31 जनवरी 2009

उडी बाबा ये होरर स्टोरी ...



ये एक होरर लव स्टोरी है ...

लेकिन है डरना मना है ,मैं एक भूत हूँ , अगर डर लगे तो आ गले लग जा

मैं प्रेम की दीवानी हूँ डरना मना है ।

आग और शोले से भरी जो एक अजनबी थी ,जो एक हसीना थी उसकी दर्द भरी दास्तान हूँ ...

मैंने इश्क तो कर लिया पर सनम बेवफा निकला ।

जिसका इंतजार करती रही रात भर अंखियों के झरोखोंसे ...

वह तो किसी और का दीवाना निकला ।

मैंने अपनी खून भरी मांग से उस जंगली ,जानवर , पगला कहीं का आशिक जो था कभी मेरा पति सिर्फ़ मेरा है, नहीं, था उसे आवारा ,पागल ,दीवाना बनानेकी हेराफेरी करने की ठान ली ...

उसे पूछा वो कौन थी ?

जिसे देखकर मुझे अब यूं लगता है मैंने प्यार क्यों किया ?

मेरे पास मरने के अलावा आखरी रास्ता न था ...

लेकिन अब मैंने हिम्मत करके तुम्हारे घर का दरवाजा खोला ,

मैंने तुम्हारा मर्डर कर दिया और अब हम दोनों भूत है और हम साथ साथ है ......



ये ही इश्ककी रिवायत है ...




खुशियों को जताने की ये कैसी अजीब सी रिवायत है ?

मुस्काते इन लबों के साथ क्यों अश्कों की इबादत है ?

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मोहब्बत पर मिलन या जुदाई की कोई शर्त नहीं हुआ करती,

मिलन होता नहीं हर इश्क की दास्तां का अंजाम ,

पर इतिहास के सफे पर लिखी गई हर दास्तां ,

अमर हो गई जो जुदाई के अंजाम पर ख़त्म हुई थी .......

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तुम्हारे ईश्कमें तुम्हारे ख्याल के बिन कुछ आया ही न था ,

एहसास को तुम्हारे हमारे दिल से कभी जुदा कर पाया ही न था ,

इश्क की खुशबू का आलम ये था की ख़ुद ब ख़ुद फैलती चली गई ,

बिना ताज के बनाये ही हमारी मोहब्बत की दास्तां सुनहरे सफों पर लिखी गई ...

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30 जनवरी 2009

शहीद दिन :३० जनवरी



सुलगती सांसोसे आंखो में तपिश छा गई है ...

दिल टूटने का गुमां है ये की अश्कों की टूटने पर बंदिश आ गई ॥

आज फख्र है तुम्हारी जिंदगानी पर जो एक उम्दा मिसाल बनी ...

कायम रहेगी यहाँ की सरजमीं पर दास्ताँ जो तुने खूनसे लिखी ॥

चैनकी नींदे बख्शते रहे तुम अपनी रातोंकी नींदे कुर्बान कर ,

नत मस्तक होता है हमारा शीश अय सरहद के रखवाले ....

फिरभी जलन है एक दिल में!!

जान तक फना कर गए जिस पर ,

कुर्बानी तुम्हारी समज पाने को तख्त नशीं लोग लायक भी है ???

बुलेट प्रूफ़ बख्तर को सजाकर छाती पर रक्षकों से घिरे निकलते है बाहर ,

हमारी आजादी की रक्षा क्या इन कायरों के हाथों में है ??

अपनी तिजोरी को भरने के लिए वो तुम्हारे कफ़न भी बेच आयेंगे ,

अपने स्वार्थ की ताक पर वो तुम्हारी लाश का भी सौदा कर जायेंगे ....

बारूद के गोले भी शरमाते है जिनकी सौदेबाजी की करतूतों पर ,

क्या करे ये कलम बिचारी ?

जो अकेले में यूं कागज़ पर रो लेती है .....

हम भी मजबूर है पर क्या करें ??

तुम्हारी तरह सैनिक बनने को हमारा दिल भी करता है ,

पर मल्टीनेशनल में पगार वहां से ज्यादा मिलती है ...

29 जनवरी 2009

ऋषिकेश



अब हम जा रहे है अपने इस भ्रमणके तीसरे पड़ाव की ओर ....


जैसे की आपसे मैंने पहले भी बताया था की मेरी सबसे पसंदीदा जगह है ऋषिकेश हरिद्वारसे तकरीबन २०-२५ किलोमीटर की दूरी पर है रेल का एक सिरा जाता है देहरादून की ओर पहाडोंमें और दूसरा ऋषिकेश की ओर ...लेकिन हरिद्वारमें हरकीपौडी के किनारे से लगे शटल रिक्षाएँ भी एक बेहतरीन जरिया है ऋषिकेश पहोंचनेकागंगा नदी का साथ कुछ पलों के लिए जरूर रहता है आगे चलकर आती है गंगा की मुख्य धारा जहाँ से उसका हरिद्वार की ओर रुख होता है इस जगह से समयानुसार उसकी गति को भी संतुलित करने की ओर कभी जरूरत पड़ने पर प्रवाह को साफ सफाई के लिए बंध करने की भी व्यवस्था है आगे चलकर मन्दिर एवं आश्रमों की कतारों को भी आप देख सकते हो आगे जाने पर बांयी ओर शान्तिकुञ्ज -माता गायत्री का धाम है यहाँ भक्त जन साधना करने आते है जिनके रुकने की सुचारू व्यवस्था है ...


अगर आप रिक्शा में सवार है तो दायें बांये देखने का सिलसिला जारी रखिये क्योकि यंही से शुरू हो रहा है पर्वताधिराज हिमालय का साम्राज्य बहुत ही हलके से वह अपने पंख पसारना शुरू करते है अगर पैकेज टूर में आए लोगोंसे आप पूछेंगे की ऋषिकेश में आप कन्हा गए ? तो ज्यादातर जवाब होंगे -लक्ष्मण जुला , रामज़ुला,गीता भवन .... पर यह सब जगह ऋषिकेश से थोड़ी सी दूरी पर है और उस जगह का एक खास नाम है "मुनि की रेती "॥


हम आ गए है ऋषिकेशमें अगर आप दौड़ती हुई शहरी जिन्दगी से थकान महसूस कर रहे हो तो यह जगह आराम का अच्छा पर्याय बन सकती है यहाँ यात्रिओं की धूम नहीं मचती , कुछ घंटे के लिए आते है और हरिद्वार या बदरीनाथ के लिए चल पड़ते है यहाँ हम माया कुण्ड नामक जगह पर एक हनुमानजी के मन्दिर में ठहरे थे एक छोटा सा कमरा मिलता है मन्दिर के नीति नियमों का पालन श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए सुबह और शाम भव्य आरती होती है मन को शान्ति देने वाली सुंदर जगह है यहाँ से पैदल सिर्फ़ पाँच मिनट की दूरी पर पतित पावनी गंगाजी की धारा है ...


