंमें घिरी पत्नी के समय पर क्या उन्होंने कभी हक़ जताया है ?......याद है आपको लक्ष्मण जब राम और सीता के साथ वन में गए तो उर्मिला चौदह साल अकेले ही रही थी बिना शिकायत किए ....और हमारे पिताजी हमारी हर खुशी के लिए ऐसे ही रहते है ...सोच कर देखना ऐसे कई पल आपको याद आ ही जायेंगे .....

दुनिया में सिर्फ़ लाड प्यार ही होता तो हमारी गलतियों को सुधारता कौन ? हमें डांटता कौन ? कभी मारता कौन ? हमें अच्छा इंसान बनाता कौन ? ये कठिन कार्यभार हमारे पापा सँभालते है ...हमारी ही भलाई के लिए ये सब उन्हें अपने प्यार को दिल में छुपा कर कठोर बनना पड़ता है ...हमें बचपन में जो छवि कठोर नजर आती है वह क्यों ऐसी थी वह हमें माँ बाप बनकर शायद समज में आती है ....ये नारियल की तरह होते है ...ऊपर से कठोर अन्दर से पानी मलाई की तरह कोमल .....ये वो बरगद का वृक्ष है जिनकी छाँव में हम हमेशा महफूज़ रहते है ...सब परेशानियों से वह हमको दूर रखते है ...ख़ुद उससे झुझते है पर कभी हम तक उनकी भनक तक पड़ने नहीं देते ...ऐसे होते है वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल हमारे पापा .........

मेरे पापा की बात के बगैर ये पोस्ट अधूरी रहेगी ....

पिताजीकी पुश्तैनी विरासत तो बेटे को दी जाती है ...जायदाद ,मिलकियत सब ...पर मुझे मेरे पापा से मिली है ये कलम विरासत में ...मेरे पापा लिखते बहुत ही अच्छा है ...उनके हस्ताक्षर बिल्कुल मोती के दानों की तरह है ..उन्हें हमेशा मेरे हस्ताक्षर बहुत बिगडे लगे है ...मेरे पापा को मेरा ये लिखना बहुत ही खुशी देता है ...सब उन्हें कहते है आपकी विरासत आपकी बेटीने बखूबी संभाली है ...तब मुझे अपने पापा की बेटी कहलाने में गर्व महसूस होता है ...

एक याद :

मुझे बी कॉम के बाद अनुस्नातक की पदवी पानी थी ..मैं जाकर फॉर्म ले आई ...उस दिन पापा की सबसे ज्यादा दंत खायी थी ...खूब रोई थी ...उन्हें अब मेरी शादी की चिंता थी ...तू इंतना पढेगी तो इतना पढ़ा लिखा लड़का कैसे मिलेगा ??? पर मैं जिद्दी थी ...मैंने दो साल पढ़कर ये पदवी हासिल कर ही ली ....जब एम् कॉम फाइनल का रिजल्ट आया तब मैं अहमदाबाद में थी ...मेरी करियर में पहली बार मेरे पापा ख़ुद कोलेज गए ..मेरा रिजल्ट लिया और स्टेशन पर जाकर आर एम् एस से मुझे पोस्ट कार्ड लिखा ....उसकी ये लाइन मुझे अब भी याद है ...बेटी आँख में आंसू के साथ ये ख़त लिख रहा हूँ ...तू पुरे खानदान में पहली अनुस्नातक बन गई ....ऐसे होते है पापा ...मैं हमेशा फर्स्ट डिविजन में पास हुई थी ...पर मैनेजमेंट जैसे विषय को चुना था जो उस वक्त बिल्कुल नया था ...१९८३ में ..हमारी कोलेज में ....उसमे मेरी दूसरी डिविजन आई ...तो भइया पापा से बोले इस वक्त दूसरी ?...

तब पापा ने कहा बेटे गुजराती माध्यम से पढने के बाद अंग्रेजी माध्यम में पढ़ना और बिना ट्यूशन ,क्लास किए स्कोलर शिप पर अपनी पढ़ाई पुरी करना ....मेरी बेटीने बड़ी महेनत की है ये तुम्हे अंदाज नहीं है ....

पापा सिर्फ़ आज ही नहीं जब तक मेरी आखरी साँस है तब तक आप मुझमे जिन्दा है .......

20 जून 2009

२१ जून -विश्व संगीत दिवस


जहाँ ये सारा फलक है मेरा ,

तुम्हे सजा दूँ ,संवारू एक गीत बनाकर ....


सूर बनेंगे तेरे पायल की झंकार

धून बजायेंगे तेरे कंगन खनककर

मुस्कराहट तेरी एक गीत बनकर आएगी

बरसेगा जब सावन अबके फिजा टिप टिप आवाजमें गुनगुनायेगी .....


ये सुनकर झुमका डोला और बोला जैसे बांसुरी

तुम्हारे नयन पलकों से झाँख रहे एक नए तराने से

धानी चुनर को भी सुरों की बारिशमें नहाना है ......

तुम्हारी बिंदिया को भी नया गीत गाना है ....

देखो गरजत बरसत कारे घन नीले आसमांको सजायो है ,

कड़कती बिजलीसे चमकते हुए राग मल्हार रिझायो है ,

धरतीकी तपिश के शोलों को अब थोडी भीगी हवाएं देते जाओ ,

डौल रही धरती है कहते हुए मौसमको भी सुनते जाओ .....

19 जून 2009

कभी दिल ऐसे भी बागी हो जाता है ....

वाह क्या थी वाह पहली डांट अंकलकी ,
जब साइकिल चलाकर मैंने दो फीट की
रेलिंग कुदाकर उनके घरमें
क्रेश लेंडिंग कर दी थी .....
दूसरी डांट मुझे पड़ी पिताजीकी तब
जब शादीके सात दिन पहले
भैयाके साथ मैंने स्कूटर सीखते हुए
पूरी कोलोनीके खूब चक्कर लगाये थे .....
तीसरी डांट पड़ी सजन की
जब सिक्किममें १२५०० फीट पर
बर्फ की बारिशमें नहाने के लिए
सरे आम जीपमें से कूदकर मैं भागी थी .....
बिहारमें हर घरके सामने कमल से भरे तालाब देखे ,
गंगामैयाके ऊपरसे बिन नहाये पुल परसे गुजरना
उगता सूरज कभी दौड़ती खिड़कीसे कभी डूबती शामके नजारा था ...
वाह क्या वाह ट्रेनमें बैठकर ४ दिन के सफ़र भी सुहाना था .....
आज भी कितनोंसे टकरा जाती हूँ जब मोपेड चलाती हूँ ...
पुलिस की सिटी सुनकर भी सिग्नल तोड़कर भाग जाती हूँ ....
बिना साईड दिखाए अचानक ही मुड कर पीछेवाले की डांट खाती हूँ .....
और कभी बिना ब्रेककी गड्डी भी तीन महीने तक चलाती हूँ ..

18 जून 2009

ये पयगाम एक दोस्त के नाम ....

आज अचानक मेरे अजीज दोस्तने

एक अजीबसा सवाल पूछा मुझे !!

जान , हमारी दोस्तीका कैसा है मिजाज़ ?

कैसा है रंग ? और कितनी है गहराई ?

मैं उठकर बाहर आंगनमें गई

गमलेमें अधखिले लाल गुलाबको

तोड़कर उसके हाथोंमें रख दिया

देख ये है हमारी दोस्ती की तस्वीर ...!!!

वो हंस पड़ा ...

बस शाम होते ही मुरझा जाएगा ,

और फ़िर किसी पैर के नीचे कुचला जाएगा ...

फ़िर शायद ही याद आएगा .....

मैंने उठाकर उस गुलाबको

अपनी ग़ज़लकी डायरीके दो कोरे पन्नोंके बीच

संभालकर रख दिया

और बेशकीमती यादकी तरह टेबल पर सजा दिया .....

जुदा हो गए हम .......

बरसोंके बाद वो दोस्त एक बार

लौट कर फ़िर मुझे मिलने आया

मुझे गले लगाकर कुछ और कह न पाया ......

टेबल से उठाकर वह पुरानी डायरी मैं ले आई

कोरे पन्नोंके बीच सूखे गुलाबवाली डाली दिखाई ,

कोरे पन्ने महक रहे थे अभी भी ताज़ा ही थे ...

हमारी दोस्ती ,उसकी रंगत ,उसकी ताज़गी आज भी वही थी ......

17 जून 2009

बातें आज संगीतकी ....

आज बात करें कुछ संगीत की !! एक नन्हा सा बच्चा जब इस दुनिया में आता है तो उसके रुदन के साथ ही शुरू होता ही संगीत का पहला सफर ॥

चिडियों का चहचहाना, झरने का कलकल करके बहना,कोयल का कुकना ,बारिश की बूंदों का छमछम करके जमीं पर कूदना, कहीं पर भी देखो संगीत के सुर प्रकृति भी हमेशा से बहाती रही है । दुनिया के किसीभी देश में जाओ वहां की प्रजा का एक संगीत का अपना रूप ही पाते ही .नृत्य भी संगीत के साथ अभिन्न रूप से जुदा हुआ पाया जाता ही .चाहे वह पूरब का देश हो या पश्चिम का !!!

अगर हम बात करते ही हमारे भारत देश की तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर राज्य की पहचान अपना अलग नृत्य और संगीत ही ।हर राज्य का अपना लोक संगीत ही अपनी भाषा और बोली के अनुसार ...नृत्य भी संगीत के बिना बिल्कुल अधूरा पाया जाता है. पंजाब का भांगडा-गिद्दा नृत्य लीजिये ,या आसाम का बिहू नृत्य ,गुजरात का गरबा लीजिये या केरल का कथकली हरेक की अपनी पहचान है .पश्चिम बंगाल की पहचान है उसका रविन्द्र संगीत !!! भारतीय संगीत के मुख्य दो प्रवाह : शास्त्रीय और सुगम संगीत .सुगम संगीत ज्यादा लोकप्रिय और धारा प्रवाह से जुडा पाया जाता है .उसमे फिल्मी संगीत मुख्य है .उसके रीमिक्स गाने ,नॉन फिल्मी प्राइवेट अल्बम ,गझल ,भांगडा ,और न जाने क्या क्या !!!! शास्त्रीय संगीत जुडा है मुख्यतः वाद्य संगीत और गायकी से .गायकी में अनगिनत दिन के हर प्रहर के अनुरूप राग गए जाते है .बंदिशे है ...सूर है ...ताल है ....त्रिताल है ....गायकी में भी ठुमरी ,दादरा और ना जाने क्या क्या !!!! वाद्य संगीत में भी कई वाद्य देख सकते है :सितार ,तबला ,शहनाई ,सारंगी ,वीणा,संतूर ,सरोद ,वायोलिन ,बांसूरी ,.... सूर होते है सिर्फ़ सात ही :सा ,रे ,ग,म, प, ध ,नि ....पर एक बहुत ही अनोखी और कर्णप्रिय दुनिया का सफर है ये संगीत ...

गिटार ,ड्रम,बोंगो ,कोंगो ,इलैक्ट्रिक गिटार ,सेक्सोफोन,कैसियोसे जुडा है आधुनिक संगीत और अब तो कम्प्यूटर की मदद से आप चाहे वह कर सकते है ।आजकी नई पीढ़ी ने तो इन दोनों को मिला कर फ्यूजन संगीत का आविष्कार किया है . गायकी में देखो तो कितने प्रकार है !! गीत ,गझल ,पद,छंद ,दोहे ,श्लोक ,प्रार्थना ,भजन ,स्तुति ,कीर्तन ,काफ़ी ,!!! गायकों में देखिये : पंडित जसराज ,पंडित ओमकारनाथ ठाकुर ,पंडित शिवकुमार शर्मा ,पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ,उस्ताद जाकिर हुसेन ,उस्ताद अमजद अली खान ,पंडित रविशंकर , उस्ताद बिस्मिल्ला खान ,जैसे दिग्गज नाम जुड़े हुए है ... अकबर के दरबार के तानसेन , गुजरात के तानारिरी ,बैजू बावरा ,तुलसीदास ,सूरदास ,भक्त कवि मीरा बाई संगीत से जुड़ी अमर दंतकथा है ......

अब बात करते है कुछ फ़िल्म संगीत की भी ।द्वंद्व रहा है हमेशा पुरानी और नई फिल्मों के संगीत के बीच॥नई पीढ़ी के बाशिंदे भी पुरानी फिल्मों के संगीत की कर्ण प्रियता और लोकप्रियता का सहजता से स्वीकार कर लेते है पर पुरानी पीढ़ी अभी तक प्रवर्तमान संगीत को अपना नहीं पाती है . गायकों की बात करें तो के एल सायगल,नूरजहाँ ,सुरैया ,सुरेन्द्र ,शमशाद बेगम ,बेगम अख्तर ,मोहम्मद रफी ,मुकेश ,किशोरकुमार ,महेंद्र कपूर ,मन्ना डे,से लेकर सोनुनिगम , के .के .,शान ,अदनान सामी ,श्रेया घोषाल ,कविता कृष्णमूर्ति , और अभी तक जो सदा बाहर है उन महान गायिका लता मंगेशकरजी ,और आशा भोसले ...ये लिस्ट में अभी अनेक नाम छुट रहे है जो में महसूस कर रही हूँ .टी. वी पर आने वाले रियालिटी शो के जरिये कितने ही नए उभरते गायकों की संख्या बढ़ रही है .....

संगीतकारोंको लें तो नौशाद ,एस ।डी .बर्मन ,पंचम दा ,लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ,कल्याणजी आनंदजी ,खय्याम ,रविन्द्र जैन ,सी रामचंद्र ,से लेकर आज के ऐ आर रहेमान तक के महान संगीत कर मौजूद है ...

आनंद बक्षी ,योगेश ,कैफी आज़मी से लेकर आज के प्रसून जोशी तक के नमी अनामी शायरों के सुंदर अल्फाजों को बंदिश में बांधा जा चुका है ॥मेरे प्रिय गीतकार तो है गुलज़ार जी ....

बेजोड़ तवारीख रही है ये हिन्दी फ़िल्म और गैर फिल्मी गीतों के सफर की ... लोक संगीत से रीमिक्स तक का फ्यूजन संगीत तक का ये सुरीला सफर है जिसके कई मुकाम तो है पर मंजिल कभी नहीं हो सकती .....इस संगीत ने हमें हमेशा तनावमुक्त रखा है ।

दो पीढियों के बीच के फासले अगर कम करने हो तो संगीत एक अक्सीर इलाज है । थोड़ा थिरक लीजिये आज के इस गाने पर भी : ये इश्क हाय बैठे बिठाये जन्नत दिखाए हो .... अपना पुराना जवानी का युग याद आ जाएगा .