एक पक्के बंधे हुए विशाल घाट पर सीढियाँ चढ़कर जब ऊपर आते है तो दर्शन होते है गंगामैया के ... यह जगह का नाम है त्रिवेणी घाट एक छोर पर है शिवजी की जटासे निकलती गंगा की मनोहर प्रतिमा और मध्य में है अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए श्री कृष्ण की मनोहारी विशाल मूर्तियाँ एक रथ में सवार और एक विशाल गंगा माता का मन्दिर घाट पर चलते हुए दुसरी और की सीढियाँ उतरते है तो आ जाती गंगानदी यहाँ आपको गंगा का प्राकृतिक रूप देखने को मिलेगा प्रवाह की गति तो तेज है ही लेकिन यहाँ ये आम नदियोंकी तरह ही बहती है उसके शीतल जल में पाँव रखते ही मन प्रसन्न हो जाता है यहाँ पर ऋतू अनुसार शाम सात से साढे सात के बीच गंगा माता की भव्य आरती होती है प्रवाह में दीप बहाए जाते है काफी भीड़ रहती है पर विशाल किनारे पर सब शान्ति से देख सकते है लगभग सात बड़े बड़े आरती के पित्तल के दिए से निकलती हुई परम ज्योत की तो आप कल्पना कर के देखिये ....


यहाँ से बांये हाथ पर ही पहाड़ों की शृंखला शुरू हो जाती है सुबह के वक्त भी साढ़े सात का वक्त आरती के लिए होता है यहाँ स्नान करने का महिमा और आनंद ही कुछ ओर है यहाँ का स्नान तेज प्रवाह और जंजीरों से जकडा हुआ नहीं है पास में ही साफ सुथरे बाथ रूमों मैं कपडे बदलने की व्यवस्था है शामके वक्त आरती में यहाँ कई विदेशी लोगों को भी शामिल होते हुए देखा जा सकता है ...


यहाँ मेरी मुलाक़ात दो विदेशी महिलाओं से हुई जो अमेरिकासे आई थी काफी कुछ बातें हुई वे भारत से काफी प्रभावित थी ऋषिकेश की एक देखने लायक जगह है भरत मन्दिर शांत ,सुंदर और सुरम्य है जो कोई राजा भरतकी याद में बांधा गया है वहां सब लिखा हुआ है एक ओर अय्यपा मन्दिर है जो बहुत सुंदर है पूरे ऋषिकेश में हमें कोफ़ी पिने ढूँढते हुए यहाँ तक आना पड़ा था अगर फुर्सत हो तो ऐसी जगह पर हमें तीन चार दिन ठहरना चाहिए यहाँ टहलते हुए सिर्फ़ चलकर ही घूमने का मज़ा ही कुछ और है हम यूँही टहलते हुए रेलवे स्टेशन के अन्दर तक घूमने निकल पड़ते थे एक अनजानी जगह पर जहाँ हमें कोई पहचानता न हो वन्हा बेफिक्र होकर घूमना एक अनोखा अनुभव है बाज़ार में सभी चीज वस्तुएं उपलब्ध हो जाती है हिमालय में बसे हुए विभिन्न स्थानों के लिए बस भी यंही से चलती है मॆं चाहूंगी की आप भी ऋषिकेश में कभी मेरी तरह गंगा नदी को सही मायने मॆं महसूस करें साफ गंगा[थोड़ी सी गंदगी हैं जो माफी के लायक है ],प्राकृतिक गंगा ,तेज गंगा , शीतल गंगा जहाँ हम हर सुबह और शाम तकरीबन दो दो घंटे उसे निहारते हुए बैठे रहते थे ....


तो अब अगली बार हम मिलेंगे मुनिकी रेती पर ....

सपना बनकर सो जाने दो ...


काजलकी काली लकीरने तुम्हारी आँखें सजा दी थी ,

जब सामना हुआ तुम्हारा हमारा आज तो क्या हुआ !!!

दरिया छलक रहा था मोती बनकर पलक से तुम्हारी

काजल बाँध तोड़कर बह आया बाहर पलकों से ,

वो काली सी ,धुंधलीसी ,संदली सी लकीर एक

सज गई तुम्हारे चेहरे पर ऐसे दाग जैसे चाँद पर !!!!!!

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पंछीके पंख पर बैठकर मुझे थोड़ा उड़ने दो ,

झरनोंकी तेज धारों पर मुझे छलककर बहने दो .........

छुपी है अम्बिया पर जो कोयल उसकी कुक सा चहकने दो ,

मयूरके पंखो के रंगमें घुलकर थोड़ा सा नाच लेने दो .......

एक छोटेसे बच्चेकी आंखोंमें सपना बनकर सो जाने दो ,

सदा ये आ रही है किसीकी इंतज़ारमें मेरे ,चलो मुझे वहां पर जाने दो ......

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28 जनवरी 2009

वक्त न रुकेगा कभी




कत्ल करते हो और कहते हो मुज़रिम नहीं ?

एक अदा होश उड़ने के लिए काफ़ी है और कहते हो ये साजिश नहीं..............

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वक्त नहीं रुका है कभी ,

ना कभी रुकेगा किसीके लिए ..

दिल रह गया था उस मोड़ पर ,

जहाँ कभी आप छोड़ गए थे ....

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सुना था हमने बहते वक्त के साथ रिश्ते पकते है ,

लेकिन हमने महसूस किया वक्त के साथ रिश्ते थकते है ,

जब एक खुबसूरत मोड़ पर जाकर ये रिश्ते रुकते है ,

बिना कुछ बोले रुकते ये रिश्ते कभी कभी जचते है ....

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27 जनवरी 2009

हम तो पहली बार मिले


ये क्यों सोचे कि इतने सालोंसे मिले ?

हर सुबह बस यूं ही सोचे ,

हम तो पहली बार मिले ...