अगर मैं कुछ अपनी बात कहूँ तो ट्रांजिस्टर से हेड फोन तक के उपकरण ने मुझे बचपन से आज तक संगीत से जोड़े रखा है .मैं हर दौर में बजने वाला वर्तमान संगीत ही सुनना पसंद करती हूँ .आज का ही भरपूर मजा लेती हूँ ..कल का संगीत पसंद है तो आज के गाने भी बड़े ही चाव से सुनती हूँ .मोबाइल के हेड फोन और कार के रेडियो तक ऍफ़ एम् संगीत की आज बोल बाला है .रेडियो आज का लेटेस्ट ट्रेंड है . प्राइवेट ऍफ़ एम् रेडियो का आकाशवाणी से जब्बर मुकाबला है .पर जित तो आखिरकार संगीत की ही है ... इतना लिखने के बाद भी ये लेख अधूरा सा ही लगता है क्योंकि अभी इसमें कई बातें छूटी हो सकती है ...
मेरे कुछ पसंदीदा आज के गाने ::

१.तोसे नैना लगे पिया सांवरे ...
२.जुदा होके भी तू मुझमें कहीं बाकी है ...
३.मौला मेरे मौला मेरे ...
४.आंखों में सपने लिए ...
५.गुमसुम हो क्यों ??
६.किसका है ये तुमको इन्तजार मैं हूँ ना ....
७।मैं जहाँ रहूँ मैं कहीं भी हूँ तेरी याद साथ है ....

८रहना तू है जैसा तू थोड़ा सा दर्द तू थोड़ा सुकून ....

सफर ये सुरीला संगीतका कभी ख़त्म न हो पाये ,

ये इश्क सूर का मुझमे मेरी साँस हो....

16 जून 2009

वक्त...समय...लम्हा ...पल ..!!

वक्तकी रेतघड़ीसे बह रहा है समय अपनी गतिसे ही ,

कभी वो तेज लगता है कभी रुका सा लगता है ,

रफ्तार वही है उसकी और रहेगी वही

बस नजरिया हमारा बदल गया लगता है .......

कभी किसीको चाहा बेपनाह और मिलने गए ,

तो लगता बस पल भर का फासला लगता है ,

एक पल का इंतज़ार करने पड़े अपने प्यार का

तो उम्रभर का इंतज़ार लगता है .......

किसीके पास बैठते है तो लगता है वक्त रुक क्यों गया है ?

उनके पास महसूस आने पर लगता है वक्त इसी पलमें रुकता क्यों नहीं ?

जिंदगीमें कभी मनचाही मंजिल मिले तो ये वक्त की वफ़ा लगती है ,

कभी जिंदगीकी राहमें चलते हार मिले तो वक्त की बेवफाई लगती है ....

कभी मिलते है किसीसे तो लगता है वक्त इस पलमें रुक क्यों नहीं जाता ?

15 जून 2009

जायज सब कुछ ....

वक्तकी सीपीसे नायाब मोती नजर करने आए थे कभी ,

मशरूफी देखी जब आपकी ,खामोशीका दामन थामे

हम रुखसत कर गए ...

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जंग और मोहब्बतमें जायज होता है सब ,

सुना करते हम ये लंबे अरसे से ,

अबकी कटार भी आपकी थी ,निशाना भी आप थे ,

अब जख्म क्यों गहरा लगा ? ये तो आपके दिए जख्मका अक्स था ......

14 जून 2009

ये नादाँ दिल .....

गिले करते हो , शिकायत भी है हम से ,

ये तो आपका हक़ है ......

हम बेमुर्रवत है ,बे गैरत है ,बेवफा भी है हम ,

ये तो आपकी ही दी हुई सौगात है ..........

आए थे हम आपकी चौखट पर कभी ,

दुआ सलाम करने, आखरी अलविदा कहने ,

शायद न फुर्सद थी न फुरकत के कुछ पल भी ,

बस बेरुखी से मुंह मोड़ लिया आपने जाने क्यों ???

हम ही थे नादाँ बस ये छोटी सी बात न समज पाये थे ,

अब जरूरत नहीं आपको हमारे साये की भी ......

बस फर्क इतना सा हो गया है .....

उस मोड़ पर ,उस राह पर हम आज भी खड़े है ,

पहले जहाँ बातें थी हमारी , अब खामोशियों के गहरे साये रहते है ......

13 जून 2009

आज कुछ अंग्रेजीमें किलर जोक्स

Principal to student..." I saw u yesterday rotating near girls hostel pulling cigarette... ? "
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Class teacher once said :
" pick up the paper and fall in the dustbin!!!"
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once Hindi teacher said...."I'm going out of the world to America.."
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"..DON'T TRY TO TALK IN FRONT OF MY BACK.."
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don't. laugh at the back benches...otherwise teeth and all will be fallen down.....
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it was very hot in the afternoon when the teacher entered.. She tried to switch the fan on, but there was some problem. and then she said
" why is fan not oning" (ing form of on)
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teacher in a furious mood...
write down ur name and father of ur name!!
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"shhh... quiet... the principal is revolving around college"
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My manager started like this
"Hi, I am Madhu, Married with two kids"
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"I'll illustrate what i have in my mind" said the professor and erased the board
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"will u hang that calendar or else I'll HANG MYSELF"
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LIBRARIAN SCOLDE ," IF U WILL TALK AGAIN , I WILL KNEEL DOWN OUTSIDE"
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Chemistry HOD comes and tells us...
"My aim is to study my son and marry my daughter"
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Tomorrow call ur parents especially mother and father
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"why are you looking at the monkeys outside when i am in the class?!"
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Lab assistant said this when my friend wrote wrong code..
"I understand. You understand. Computer how understand??
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Seeing the principal passing by, the teacher told the noisy class..
"Keep quiet, the principal has passed away"
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ये यादों का नगर .....

मेरे वजूदसे बड़ी एक दुनिया मुझमे समायी है ,

जो मेरे मनके नगरमें याद के नामसे जानी जाती है .....

यहाँ यादों के देश में कोई सरहद नहीं ,कोई मौसम नहीं ,

कोई भीड़ भी नहीं ,या कोई तन्हाई भी नहीं .....

यादोंके सफ़रके रास्ते इस जिंदगीसे भी लम्बे होते है ,

यहाँ पर कहीं घने दरख्त ,फुल पौधे ,हंसी मंज़र भी सजे है ......

यादोंके मुलायम फूल भी कभी नश्तर बनकर चुभ जाते है ,

कभी इसकी तीखी चुभन भी मरहम बनकर आती है ........

वो याद बचपनकी एक गुडिया है या पहले प्यार की निशानी ,

आज बालोंकी सफेदीमें सजी ये यादों के बिन ये उम्र भी अधूरी है ....

पता नहीं किसीके यादोंमें मेरा नाम भी लिखा होगा या नहीं ?

कभी ये सोचते हुए कोई जहनमें सिर्फ याद बनकर ठहर जाता है ..........

9 जून 2009

जिंदगी जिंदगी .......

"मिस्टर पाटिल ,आप अपने बेटे अंकुर को अन्दर बुलाइए ।"डॉक्टर चावला ने कहा .

"सर , अंकुर बहुत ही नर्म दिल का है । ये सदमा वह बर्दाश्त नहीं कर पायेगा ."वत्सल पाटिल जो अंकुर के पिता थे उन्होंने इस बात पर ऐतराज जताया .