कभी गुस्ताखी ,कभी रूठना ,कभी मानना ,कभी मनवाना ,

कभी प्यार ,कभी इन्तेजार ,

बस वक्त भरे हममें यूं ही रंग हजार ...

कभी डोर बन जाए ,कभी पतंग ,

हवाओंसे बातें करते हुए भी जमीं से हर बार मिले .....

मिलनेका मजा हर वक्त यूं पहली बार सा लगा ,

जब बिरह के बाद हम हर बार मिले .....

25 जनवरी 2009

वो अनजान चेहरा ......



कभी कभी ये अश्क खामोशीकी जुबां बनते है ,
आंखोसे बहते है मगर हाल दिलका बयां करते है ....

देखो बाहर खुले आसमांमें चमकता सूरज है ,
पर कभी सुरमई बने ऐसे पल आंखोंसे अचानक बरसते है .....

आज पूछो एक सवाल अपने दिलसे भी क्या मिलनेसे ही रिश्ते बनते है ???
कभी कभी न मिलनेवाले अनदेखे चेहरे भी तुम्हारे दिलको पढ़ लेते है ....!!

पूरा दिल का ये मकान एक जो रिश्तोंसे भरा हुआ होता है ,
तभी एक चेहरा रेतमें पानीकी तरह जगह बना लेता है ......

कभी तनहा हो ,कभी खामोश हो ,कभी उदास हो ,
तब वो चेहरा दिलसे बाहर आकर तुम्हारे अश्क पोंछ देता है ...........

24 जनवरी 2009

आसमांमें देखो बाहर ......



आसमांमें देखो बाहर जाने कितने
तुम्हें बिखरे लब्ज़ नजर आयेंगे ,
उतार लो उसे दिलकी आंखोंसे पढ़कर कोरे कागज़ पर
तो ये नज़्म नजर आयेंगे ....
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बिखराती लहराती ये झुल्फोंको समेट लो जरा ,
घडीभरके लिए फलक हमें जरा ये चाँद तो नज़र आए ....
इस जमींको इस आसमांको रोशन कर दो नजरें उठाकर ,
तो आपकी आंखों के खुबसूरत सपने भी हमें नजर आयेंगे .......
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दर्द तो बिकता है यहाँ हर गली हर मोड़ पर ,
खुशियोंकी फुहारें तो बहुत ही कम को नसीब होती है ,
अपने होठोंकी मुस्कुराहटोंको बांटते रहो हरदम ,
हर निगाहोंको जो नम होती है ......

23 जनवरी 2009

तुम्हारे लिए ..........



तुम्हारे लबों पर जीतकी हँसी देखने ,

चलो आज मैं हार बन जाती हूँ ........

तुम्हारे घरमें एक सूरज रोशन करने के लिए

चलो मैं आज अँधेरी रात को अपनाती हूँ ....

तुम्हारे बुझे हुए उम्मीदों के दियोके लिए

चलो मैं आज एक दीपक बन जाती हूँ .....

तुम्हारे नासूर बने ज़ख्म बर्दाश्त नहीं मुझे ,

चलो मैं उन ज़ख्मों का मरहम बन जाती हूँ ...

तुम्हारे चेहरे पर छाते है जब गम घटा बनकर उसे बिखराने

चलो आज मैं सूरजसे चुराकर बादल बारिशकी बूंद बन जाती हूँ .....

तुम्हारे आँचलको भिगोकर उन बूंदोंसे

चलो आज मैं तुम्हारे सारे दर्द पी जाती हूँ .......

तुम्हारे होठोंको मेरी मुस्कान देकर

चलो आज तुम्हारे दर्दसे डूबी हुई एक ग़ज़ल बन जाती हूँ ......

22 जनवरी 2009

हर रात अजीब इत्तेफाक होता है ......



हर रात एक अजीब इत्तेफाक होता है
आप जब याद आते हो एक सितारा चमकता है,
ढूंढती है निगाह और सामना आयनेसे होता है,
उसमें अक्स हमारा नहीं आपका होता है.........

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जब खयालोंमें विरानीयां नजर आती है,
बहार बनकर उसमें याद आपकी समाई,
तनहा नहीं कोई मंझर इस जिंदगीका अब,
जहां कदम हमारे बढे आपकी दोस्ती साथ नजर आयी......

वो सदा खामोशीकी थी ......


शब्बे हिजर का कैसे बयां करे हम आपसे ?
ख्वाबोंमें तुम्हारा तसव्वुर किया हमने ,
इकरारे मोहब्बत कर बैठे हम शायद गुस्ताखी कर गए हम ,
गुफ्तगू ख्वाबोंमें की जो तो ये गुस्ताखी का होना लाज़मी था ....

सहरको जब खुली आँखें हमारी ,
खुली खिड़कीसे चिलमनके पीछे छुपकर ,
झांखता हुआ तुम्हारा रोशन चेहरा देखकर ,
हमारा होश खोना और दिल का खो जाना लाज़मी था ......

और बयां कैसे करें हम ये इश्क की दास्तां तुमसे ???

आगाज़ पर खड़ी थी खामोशी ,अंजाम पर खामोशी रुक गई ,
इब्तदा चली इश्कमें खामोशीसे अगले मकाम तक ,इन्तेहाँ खामोशी बन थमी ,
आगाज़से अंजाम तक , इब्तदासे इन्तेहाँ तक ,
हमसफ़र बनकर चलती रही इश्कमे हमारे वो सदाकी जुबान खामोशी थी ....

21 जनवरी 2009

ये जिंदगी आपकी अमानत है ..........



कभी फुर्सतमें मिलते हो ,कभी फुरकतमें मिलते हो ,

कभी भरे बाज़ारमें मिलते हो , कभी ख्वाबोंमें दिखते हो ,

कभी लब्ज़ भर कुछ कहते नहीं ,कभी आंखोंकी जुबांसे बोलते हो ,

ये जिंदगी आपकी अमानत है ,ये कहानी खामोशीसे कहते हो ............


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इनकार नहीं किया कभी ,इंतज़ार नहीं किया कभी ,

इकरार किया नहीं कभी फ़िर भी हम पर ऐतबार कर लिया अभी ....???

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एक कोरे कागज़ पर उभरी हुई तसवीर थी तुम ,

एक रात देखा एक सुनहरे ख्वाबकी ताबीर थी तुम ,

एक अंजाम जो खुशफहमीका सोचा था उसका आगाज़ थी तुम ,

एक सच जो सिर्फ़ ख्वाबमें ही अच्छा दिखा था आज हमारी बीवी हो तुम ....

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please change the word woman and read as under :

w.o.man means world of man .......

20 जनवरी 2009

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!



आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी थी । तब मेरे एक अच्छे दोस्तने मुझे एक ऐसा लेख पढने दिया की मैं उसी वजह से ये लिख पायी ..............

मैं यशोमी हूं. उम्र है २२ साल . लेकिन उम्रका १६वा साल जैसे मुज पर रुक सा गया है. वह सपने देखनेकी उम्र थी. और यह उम्र है सपनोंको साकार करने की.मेरे साहित्यके शौकने मुझे एम. ए. करने को मजबूर कर दिया था. शेक्सपियरसे लेकर मुन्शी प्रेमचन्द तकका अद्भूत सफर.... उर्दू सीखने का जूनुन अब मुझ पर सवार है लेकिन कुछ अल्फाजभर ही समेट पायी हूं अपने दामनमें. लेकिन मैं यशोमी हूं अपनी तदबीरसे लकीरें खींच ली है चाकूसे अपनी हथेलियों पर कतरा ए लहू तकदीर ले आयेगा भले ही अश्कोंकी शरीके हयात बनना पडे मुझे.

अरे मैं यशोमी ऐसी ही हूं मैं ....कलमबंद कर लेती हूं अपने जजबातोंको सूर्ख स्याहीसे कागजों पर जो आसमान पर मेरी दास्तां लिख जायेंगे. ख्वाबोंकी तस्वीरमें उभर रहा है एक अक्स धूंधला सा अभी ,जिसका इंतजार अभी है और बाकी..खयालोंकी बगीयामें एक अधखीली कली सा....

हां मैं यशोमी हूं . ऐसी ही हूं मैं... आप मुझे देखने बेताब हैं ना ? ये देखो आयना है. देखलो इसमें अक्स मेरा...ये मेरी मोटी मोटी कंवलसी आंखे खुदमें एक नीली झीलको छुपाये हुए हैं...मेरे होठोंको कमलकी पत्तियां कहते हैं सभी.. तीखी नाक और ऐसा ही मिर्ची जैसा मिजाज है मेरा. .. मेरा हल्कासा सांवरा रंग लाल बिंदीसे और भी खील जाता है..मेरी ये नाजुक गरदन जैसे एक सुराही ऐसा मैं नहीं लोग कहते हैं..मेरे दुबले पतले छरहरे बदन पर एक करिश्मायी असर तब होता है जब काजलकी लकीर आंखोके समुन्दरमें हजारो बल खाती है और तब ये लगता है जैसे आंखे एक दर्दीली गजल गाती है. मेरी जुल्फें काले बादलोंसे घीरी रातोंकी दास्तां दोहराती है. जब लट एक आकर रुकती है चेहरे पर तो शायरकी शायरी बन जाती है. ख्वाबोंकी दुनियामें परी बननेके एक अजीब से शौकको हवा दे चुकी हूं मैं... अब तो इंतजार है एक शहजादेका जो सफेद नहीं नहीं काले घोडे पर सवार होकर आयेगा उसीका................

मांको कल रात ही बाबुजीको ये कहते हुए सुना था. स्वर अब दो ही महिनेमें लौट रहे हैं अमेरिकासे. उनकी बहनके घर मैं एक जलसेमें शामिल होने गयी थी. तब वहां पर खींची गई गई कुछ तस्वीरे उनकी बहनने ई मेलसे स्वरको भेजी थी.फोन पर हुई बातोंसे ही उन्होंने मुझे अपने दिलमें बसा लिया था...
रुख कर चुकी थी मैं उस अनदेखे अनजाने चेहरेको एक शब्ददेह ओर जिसे मैने कभी देखा भी न था.

ऐसी ही हूं मैं यशोमी...ये सारे जजबातोंको मैं अपनी एक नीली डायरीमें कैद कर लेती हूं..५ फीट ११ इंच लम्बा कद, एक संपूर्ण कहा जा सके ऐसा डिल डौल ,कद काठी...चेहरे पर दो आंखे जो कभी होठोंको बोलने की जहेमत ही ना देती हो. एक नजर करारी वाबस्ता थी उनके चेहरे पर जिसके तीर सीधे दिल पर ही वार करते थे. पलभरके लिये भले रुके हम पर पर दिलमें रुक जाती थी उम्र भरके लिये... क्रीम कलरका सिल्कका कुरता और चुडीदार. एक उपवनमें बांससे बने झूले पर बैठकर गालिबकी रुबाईयां पढते हुए दिलकी नजरसे देख लेती हूं मैं उन्हें....मेरे कदमोंकी आहट सुनकर धीरेसे उन नजरोंका उठ्ना और मेरे चेहरे पर रुकना ...पूरे बदनसे जैसे बिजली दौड जाती है...माशाअल्लाह ... ऐसे ही खयालोंकी दुनियाको शब्ददेह दिये जाती हूं....

इंतजार होता है मुझे हर शबका.. छत पर झूले पर सोते हुए आसमानको निहारना.चांदकी डोलीमें सवार सितारोंकी कुछ नज्मों को सुनना...उस पलोंमें जीकर मिलती हूं मेरे ख्वाबोंके शहजादे को....
मैं उन्हें प्यारसे शृंगार कहती हूं..शृंगार.. ये वो नाम है जिससे मैं और सिर्फ मैं ही उन्हें पुकारुंगी..

अबतो मेरी डायरी भी भर चूकी थी उनके नाम शेरो शायरी लिखते हुए.उन्हें कभी न दिखा पाउंगी मैं ये जजबात क्योंकि शर्मोहया से दामन अभी छूटा नहीं मेरा.

खयालोंमें आते हो जब पलकें झूकती है हयासे,
लब कैसे पुकारें उन्हें नामसे, अल्फाज गलेमें ही रूक जाते हैं....

जब आयेंगे और हाले दिल अपना बयां करेंगे उनसे,
तब चांद सोयेगा नहीं और सूरज भी उगना भूल जायेगा....

इंतजार का लुत्फही कुछ ऐसा नशा लाया है,
डर है उनके आने पर ये नशा उतर ना जाये....

ये है मेरा शृंगार जो मेरे जहनमें बस चुका है....अब उनके आनेमें सिर्फ दो दिनका वक्त बाकी है जब विसाले यार होगा ...सपनोंके शहजादेका दिदार होगा...शृंगारसे यशोमी का सामना होगा...........