"देखिये ,ये कोई छोटा बच्चा नहीं है जिसे पटाया जा सके ।और हकीकत का बहादुरी से सामना कर सके इस लिए हमें ही उसे हौसला देना होगा ."डॉक्टर चावला ने वत्सल को सांत्वना दी .

वत्सल और माया पहले ही अपने बेटे की रिपोर्ट देख कर टूट चुके थे ।डॉक्टर ख़ुद जाकर अंकुर को अपने साथ लेकर आए .फीके से चहरे पर एक बुझी ही मुस्कान आई और ओज़ल हो गई .

"देखो अंकुर ,तुम्हारी सभी जांच की रिपोर्ट आ चुकी है ।हम उसका निरीक्षण कर चुके है .अब तुम्हे हिम्मत जुटाकर पुरी बात ध्यान से सुननी होगी .तुम्हारे दिमाग में केंसर का ट्यूमर यानि की गांठ है . बायोप्सी के अनुसार ये अभी सिर्फ़ २५% ही है ,लेकिन हम इसका ऑपरेशन नहीं कर सकते . पर कोई फिक्र नहीं .सिर्फ़ दवाईयों से भी ये गांठ पिघल सकती है . इसका इलाज हो सकता है . लेकिन दवाईयां अच्छी तरह से असर करेगी जब तुम मानसिक तौर पर जीने की ख्वाहिश लिए positive attitude के साथ जीना चाहोगे ." डॉक्टर चावला रुक कर अंकुर के चेहरे पर आए हावभाव पढने लगे जो अभी तक निर्लेप ही था .

"हिम्मत मत हरो अंकुर , एक नई रौशनी तुम्हारी राह देख रही है । be brave my boy .तुम्हे तुम्हारे माँ बाप का हौसला बनना है ." इतना कहकर डॉक्टर बाहर निकल गए .

"मम्मी पापा ,जिंदगी के हर पल को अब हमें भरपूर जीना है पहले की तरह ही ।ये आपकी मायूसी मुझे ये अहसास दिलाएगी की मुझे कुछ हो गया है . अब मैं तो खुश ही रहूंगा पर आप वादा करो की आप भी मेरी तरह खुश ही रहोगे ...!!" अंकुर की इस बहादुरी पर माँ बाप भी कायल हो गए .

स्वस्थ होने पर अपने रोजाना काम पर जुट गया ।नौकरी जोयिन कर ली .लेकिन अब धीरे धीरे उसके मन पर अपनी बीमारी का ख्याल हावी होने लगा .वह बाहर से स्वस्थ दिखने की कोशिश कर रहा था पर जाते हुए वक्त के साथ ये कोशिशें नकामियाब होती दिखाई देती थी . उसके परिवार में एक सन्नाटा छाया था .कोई किसीसे कुछ भी नहीं कहता था . मौन की वाणी बलवान हो रही थी .

उसी वक्त ........

एक ठंडी हवाओं का जोका अधखुली खिड़की से अन्दर आ गया .....

"हेलो .......

मेरे आवाज की दुनिया के दोस्तो !! मैं खुशी फ़िर आपके साथ ,आपके पास आ चुकी हूँ ...."लोकल एफ एम् रेडियो पर एक खूबसूरत एहसासों से भरी आवाजने रेडियो के जरिये पूरे कमरे पर अपना साम्राज्य फैला दिया ।उस आवाज के जरिये संगीत की सुरीली दुनिया में अंकुर पहुँच गया .खुशी लोकल ऍफ़ एम् रेडियो "आवाज" की आर जे (रेडियो जोकी) थी .उसका सुबह का "नई सुबह " प्रोग्राम पूरे शहर में बेहद मशहूर था .जिंदगी और उसकी खुशियों से जुड़ी बाते सुनना उसके श्रोताओं के लिए एक नशा सा बन चुका था .जिंदगी की छोटी छोटी खुशियों को बटोरने के उसके क्वोटेशन तो लोग अपनी डायरी मैं लिख लेते थे .अब अंकुर भी इस प्रोग्राम का चाहक बन चुका था .

एक दिन अंकुर ने निचे का क्वोटेशन खुशी की खूबसूरत आवाज में सुना ,"हम ये सोचते रहते है की कल हम क्या करेंगे ...कलको हम कैसे और भी बेहतर बना सकते है ?लेकिन उस वक्त हम आज के खुशी की सौगात लिए आने वाले हर लम्हे को जीना भूल जाते है ।अब आप ही सोच लो हम क्या खो देंगे और क्या पाएंगे ?"

यह वाकया अंकुर की जिन्दगी के लिए जैसे टर्निंग पॉइंट बन गया उसका ख़ुद अंकुर को भी पता नहीं चला ।वो आज के हर पल में छिपी खुशियों को बटोरने लगा .उसका उसकी सेहत पर एक चमत्कार सा असर होने लगा .दवाओं का सहारा तो था ही और जीवन के प्रति उसके इस सकारात्मक रवैये ने जैसे जादू का काम कर दिया . वक्त के साथ उसकी दिमाग की गांठ याने की ट्यूमर सम्पूर्ण पिघल गई और वह पूर्णतया स्वस्थ हो गया .अंकुर वत्सल माया की जिन्दगी में खुशियाँ फ़िर से लौट आई .

अब अंकुर ने खुशी से एक बार मिलाने का और उसका शुक्रिया करने का फ़ैसला कर लिया । वह हाथों में फूलों का गुलदस्ता लेकर "आवाज" रेडियो स्टेशन पर पहुँच गया .साथ में उसके माता पिता भी थे .वे स्टेशनके मुख्य अधिकारी से मिले .उन्होंने जिजकते हुए कहा ," सोरी ,अंकुर जी हम आपके जजबात समज सकते है पर खुशी किसीसे भी नहीं मिलती. और हम उसे जबरदस्ती ये कह भी नहीं सकते ."

"पर क्यों ?" अंकुर ने पूछा ,"उसके ख्याल सुनकर ही मैं आज मौत के मुंह से बाहर आ गया हूँ , तब क्या मैं उसका शुक्रिया भी नहीं कर सकता ? आप उसे एक बार पुरी बात बताएं ।मैं आपके जवाब का यहीं पर इन्तजार कर रहा हूँ ..."

शो ख़त्म करके जब खुशी बाहर आई तो साहब ने उसे पुरी बात बताई तो पहली बार किसीसे मिलने खुशी राजी हुई ।साहब उसके साथ बाहर आए तो अंकुर अचंभित ही रह गया . सौंदर्य की साक्षात् मूर्ति खुशी नेत्रहीन थी . वह अपना पुरा शो ब्रेल की स्क्रिप्ट पर ही करती थी .

अंकुर ने उसका शुक्रिया किया और अपना हाथ उसकी और दोस्ती के लिए बढाया । खुशीने खुशी से ये प्रस्ताव का स्वीकार किया . उनकी दोस्ती दिन ब दिन निखरती गई .

थोड़े महीने के बाद एक दिन अचानक अंकुर ने खुशी के आगे शादी का प्रस्ताव रखा ।

"देखिये अंकुरजी दोस्ती तक तो थी है पर मैं आपका ये प्रस्ताव नहीं स्वीकार सकती ।क्योंकि मैं नहीं चाहती की मेरी जिन्दगी किसीकी सहानुभूति और दया की मोहताज रहे .शायद इसी लिए मैं किसीसे मिलना पसंद नहीं करती थी ." खुशी ने अंकुर के प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा .

"लेकिन क्यों ? मुझे नई जिन्दगी बख्शनेवाली का जीवन मैं क्यों नहीं संवार सकता ?" अंकुर हार मानने वालों में से नहीं था ।

" देखिये अंकुर ,जब कोई रिश्ता बाँध लिया जाता है तो इस रिश्ते के साथ स्वामित्व की भावना भी अपने आप ही आ जाती है ।और रिश्तों के साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियां भी .शायद उस वक्त आपको मेरा ये काम और आवाज के द्वारा जुड़ी हुई सभी के साथ ये आत्मीयता बर्दाश्त न भी हो तो ? मेरी इस दुनिया से मैं बेहद खुश हूँ और शायद आपकी खुशी भी मेरी खुशी ही जुड़ी हुई है न ?" खुद्दार खुशी ने फ़िर रिश्ते से इनकार कर दिया .

"हम दोस्त थे और हमेशा रहेंगे ...मंजूर ?" खुशी ने दोस्ती का हाथ अंकुर की और बढाया जिसे अंकुर ने उष्मा के साथ थाम लिया ।

शायद खुशी सही कह रही थी ।दुःख और दर्द की और कई दास्तानों को इस प्रेरणा पीयूष की जरूरत थी .......अंकुर ये सोचने लगा .

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खुशी सेवानिवृत हो रही थी ।शाम को फेरवेल समारोह के बाद सबके साथ वह बाहर आई .बाहर अपनी गाड़ी लेकर अंकुर खड़ा था .

"खुशी , अब तो तुम मेरे साथ चलकर मेरी हमकदम बन सकती हो न ?" अंकुर उसका हाथ पकड़ कर उसे कार तक लेकर गया ।

"हम कहाँ जा रहें है ?" खुशी ने पूछा ।

" मेरी ऑफिस जहाँ पर मैंने नेत्रहिन् विद्यार्थियों के लिए संगीत सिखाने की एक पाठशाला खोली है । अब आज से तुम वहां की इन चार्ज रहोगी .ये मेरा तुमको तोहफा है .कुबूल है ?" अंकुर ने पूछा .

"हाँ , कुबूल है ..." खुशीने हंसते हुए इस तोहफे को कुबूल कर लिया ।

" खुशी , मुझे और मेरे घर को आज भी तुम्हारे आने का इन्तजार है ॥ अब तो तुम्हे कोई ऐतराज नहीं है ?" अंकुरने फ़िर वो ही सवाल दोहराया जो उसने २८ साल पहले खुशी से पूछा था ।

खुशीमें अब इस बे इन्तहा प्यार को नकारने की हिम्मत नहीं थी ...

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कहाँ है ? ख़ुद देखें ....

मेरे ख्वाब ...मेरे सपने ....पलकोंमें सजाकर रखे है ,

टूट जाना इनकी फितरत नहीं ,ये मेरी हर साँसमें समाये है ,

जब खुलती है मुंदी हुई पलकें ,वे दिलकी दिवार पर ख़ुद को तराश जाते है ,

और फ़िर इन ख्वाबोंकी ताबीर जुनूं बनकर जिंदगी का मकसद बन जाते है ........

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तुम्हे तनहा कभी छोड़ा नहीं है जरा झांककर देख लो एक पल ,

मेरे ख्याल मेरे सपने तुम्हारे सपने बनकर हर कदम साथ है .......

8 जून 2009

ये दिल भी ना...!!!!

ये दिल की कश्मकश भी कुछ अजीब है ,

पास है हम जिनके वही हमसे दूर से है ,

पास जाकर छूकर देखा तो अभी भी वो वहीं है ,

फ़िर भी लग रहा था वो कोसों दूर है ..........

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तुम्हारी चाहत की ये रिवायत रहेगी ,

दिल तोड़ना हरदम यही तुम्हारी फितरत होगी ,

फ़िर भी चाहते रहेंगे तुम्हे इस जनममें ,

ये ही हमारी हमेशा हसरत होगी ..............

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प्यार को समजनेमें शायद उम्र गुजर ना जाए कहीं ,

कभी दिल धड़क जाए देखकर किसीको तो है प्यार यही ,

कुछ पहली जिंदगी को कागज़ पर बूजाई नहीं जाती ,

बस उनमें उलज़ते उलज़ते ये ख़ुद ही सुल्ज़ जाती है .....

7 जून 2009

उनकी खुशीमें शामिल हो चले .....

आज अकेले थे ,तनहा भी थे ,कुछ गुमसुम, कुछ मायूससे ,

चलो इस मर्ज़ की दवा को आज खोज लिया जाए ,

गम भुलाकर अपने सभी

किसीकी खुशियों में तहे दिल से शामिल हो लिया जाए ...........

बस फिर क्या था किसीकी खुशियोंको देखा तो

हमारा दिल भी एक ताज़ी कलीकी तरह खिल गया ,

और क्या कहें हमें भी सच्ची ख़ुशी का पता ठिकाना मिल गया .....

किसीके दर्द बाँटने या किसीकी ख़ुशी में हम भी शामिल होने चल दिए ...

दुरी के कोई गम न रहा और उसकी नजरसे हमने भी देखा ,

चाहे हम नहीं हो कहीं उनकी दुनियामें कहीं उस वक्त ,

पर उनकी नजरसे हमने भी आज ख़ुशी के जाम पी लिए ,

भरी हुई आंखोसे देखकर उन्हें उनकी दास्ताँमें खुद को भी जी लिए ........

6 जून 2009

दहलीज से लौट गए हम .....

आज रोजकी तरह फ़िर सुबहमें उस दोस्त के घर गया ,

खुली खिड़कीसे झाँखा अन्दर तो कुछ बदला सा पाया .....

खुली आँखोंसे वह छतको था ताक रहा ,

वह था तो जागा फ़िर भी दिल उसका था कहीं खोया सा ......

दो पल के लिए जब आँखें मूंदता तो लब जैसे यूँही उसके मुस्कुरा जाते ,

कोई ख़याल प्यारा सा नाम बनकर किसीका दिल के दरवाजे पर दस्तक दे जाते ....

अकेला था घरमें पर महसूस हुआ तनहा नहीं वह आज ,

ख्वाब वह सजा रहा था प्यारा सा ,चलो आज उसे बुलाना नहीं .......

उसे उसके सपनोंकी दुनिया के साथ बस यूँही तनहा ही छोड़ दिया ,

मैं भी हलके से मुस्कुराकर आज उसके घरके दहलीजसे ही मूड गया........

5 जून 2009

फटे पुराने पर काम आते है हँसाने ...

when आई कॉल यू :
1 रिंग मीन्स आई एम् थिंकिंग ऑफ़ यु ...
2 रिंग्स मीन्स आई लाईक यु
3 रिंग्स मीन्स आई एम् मिसिंग यु
4 रिंग्स मीन्स आई नीड यु
5 रिंग्स मीन्स .. बहरे फ़ोन उठा !


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नारद मुनि धरती पर मदिरा पीने आए ,१२ बोतल पिलाने के बाद
ठेके वाला : आपको चढ़ती क्यूँ नही ?
नारद : मैं भगवान् हूँ .
ठेके वाला : चढ़ गई अब इस को !