इन दिनों शहरमें एक प्रदर्शनी लगी हुई है. बडे चर्चे हैं इसके लोगोंकी जुबां पर. वैसे मेरा भी कुछ नाता रह चुका है इन रंगसे -केनवास से - ब्रश से. रश्माली मेरी छोटी बहन है. उसे लेकर मैं ये प्रदर्शनी देखनेके लिये जा पहुंची. पांच चित्रकारोंके ७५ चित्र प्रदर्शित किये जा रहे थे. बाहर बडे से बोर्ड पर सभी चित्रकारोंके बारेमें विस्तृत जानकारी लिखी हुई थी. आज ये प्रदर्शनीका आखरी दिन था. और आखरी घंटे में एक अनोखी स्पर्धाका आयोजन किया गया था. हर चित्रकार दो घंटेमें अपना एक और चित्र प्रेक्षकोंकी उपस्थितिमें बनाने वाला था. वहांके सारे चित्र उंचे दामों पर बिक चुके थे. पूरी जनता जनार्दन पहले मजले की प्रेक्षकदीर्घामें बैठ चूकी थी. नीचे पांच केनवास, रंगोकी पेलेट्स, और ब्रशोंके गुलदस्ते सजे थे....
अब हर कलाकारने अपने भीतरके अतिउत्तम स्पंदनको ब्रशके जरिये केनवास पर धडकाना शुरु कर दिया..पूरे हॉलमें नितान्त शान्तिका समां था. इस शहरकी कलाकी कदरदान जनताने अपने मोबाइल फॉनको स्वीच ऑफ कर दिया था. एक रंगोत्सवके सब मूक साक्षी बने थे.
दो घंटोके बाद जनताको नीचे आनेकी अनुमति दी गयी. ये पांचो कलाकृतियोंको सर्वोत्तम कहा जा सकता है.
जरा इधर थोडा गौर फरमाये ..ये कलाकार इस प्रदर्शनीमें शामिल होनेके लिये दक्षिण आफ्रिकाके डरबन शहरसे आया हुआ है. मूलतः भारतीय इस कलाकारके मां बाप भारतके ही है. तीन साल पहले अपनी कलाकी साधनाके अंतिम चरणमें भारतीय चित्रकला और उसकी विविध परंपराके अभ्यासको इसने अपने संशोधनका विषय चुना था. दिल्हीके एन आइ डी के प्रधानाचार्यकी सीधी निगरानीमें वह संशोधन कर रहा है...

एक कांचकी केबिनमें बैठकर सभी कलाकार जलपान कर रहे थे.वे बाहर लोगोंके हावभावोंको पढ सकते थे पर लोग उन्हें नहीं देख पाते थे. यशोमी थोडी देर वहां पर रुकी रही. जब भीड बिलकुल कम हो गयी तब वह सब चित्रोंको देखने आयी. जब वह पहले चित्रको देख रही थी तब वह कलाकार उसे देखकर उठकर बाहर आ गया और जोरसे उसने पुकारा...
" यशोमी......."
यशोमीने पीछे मुडकर आवाजकी दिशामें देखा.उस वक्त जिस अदासे उसने मुडकर देखा वही अदा आखरी चित्रमें हूबहू कैद हो चुकी थी उस कलाकार द्वारा और चेहरा भी वही था...
जब यशोमीने भी उसे देखा तो उसके नाजुक लबों से एक आवाज सरक कर बाहर आयी ...
"शृंगार....."

हां ,इस कलाकारका नाम था शृंगार चतुर्वेदी....
यशोमी उसके जहनमें उभरी प्रेरणा थी और यशोमीके रुबरु खडा था वही शब्दचित्र जिसे उसने अपनी डायरीमें सहेजके रखा था.......और दिलमें जिस तस्वीरको कैद कर रखा था.

उसी वक्त यशोमीके मोबाइलकी रींग बजी.
सामने स्वरका स्वर गूंज रहा था," हलो, यशोमी मैं एयर पोर्टसे बोल रहा हूं........."

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19 जनवरी 2009

क्या प्यार ऐसा भी होता है क्या ????

प्यार क्या है ???
प्यार जिंदगी है ,बंदगी है , इबादत है ,
प्यार एक फुल है , खुशबु है ,अंदाज है ,
प्यार एक एहसास है ,एक खुमार है , एक नशा है ,
प्यार एक नूर है , एक अरमान है , एक आरजू है ,
प्यार एक प्यास है ,एक आस है , जज्बात है ,
प्यार एक आंधी है , अँधा कुंवा है ,फ़िर भी एक दिशा है ,
प्यार एक ख्वाहिश है ,एक जूनून है ,इब्तदा है ,
प्यार एक इम्तेहान है , इन्तेहाँ है ,एक इनाम है ,ईमान है ,
प्यार एक तड़प है , ताकत है ,बेकरारी है ,
प्यार एक नफ़रत है ,बेकार है फ़िर भी किस्मत की नाखुदा है ....
अब ...
इस प्यारको आप तरबूज समजकर खालो या पपीता समज कर ,
इसे आप समोसा समजो या पानी पुरी या भेल या कचोरी ,
प्यार का उन्धिया बनाओ ,या पूरनपोली या खीर ,
प्यारके लड्डू खाओ ,या जलेबी या मख्खन ,
प्यार का पुलाव बनाओ या बिरियानी या जीरा राइस ,
प्यार का सूप बनाकर पीओ या सरबत या कोका कोला ,
या फ़िर चाय समजो कोफी या चोकलेट ,
प्यार का रायता बनाओ या भुरता या चटनी फ़िर कोई सलाद ,
प्यार किया हो तो परिणाम किसीसे कहो नही , उसे भी प्यार करने दो ,
हम तो फंसे ही है उसे भी फंसने दो ,

ये जिंदगी का जिन्दादिली का खेल है,
जिसमे जीतो या हारो कोई फर्क नहीं ,
हार भी जीत है और जीतमें भी हार ........
एक ऐसा एहसास जिसके बगैर शायद जिंदगी अधूरी सी है ...
प्यार करो जिंदगीसे इस जिन्दगीमे ......

मैं एक सपना हूँ.....



मैं सपना हूँ ॥

जो तुम्हारी आँखोंने देखा था हरदम ...

तुम खुशनसीब हो ...

तुम्हारे सपने जो साकार हो गए है ...

मैं सपना पनपता हूँ दिल के आंगनमें ...

मैं महत्वाकांक्षा हूँ ...

जिसने अभी बसेरा बना लिया है ,

तुम्हारी आँखों में अभी ....

मेरी चकाचौंध ने तुम्हे चकित कर दिया है ,

अपनी और आकर्षित किया है ,

और मैं पनपती हूँ दिमाग के मैदानमें ...


आ गए हो अब दोराहे पर तुम ,

मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं ?


सपना आत्मा की आवाज है ...

जो कभी गुमराह नहीं करती ....

महत्वाकांक्षा दिमाग से निकलती है ...

जो आत्मा पर छा जाती है ....


सोचो अब ॥!!!

साकार हुए सपनों को सहेजना है ....

या चकाचौंध महत्वाकांक्षाकी रौशनी में गूम हो जाना है ...??

18 जनवरी 2009

अहेसां समज लिया ........




अगर इस पलको इक इजाजत है,
कह सको तो ये इक शरारत भी है,
हो गया है इश्क हमें आपसे तो ये एक कयामत है,
खुदा ही जब कहता है,ये इश्क तो एक इबादत है.......

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दर्दे गमकी दवा ढूंढते रहे दुनियाकी दुकानमें,
जब गुजरते वक्तके साथ दर्द नासूर बनता चला,
वह दर्द ही था जो हमारे जीनेकी वजह बन गया,
और वही दर्द था जो हमारे दिलकी दवा बन गया.............................
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आपके दिये हर जख्मको तोहफा समज कूबुल कर लिया,
जब की आपने बेवफाई तो उसे भी आपका दिया ईनाम समज लिया,
सच तो है ये कि एहसास हर वक्त बस आपकी खुशीका ही रहा,
हर गम जो दिये आपने उसे हम पर आपने किया अहेसां समज लिया.....................
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17 जनवरी 2009

ये तो एक ग़ज़ल है .....




प्यारका नूर छा जाता है ,

खुदाईमें तो कलमसे टपका हर लब्ज़ एक ग़ज़ल है.......

आरजूओं की बे- इन्तेहाँ कसक घुली जो ,

इंतजारमें लिखी कागज़ पर दिलके वो,

कलमसे टपकती स्याही एक ग़ज़ल है ...

फलकसे दिलकी गहराइयोंमें झांकना तेरा,

वो तेरी नजरका सुरूर भी तो एक ग़ज़ल है ।


बागोंमें खिलना हर फूल का और भौरेंका वो गान ,

चुपकेसे सुनो तो वह भी एक ग़ज़ल है ....


फिजामें सूखे पत्तोंकी वह सरसराहटकी वह सिसकियाँ,

दर्द के साज़ पर छेडी गई एक नजाकतसे भरी एक ग़ज़ल है ....


धड़कन बनकर सुनाई देती है तुम्हारे दिलमें,

वो मेरी हर साँस एक ग़ज़ल है ...

हिज़रमें बहता हुआ हर अश्क आँखोंसे ,

तेरी तस्वीर पर वो हर अश्क एक ग़ज़ल है ...


दिल टुटके बिखर जाता है मेरे आशियानेके फर्श ,

टुटा हुआ दिलका वो हर टुकडा एक ग़ज़ल है ...

वीराने मंझरमें बहार लेकर आने वाली तेरी आहट,

उसकी हर दस्तक एक ग़ज़ल है ....


आमना सामना हो हमारा और शब्द लबमें ही सिल जाए ,

खामोशी का वह आलम भी तो एक ग़ज़ल है ......

16 जनवरी 2009

इश्क का जादू



हिजाबका नाम लेकर पलकोंकी चिलमन आँखोंके मयखाने पर ढँक लेते हो ,

काजलकी लकीर समशेर बनकर वार कर जाती है कत्ल हमें बस नजर से कर देते हो ।


शर्मोहयाकी अदाएं सब हसीनोंकी जिनके लब कुछ और निगाहें कुछ और बयां करती है ,

किसी हसीना को जरुरत नहीं हथियार की कभी ,जब अदाएं ही घायल कर जाती है ।


इश्क की रहगुजर से हम थे नावाकिफ पर हमारा तार्रुफ़ कराया आपकी उस दिलकशीने ,

जब दुपट्टा सरका था सिरसे आपके और चेहरे पर जुल्फोंकी घटा छा गई थी ।


एक जंजीर जुल्फ की थी बड़ी ही नटखट उड़ उड़ कर चेहरे पर आ रही थी ,

और कँवल सी नाजुक आपकी वो उंगली उसे चेहरेसे बार बार हटा रही थी ।


आपके ये दीदारने हमें इस कदर दीवाना बना दिया है हरदम ख्वाबोंमें आकर ,

मोहब्बत की वो अनजान अहेसासोंकी डगरका पता ठिकाना बता दिया है ।


इसे इश्क कहो या मोहब्बत कहो इबादत समज खुदाकी बंदगी करली जब हमने ,

तब डोली जब उठी आपकी तो अपनी सारी खुशियों को आपको इनायत कर दी हमने ...

15 जनवरी 2009

एक सुबह ये क्या हुआ ?????


हर कविको अपनी हर रचनासे प्यार होता है पर कुछ रचना उसे बहुत ही खास लगती है अपने आपसे बेहद करीब ...ये रचना मूलत: गुजराती है पर उसे अनुवादित किया है ....
आज ऐसी ही एक रचना प्रस्तुत है :



एक सुनहरी सुबह मैं जागी ...
कुछ एह्सासोको अपनी डायरीमें लिखना चाहा
अरे !! पर ये क्या ???
अपनी कितनीही अनमोल अनुभूतियों को शब्ददेह देकर
तह करके रखी थी मैंने इस डायरीमें ...
पर ...
देखा तो कहीं कहीं पूरा के पूरा पृष्ठ ही कोरा पाया मैंने ...
देखा तो ....

शब्द झूमते मचलते हुए
इस दुनिया की सैर को निकल पड़े थे .....
किसीको देखा मैंने पेड़ की टहनी पर ,
कोई बैठा था हरे पत्तेकी गोदमे औस की बूंद बनकर ....
कोई सूखे पत्ते पर बैठकर हवा के झोकेके साथ बह चला ,
तो कोई खिले फूल पर बैठ खुशबू ले रहा था ....
कोई तितली के साथ डाली डाली घूम रहा था ,
कोई भौरेंके साथ गा रहा था .....