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मायावती कम तो लल्लू 'स हाउस विथ अ गोट .
लल्लू : भैस्वा को क्यों लायी हो ?
माया : दीखता नहीं गोटवा लायी हूँ

लल्लू : हम गोटवा से ही पूछ रहा हूँ .

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हाई ! नीड वन गल टू मेरी ... एज नो बार
हाईट नो बार
कास्ट नो बार

बट ! गल्स फाधर मस्ट हेव हिस ओन्न बार ... चियर्स

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व्होट इस द्ध डिफरेंस बिटविन अ वूमन एंड मेग्नेट

मग्नेट्स हेव अ पोसिटिव साइड !

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दुनिया में बेवफाओं की कोई कमी नही
सूरज को ही देखो
वो आता है उषा के साथ
और जाता है संध्या के साथ ,
सोता है निशा के साथ और
उठता है किरण के साथ
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4 जून 2009

समय ....

समय !!!!!

घड़ी की टिक टिक सुनते ,अलार्म सुनते या मुर्गे की बांग सुनते हो रही है हमारी सुबह अब ...पर आँखें खुल नहीं रही है ..मन में प्यास है अभी एक घंटा सो लेते है ..पर एक मुरझाये चेहरे को लेकर उठाना और वही रोजमर्रा की दिनचर्या में जुट जाना ...सब कुछ है पर शायद समय नहीं ...आजकल ये शायद हर छोटे बड़े की एक समस्या ...बस जिंदगी को जल्दी से जी लो ...आज सब कुछ पा लो और कल आराम करेंगे ..आराम से जी लेंगे ...पर थोड़े से ज्यादा की प्यास किसी की बुझती ही नहीं ..और आख़िर कार एक दिन दिन रात चलते रहने वाली ये घड़ी की सुयिआं रुक जाती है ..थक जाती है ...घड़ी बिगड़ जाती है ....दूसरी नई घड़ी ले लो .......ये क्या है ...

१ =बच्चा ---बिचारे को खेलने को समय नहीं दिया जाता ,पतंग लेकर दोड़ना, रेत के घर बनाना ,कागज़ फाड़ कर थोडी नाव बनाना ...स्कुल के रंग लेकर दीवारों पर बचपन के चित्र बनाना ....मट्टी से पाँव गंदे करने का ....एक बचपन की अठखेलियों के साथ पुरी तरह से जीने का ........

२= युवा = आज उसे फुर्सत नहीं है ...अपने घर में ठहरने की ,नोट्स तैयार करने है ...गर्ल फ्रेंड को मिलने जाना है ..पॉकेट मनी लेकर दोस्तों के साथ जाना है ...घरमें दादाजी के टूटे चश्मे बनवाने है ..सोरी टाइम नहीं अभी ...करियर भी तो बनाना है ..फ़िर मुलती नेशनल कम्पनी में अच्छी जॉब लेनी है ...फ़िर अच्छा दहेज़ भी तो मिलेगा ...और फ़िर विदेश में सेटल होनी की भी सोचनी है ...अभी पढाई के विज़ा पर जाते है फ़िर वहां नौकरी लेकर वहीं रहेंगे ....

३= माँ बाप = दोनों व्यवसायी है ...खूब जल्दी पैसे बनाने है ,बच्चो का करियर भी बनाना है , विदेशी टूर कब करेंगे ? सोसाइटी में खूब ऊँचा नाम हो तो बात बने ...ऊँचे लोग तक पहुँच बढ़नी है , पार्टी अटेंड करनी है ...सोरी डार्लिंग आज हम थक गए है , आज हम आपके साथ शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे ...मंत्रीजी से मीटिंग है ...

४= बुजुर्ग = हमारे एक सुज्ञ वाचकश्री ने अच्छा सुझाव दिया ...ये बुझुर्ग लोग क्या करें ? शायद इनके पास ऊपर के सभी स्तर से होकर अब शायद समय ही शेष बचा हुआ होता है ...लेकिन अब इनकी शारीरिक ताकत जवाब देने लगती है ..आँख ,नाक ,कान ,दिल यानी की पुरा शरीर अब उनका साथ नहीं दे रहा ...अब घर के बाकी सदस्यों के लिए ये सिर्फ़ जिम्मेदारी ही समजे जाते है ...आज भी उनके ज्ञान और अनुभव आज की पीढी को काम तो आ सकते है पर इनके पास बैठने की किसीको उनके बेटों ,बहुओं ,बेटियों को या दामाद या पोते नाती को शायद फुर्सद ही नहीं होती ...और ये लोग भूल चुके होते है की जिंदगी की संध्या का सामना उन्हें भी कल करना पड़ेगा ही ...एक फ़िल्म याद आ रही है न !!!बागबान ...!!! जब शरीर काम नहीं करता ,अपने परायों सा दुर्व्यवहार करने लगे तो ये समय के साथ आने वाले मौत की प्रतीक्षा ही करते है ...जिनके नाम जायदाद ,और सम्पदा कर दी हो ऐसे संतानों के पास अब उन्हें देने के लिए वृद्धाश्रम की फीस तो होती है पर प्यार से बात करने का समय नहीं ....

समय रहते हुए ही आप कोई ऐसी प्रवृति अपने निजानंद के लिए ही करो ,थोडी धनराशि को कुछ संस्थाओं के लिए रखो वहां पर जाकर उसे प्यार दो जो प्यार के दो पलों के लिए जिंदगी भर से तड़प रहा हो - अनाथश्रम हो या वो बच्चे जिसे मेंटली चेलेंजेद कहते है ...नि: स्वार्थ भावना के साथ गुजारा हुआ ये समय शायद आपकी असली पूंजी बन सकता है और आपके वक्त का सही इस्तमाल भी ....

या फ़िर ,,बच्चों की फीस ,छोटी की शादी के लिए पैसे , बेटे की पढाई के पैसे , शायद कभी दो जून की रोटी के लिए खून पसीना बहाने में ही पुरा समय निकल जाता है ..दो तार कभी मिल ही नहीं पाते ...यूँही जिंदगी ख़त्म हो जाती है ...दिन साल में और साल एक उम्र में तब्दील होकर समाप्त हो जाता है ...उनकी अंजलि समारोह होते है पर जीते जी उन लोगों के पास बैठने का समय नहीं होता हमें ....

क्या सचमुच ऐसा है या हमने इसे इस तरह का पेचीदा बनाकर रख दिया है ??? समय मिले तो सोचकर जरूर देखें ...फुर्सत में कभी ...

आत्मगौरव

आत्मगौरव !!!!

ये शब्द का सहज अर्थ हम क्या समज पाये है ? आज ये छोटा सा सवाल है मेरा ...ये फिलोसोफिकल लगनेवाला ये शब्द हमारी सामाजिक समस्या का कारण है ।

छोटी थी तब टीवी खूब अच्छा लगता था ..तब तो खाली दूरदर्शन ही था ..जब समाचार आते वो खूब चाव से देखती ..मुझे रशिया के राष्ट्रपति हो या फ्रांस के हो ..एक बात आज तक अच्छी लगती है उनकी ...वे अपनी राष्ट्रभाषा की ही प्रवचन में प्रयोग करते है ..चाहे देशमें हो या विदेशमें ..एक अनुवादक उनके भाषण का अनुवाद करता रहता है ...और हमारे यहाँ ????

जैसी भी आती हो अंग्रेजी बोलना हमें बड़ा ही सम्मोहित करता है ...अंग्रेजी बोलने वालो से हम जल्द प्रभावित हो जाते है ....हिन्दी में बोलने वाला हमें "देसी " लगता है ....हमारे पास एक ही जवाब है ...इंग्लिश इज अ ग्लोबल लेंग्वेज और हमें ये आनी ही चाहिए .....हमारी मातृभाषा जो भी हो बच्चा अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ना चाहिए ...आज का बच्चा अपनी माँ से बेजिजक कहता है ..मम्मी सबकी मम्मी जींस -टी शर्ट पहनकर आती है तब आप बिल्कुल गंवार लगती है साड़ी पहनकर .....ये क्या है ????

सिर्फ़ आत्मगौरव का अभाव जो बचपन से हममें ठूंस ठूंस कर भरा जाता है .....हमें हमारे देश से दुसरे देश ज्यादा अच्छे लगते है ...दुसरे देश के लोग ,उनकी भाषा ,रहनसहन , फिल्में सब कुछ ......जब की अब ये हालत है की पाश्चत्य देश हमारी संस्कृति की और झुक रहे है ...और हम अभी वही राग आलाप रहे है ...कब तक ???

आज हमारा समाज जो जाती ,धर्म ,उंच नीच आदि से तो पहले ही बँटा है वह एक नए सिरे से बंट रहा है , बोली के आधार पर ....वर्नाक्यूलर में पढने वाला और अंग्रेजी जानने ,समजने वाला और बोलने वाला ....आपके पास गहरा ज्ञान न हो पर फर्राटेदार अंग्रेजी बोल दी ...आधा काम हो ही गया समज लो ,...जो भाषा बोलचाल की हो और पढने की अलग हो ...बच्चा बचपन से इस दोराहे में उलझ कर रह जाता है ...ऊपर से अच्छे मार्क्स का और टेंशन बढ़ा दिया है हमने ....

हमारा बच्चा अच्छे नंबर लाये तो अच्छा ...अच्छी चित्रकारी या मूर्ति कार बनने के लिए माँ बाप गौरव नहीं लेते ...एक लड़की ऐक्ट्रेस बनना चाहे तो बस हर तरह की पाबन्दी ...उसे टीचर ही बनना है ..हमारे बच्चो की जो विशेषता है उसके लिए हमें आत्मगौरव नहीं है ...

ख़ुद पर भी नहीं ....बाजु वाले ने मर्सिडीज़ ले ली और हमारे पास सिर्फ़ स्कूटर ही है !!!!!लज्जा आती है ...हम ये नहीं समजते की अपने आत्मा की आवाज के विरुध्ध जाकर कितने काले काम भी हो सकते है ये चमचमाती जिंदगी के पीछे ...ऐ सी कमरेमें उनकी रातें आंखोंमें बिना नींद गुजरती होगी , बिना नींद की गोली नींद भी नहीं आती होगी ...जो हमारे पास सहज उपलब्ध है ...बी पी ,डायबिटीस और न जाने कितने रोग की गोलियां उनके टेबल पर खाने की जगह सजी हुई होगी ....पर फ़िर भी हम लोग लघुता ग्रंथि से पीड़ित ही रहते है ...आत्मगौरव का आभाव .......

जापान ,चीन ,जर्मन ,फ्रांस ,रशिया जैसे कई देश आगे है ,विकसित है क्योंकि उन्हें जैसे भी हो अपने देश पर गौरव है , वे अपने देशके विकास के बारे में सोचते है ,उसके लिए अपने ज्ञान का प्रयोग करते है ,उन्हें अपनी भाषा ,लोग ,देश पर गर्व है और आत्मगौरव भी .......उनके विकास में मातृभाषा कभी बाध्य नहीं बनी होगी ...

अगर इंसान को अपने आप पर ही विश्वास न हो तो फ़िर दुनिया में कोई उस पर विश्वास कैसे कर सकता है ???

अपने आप पर विश्वास करो ..जैसे भी है हम अच्छे है ...एक खराबी है तो शायद कई सारी खुबिया भी है हम में ...

ये सोचना शुरू करें .....

और क्या कहें ???आप जो भी कोई ये पढ़ रहें है खूब समजदार है ही ...

3 जून 2009

शादी एक पवित्र रिश्ता

शादी ......!!!
दो अनजान या फ़िर जाने पहचाने व्यक्तियों के बीचके समाज द्वारा जो स्वीकृति की मोहर लगायी जाती है उस रिश्ते को हमने शादी का नाम दिया है ....
एक स्त्री और एक पुरूष वयस्क होते है तब वे एक अपना स्वतन्त्र घोसला या घरौंदा बनाने का ख्वाब देखते है ...शादी का बंधन उन्हें इस बात के लिए सामाजिक स्वीकृति भी देता है ....दुनिया के किसीभी देश में चाहे वह पछात हो या विकसित हर जगह इसे पुरा सम्मान दिया गया है ...
जैसे हम रोटी कपड़ा और मकान और व्यवसाय को जरुरी मानते है वैसे ही जातीय जीवन को भी एक अभिन्न अंग गिनकर ये रिश्ते को बांधना और पुरी तरह तन मन धन से समर्पित होकर निभाना ये हमारी मूलभूत जरुरत मानी गई है .......
फ़िर भी आधुनिक जीवन में ये रिश्ता खोखला क्यों लगता है ?
आर्थिक स्वतंत्रता : पुरूष और नारी दोनों ही आधुनिक दुनिया में आर्थिक रूप से स्वतन्त्र होने लगे है ...कल तक बात ये थी की नारी कम पढ़ी लिखी और आर्थिक रूप से पुर्णतः पुरूष पर निर्भर थी चाहे वह पिता हो या पति ....
वो ख़ुद को कमजोर नहीं समजती ...उसको ये नए पंख मिले है तो वह दूर तक उड़ना चाहती है ...यह बुरी बात तो नहीं पर इस बात का अंहकार भी उसमे पाया जाने लगता है तब प्यार की नींव पर बने इस रिश्ते की नींव हिलने लगती है ....और ये अहम् छोटी बात से शुरू होकर अलगाव तक पहुँच जाता है ...और ताज्जुब की बात है की इसे अब समाज स्वीकार भी करने लगा है ...कानूनन हक़ है ये मैं भी स्वीकार करती हूँ पर शादी एक प्यार और समर्पण का रिश्ता है जहाँ पर दोनों को ही अपने सभी पहलु को एक दुसरे को समर्पित करना होता है वहां पर वह शादी की वेदी पर अहम् को समर्पित नहीं करते और अपने साथ जुड़ी बाकी जिन्दगी के साथ भी खेल जाते है ....
सामाजिक स्वछंदता :जातीय स्वेच्छाचार को बढ़ते देखकर शादी का जो रोमांच होता था वह ख़त्म होता नजर आता है ...शादी से पहले खुलकर मिलने वाले दो व्यक्ति शादी तक तो अपने अच्छे पहलु को ही उजागर करते है ...पर शादी होने के बाद जब २४ घंटे का साथ बन जाता है तब उनके स्वभाव की त्रुटियां भी खुलकर सामने आ जाती है ...इस हाल पर उन्हें लगता है की उन दोनों का एक दुसरे के प्रति प्यार ख़त्म हो गया है ...पर हकीकत ये नहीं होती ...उन्होंने प्यार को बहुत ही छोटे मापदंड पर नापा होता है ...समर्पण को भूलकर ...फ़िर ये रिश्ता खींचता है और ये लोग जी भर के जी नहीं पाते ...जिंदगी कमजोर कड़ी लगती है ....क्या समय और महत्वकांक्षाओं की वेदी पर प्यार की बलि नहीं दे रहे है आज के सुधरे हुए लोग ........हम दुसरो के बारें में जरा भी नहीं सोचते है ...स्वार्थ ही देखते है तब ये रिश्ता ये शादी बेमानी हो जाती है ......
आज कल की परवरिश और अकेलापन जो रस्ते पर ये लोगों को ले जाता है वहां पर बहकना स्वाभाविक लगता है ...हमें किसीका सलाह मशवरा मानने में निचा लगता है ..यहाँ भी अहम् .......