कोई खूबसूरत चेहरे पर तिल बनकर सजा था ,
कोई माशूकाकी बाली पर बैठ झूल रहा था .....
कोई कैद हो चूका था उसकी आंखोके मदमाते काजलकी लकीरों में ,
तो कोई होठों पर मुस्कान बनकर सज गया था .....
कोई दिलके दरिया में डूब गया था ,
तो कोई साहिल पर महबूबा के आने के इंतज़ारमें था .....



बेहद खुश थे सब अपने नए मंज़र पर ,
उन्हें वैसे ही वहां पर रहने दिया मैंने ....
अब कोरे पन्नो पर स्मृतियोंकी तस्वीरें लगा दी है ,
कोरे पन्नों पर अनकहे जज्बातोंकी खुशबू महका दी है .....

14 जनवरी 2009

हर फूलकी खुशबू ताज़ा है ...


रुबरु हुए थे आपसे हम एक अरसा हो चुका था,
लग रहा था क्या भूल गये हैं हम आपको?
जब अचानक एक मोड पर सामना हो गया है आज तो महेसूस हुआ यूं
कि यादोंके गुलिस्तानके खीले हर फूलकी खूश्बु ताझा है...........
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मंझर दोस्तीका यूं भी होता है कभी मिल न पाये चाह कर हम,
न मिलते हुए भी साथ गुजारा हर पल बदस्तूर अभी ताजा है.......
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13 जनवरी 2009

उत्तरायण का पर्व ....



मैं कागज़का टुकडा .....
सब मुझे कहे पतंग ॥!!
मेरे हजारों साथी
कोई लाल ,कोई हरा ,कोई पिला बस सभी रंगीन ...!!!


डोर हमारी बनती है दोस्त ,
वो दोस्तको पतली डंडीके संग बांधकर
मैं और डोर आकाशमें उड़ने जाते है .....
वहां पर हमारे न जाने कितने ही साथी-दोस्त मिल जाते है ....
कोई प्यारसे गले लगाते है ,
तो कोई हमसे अपना दामन छुडाता है ......


हमको हवामे उड़ना भा जाता है ,
तब कोई एक पतंग आकर चुपके से ,
हमें जमीं से अलग कर जाता है ,
कटी हुई पतंग बनाकर हवामें लहरा जाता है .....


एक छोटेसे बच्चे की आसभरी नजरमे
और उसके हाथ पर जाकर उसकी मुस्कान बन जाता हूँ ...........!!!!!
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सभी पाठकों को उत्तरायण पर्व की हार्दिक शुभकामनायें

12 जनवरी 2009

दरम्यां नज़र आती है .....



तोडी थी कल आपने एक चीज जो थी कांचकी,
टुकडे बिखर गये फर्श पर जिसके वह मेरा दिल था....
नश्तर चूभ गया और कतरा कतरा बह चला,
तुम्हारे नाजुक पांवमें खूं बनकर ,मेरी आंखमें अश्क बनकर.........
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तोडीये ना दिल किसीका कभी ,बडा ही नाजुक होता है,
दर्द से उठी चुभन काबिले बर्दाश्त नहीं होती...
जोडना फिर चाहे कितना भी उसे ,
एक दरार दरम्यां नजर आ जाती है............
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11 जनवरी 2009

सपने ये गीलेसे सीलेसे .....




सपने है आँखोंमें कुछ गीलेसे.. भीगेसे ..

पलकोंमे छुपाकर रखे है ।

किसीकी नजर न पड़ जाए उस पर ,

इस तरह इस चिलमनमें छुपाकर रखे है .....


गुजारिश की है हमने इन आंखोंको

पलकें न तुम तेज झपकाना ,

आँखें अगर मोती भी बरसायें कभी तो

तुम उन्हें पलकों पर थाम लेना ,

क्योंकि बड़े नाजुक ये होते है ये सपने ..........


एक पतलेसे शीशे पर तराशे होते है ये सपने ,

आंखोंमें सजते है जब रंग भर जाते है ये सपने ....

ठेस कभी लग जाए दिलको यदि ,

तो रेतके महलोंसे बिखर जाते है ये सपने ,

तब बाँध पलकोंका तोड़कर

टुकडोंमें बह जाते है ये सपने ......

बहते ये अश्क आंखोंसे मगर

ज़ख्म दिल पर छोड़ जाते है ये ...

कसूर उन ख्वाबों का होता है फ़िर भी ,

दिल को तड़पनेकी सज़ा दे जाते है ये सपने .

10 जनवरी 2009

इंतज़ार करके .....



जिंदगी तो चलती रही यूँ ही हमेशा ,

उसे परवाह नहीं थी तुम्हारा साथ हो न हो ...

बेपरवाह बेफिक्र ,

जिंदगी की हर फ़िक्र को धुएंमें उड़ा दिया ...

तुम साथ न आए तो भी मैं तो चलता चला गया ....


लेकिन तुम्हारे ख्याल को मैं पीछे छोड़ न पाया ,

वह क्यों मेरे साथ साथ ही आया ,

आगे भले निकल गया यूँ पर ख्याल ने तुम्हारे ,

मुझे रुकने पर मजबूर किया ......


अब इन्तजार कर रहा हूँ ,

मेरे दिल की सदा तुम तक पहुंचती भी है ?

अकेले मेरे कदमों की आहट कहीं तुमने सुनी भी है ???

साथ आओगी तो मेरा मुकद्दर समज लूँगा ....


ना आओ तो होगी मेरी तक़दीर .....

वह तस्वीर जो ख़ुद अपने हाथोंसे तोडी ,

हाथों से टुकड़े समेट रहा हूँ ,

एक टुकड़े की चुभनसे रंगे लहू भरे हाथ लेकर .....


आखिर आ गई मेरा सपना बनकर ,

आँखे थक गई जब इंतज़ार करके ...

9 जनवरी 2009

जिनकी जुत्सजू अभी बाकी है ....

शबनमसी पानीकी चंद बूंदे टपक रही थी झुल्फोंसे,
नाजुक नर्म गालोंसे सरक जा रही थी जैसे बूंदे औसकी पत्तोंसे,
बूंदोकी किस्मतसे जलन हो गई उस वक्त कुछ इस नाचीज दिलको,
नजाकतसे रुबरु हो रही थी वो बेखबर, और हम थे कि आहें भरकर रह गये............
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नजरसे छलकते हुए वह मयके पयमाने थे,
जिन पयमानोंने खुद ही में सागरको समाया था,
उफ ढंक लो पलकोंकी चिलमनसे इस सागरको,
घायल हो चूके है इस कदर, फिर भी जीने की जुत्सजु अभी बाकी है...................
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सहस्त्रधारा....!!!