शायद शादी का ये रिश्ता तो सरहद पर रहने वाले जवान की पत्नी को पूछो जिसकी राहों पर आँखे बिछ जाती है ...दूरियों पर भी नजदीकियां बन जाती है ....जहाँ पर एक ख़त सामने वाले के वजूद का साक्षात्कार कराता है ....



ये जिंदगी हमें सिर्फ़ एक बार मिलती है ....उसे नोटों की बलि मत चढाओं .....कुछ तो प्रकृति से सीखो ...क्यों हम प्यार और शादी को पैसे की बलि चढाते है ....अगर हम समजे तो अकेलेपन को दूर करने की चाबी तो हमारे पास है पर इसका सही इस्तेमाल हम जानते हुए भी करना नहीं चाहते ....

अकेलापन ....

अकेलापन!!!
आज की एक उभरती हुई समस्या जो कई और शारीरिक और मनोवैज्ञानिक समस्या का कारण बन चुकी है ...
आज का बच्चा नौकरीपेशा माँ बाप के साथ होते हुए भी भावनात्मक रूप से अकेले होते है ...छोटे परिवार की मुहीम को लेकर एक बच्चेवाले परिवारका बच्चा जो किसीसे कोई बात बांटना नहीं चाहता ...वो मानसिक रूप से अकेलापन महसूस करता है जो जिंदगीमें आगे चलकर एक समस्या बन जाता है ........
आज का युवा .....वो स्वतन्त्र होने के चक्करमें ,अपनी पाली हुई महत्त्वाकांक्षा के चक्कर में घर परिवार सबसे दूर जाकर अकेला पड़ जाता है वो शारीरिक और मानसिक रूप से अकेला पाता है ...पति पत्नी अपनी करियर में इतने बिजी होते है की कभी कभी घर उनके लिए रात रहने के होटल रूम की तरह बन जाता है ...और एक ही कमरे में दो अजनबी की तरह जीवन बन जाता है ...जो मानसिक तनाव का कारण होता है और फ़िर ह्रदय की तकलीफ का भी ....ये अकेला पन और उसके परिणाम अलगाव और तलाक़ की तकलीफ में तब्दील हो जाते है ...ये अकेलापन कभी कभी जानलेवा भी साबित होता है ....
और अब बात बुजुर्ग परिवार जन की उनकी तकलीफ पर हम इतना लिख और पढ़ चुके है जिसकी कोई सीमा नहीं ....जैसे कल के ब्लॉग में बात की थी की उसकी जड़ या नींव हमने ही बनाई होती है और उस ख़ुद के खोदे हुए गढ़धे में हम ख़ुद ही गिरते है ...
ये अकेलापन बहुतायत भावनात्मक होता है ...अब सिर्फ़ अपने ही नहीं जो अगर हमें कोई हमारे विचारो से मेल खता मिलता है तो वह भी हमें अपना ही लगता है ...उसे खून के रिश्ते से न जुड़े होने के बावजूद अपने अकेले पन का साथी बना लें ....
छोटे बच्चोके साथ खेले ...
सुंदर चित्र बनाने की कोशिश करिए ...
अच्छी किताबें ले और उसे अपनी दोस्त बना ले ...जिंदगी बदल सकती है ......
कुदरत के साथ समय बिताएं ......

2 जून 2009

हमारा कल हमारा भविष्य..........

हमारा बचपन आज और कल .......

आंखों पर मोटे चश्मे होना आज आम बात हो गई है । टी वी के सामने एक कटोरे में आलू के चिप्स लेकर घंटो तक कार्टून देखना भी आम बात है । क्रिकेट अब मैदान पर कम बच्चे खेलते है और विडियो गेम्स ज्यादा खेली जाती है । स्कुल के लंच बॉक्स में मेगी नुडल्स होते है पराठे और चटनी गायब है । आज मार्क शीट स्टेटस का प्रतिक है माँ बाप के लिए उसकी सेहत नहीं । जब एक बार कभी ओलम्पिक में कोई मैडल जीते तो कुछ दिन के लिए उस खेल के बारे में दीवानगी देखी जाती है और फ़िर वो ही रफ्तार । लेटेस्ट कपड़े ,गहने ,इलेक्ट्रॉनिक चीजें और कार न होना शर्म की बात है । पर १ अबज से ज्यादा आबादी वाले देश में ओलिम्पिक में इतने कम मैडल आने की शर्म किसीको नहीं । स्कूलें अब मुनाफे का जरिया बन गई है .वहां से अब लाखों की कमाई के सपने लेकर मृगजल की बुँदे निकलती है और जिंदगी तपिश में सिर्फ़ मायूसी पाकर जिंदगी से हताश हो जाती है ॥

सीधी जिंदगी न माँ बाप को रास आता है न बच्चे को । एक विभक्त परिवार में आया के हाथ में बच्चे की परवरिश और खाना पकाने वाली औरत अलग से ...फ़िर कल उठाकर जब वृध्ध आश्रम में दाखिला होता है तब हम इस पीढी को कोसेंगे जी भरकर ...अरे प्यार ,मोहब्बत और भावनाओं को सिखाने की उम्र में हम नोट गिनने में रत थे । और नौकरों के हाथ गृहस्थी सौंप कार निश्चिंत हो गए थे ....सिर्फ़ बातें ही की है हर मौके पर अब परिणाम से डर लगता है ...

कहते है जो बिज बोते है उसका ही फल उगता है ..बबूल के पेड़ पर आम का इंतज़ार कैसा ???बस यही तो जिंदगी है ...आज कल के दूसरी कक्षा के बच्चे भी बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड का मतलब ...आधा अधुरा सेक्स का ज्ञान टी वी चेनल के जरिये पा लेते है और जिंदगी और जवानी दोनों सही मार्गदर्शन के आभाव में बरबाद हो जाते है ....

इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? हम , शिक्षण, संस्थाएं ,बदलता माहौल या ख़ुद समाज ....कहाँसे सुधार हो सकता है सब जानते है मगर पैसा ये पैसा ...सब खरीदता है मगर कैसा ??????

1 जून 2009

ऐसा क्यों ???

एक जुनूं जिगरमें ,

फ़िर भी ये कदम रुक जाते है ....

कहने को अभी कोई बात है दिलमें भी ,

फ़िर भी ये शब्द आज नि:शब्द हो जाते है .....

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हम कुछ कहते नहीं कुछ भी ,

फ़िर भी आप कुछ समज लेते हो ,

बिन मांगे ही कुछ सुकून

इन बेताब धडकनोंको बख्श देते हो .....

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आपसे जुदा होने की बात इतनी बेकरारी है दे रही,

आपसे मिलने पर भी कुछ सुकून नहीं आज ,

कुछ गुजरे पलमें ख्याल चले जाते है ,

कुछ आने वाले जुदाई के पल के ख्याल रुला जाते है ......