हमारा दूसरा पड़ाव है सहस्त्रधारा ...

हरिद्वारसे हिमालय के चरणस्पर्श कर के थोड़े और आगे चलते है आगे राजाजी नेशनल पार्क पडता है राष्ट्रीय अभियारान्य का गौरव प्राप्त है जीप में बिठाकर सैर कर सकते है जो वहीं किराये पर मिलती है वैसे हम समयके अभावके कारण वहां जा नही पाए पर वाइल्डलाइफ के चाहक इधर जरूर जाए ।

देहरादून की ओर चलते रास्ते पर आती है यह सहस्त्रधारा॥

हाँ ,यहाँ एक सुंदर प्राकृतिक सौंदर्य की धारा है जगह पर जाते वैसे कोई खूबी तुरंत नज़र नहीं आती है पर यह पुरी जगह अपने आप में एक अजूबा है एक पहाड़ी से गिरते हुए जल को एक प्राकृतिक तरीके से ही संचित किया गया है कहा जाता है की यह जल गंधक मिश्रित होता है जिसके उपयोग से चमडी के दर्द ठीक हो सकते है थोड़े से दूर पहाड़ी पर आगे चलते है वंही है असली अजूबा पहाड़ी के अन्दर प्राकृतिकरूप से तराशी हुई कई छोटी छोटी गुफा है जो बाहरसे तो स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती किंतु इन गुफा में जब प्रवेश करते है तो उनकी छत अविरत रिमज़िम हलकी बारिश की बौछारों की तरह टपकती रहती है यही सहस्त्रधारा है ।

वहां कई माता पिता अपने पोलियो ग्रस्त बच्चों को गंधक के पानीमें नहलाते हुए नजर आए यह जगह छोटी सी जगह है जहाँ हम कुछ घंटे जरूर रुक सकते है चाय पानी नाश्ते का भी सुचारू रूप से इंतजाम है थोड़ी हस्तकलाकी चीजों की दूकान भी है एक बात हम अवश्य कहना चाहेंगे की हुन्नर और हस्तकला में हर राज्य की एक अपनी पहचान -विशेषता ऊभर कर सामने आती है ।

यहांसे तकरीबन ग्यारह किलोमीटर की दूरी पर उत्तरांचल की राजधानी देहरादून बसी हुई है यहाँ कई महत्व की संस्थाओं के मुख्यालय भी है जैसे की ongc ltd यहाँ का दून स्कूल जगविख्यात है जहाँ हमारे कई महानुभाव पढे हुए है हिमालय की गोद में बसा हुआ ये स्थल पर्यावरण के सुचारू रखरखाव की अच्छी मिसाल है हराभरा है ,प्रदूषण से मुक्त है यहाँ के चावल उसकी अनोखी खुशबू के कारण जगमशहूर है हिमालय में यह एक प्रवेशद्वार है यहांसे मसूरी जा सकते है ।

लेकिन मसूरी से पहले हम चलेंगे ऋषिकेश जो मेरी सबसे मनपसंद जगह भी है हमारी अगली मुलाक़ात में ..............

8 जनवरी 2009

मुझसे दोस्ती करोगे ?



फासले हो चूके है अब दरम्यां हमारे, हम रुके है उसी मोड पर जहां तुम छोड गये थे,
नजर आ रहे हो आप बुलंदी पर जहांसे नजर आपकी अब हमें न ढूंढ पाये हैं भीडमें ............
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रस्में वफा सीखनेकी क्या जरूरत है हमें ?
जब ईश्कको ईमान और वफाको इबादत समज लिया हमनें,
ये फैसला था तकदीरका कि हम आपसे बिछड गये,
अब तो यादोंको ही आपकी खुदा समज लिया है हमनें......
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हमराझ बने,हमकदम बने, हमसफर बनकर साथ चलते रहे,
मिलकर भी ना मिले कभी ,फिर भी हर डगर साथ साथ चले...
वक्तके दामनके फूलोंको चुनते हुए, राहोंसे प्यार करते हुए,
आज ताज्जुब हुआ एक सवाल पर जो पूछा आपने हमसे ...
हर रस्मे वफा कस्में अदा कर रहे थे आज तक हम बदस्तुर ,
पूछ रहे हो अब जाकर हमें कि मुझसे दोस्ती करोगे?????=======================================================

7 जनवरी 2009

वही पल जिंदगी जीने की वजह बन जाए



जिक्र हुआ जब रिश्तोंका, हमें रिश्तोंकी वह भीड याद आ गयी,
भरी हुई महेफिलमें कहकहे थे जिंदगीके, तब हमें अपनी तनहाई याद आ गई,
उम्मीदें नजर आयी हमारी तरफ उठी हर नजरमें हमसे ,
कहीं कभी बढे हमारे उम्मीदोंसे कभी तो हमसे छुडाई हर उंगली याद आ गई.......

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न उम्मीद किसीसे करो, दिल टूटनेकी वजह ही न रहेगी,
अनजान हो जब राहें आपकी, गुम होनेकी वजह भी वह सह लेगी....
तब अगर एक अनजान हाथ बढे, आपके सामने बस पलभरके लिये ही सही,
थाम लो उसे हंसकर उस पल, शायद वही पल जिंदगी जीनेकी वजह बन जाये...........
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6 जनवरी 2009

ये निगाहों का जादू ...

अंदाजे बयां कुछ अलग ही रहा अपना ,

स्याही लहराती रही है सुर्ख कागज़ पर ,

हँसी लहराती रही है इन लबों पर ,

खुशी और गम को जब एक ladi me पिरोया हमने ....

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जख्मों को देने से ये दुनिया कभी बाज नहीं आएगी ,

रो दोगे तुम जितना उतनी ही हँसे जायेगी तुम पर ,

बस एक बार सिख लोगे मुस्कुराना मेरे साथ ,

फ़िर दोबारा रुलाने वो कभी नहीं आएगी .....

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छलकती खुशियोंका लब्जों से इज़हार न कर पाये ,

लब खामोश ही रहे पर ये निगाहें बोल पड़ी ,

नजर से नजर कुछ यूँही मिली पल भर तो ,

हया से झुकी पलकोंकी ताबीर मेरे दिलमे तस्वीर बनकर रह गई ....

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औरत : एक दृष्टिकोण

हम हमेशा यही कहते हैं की औरत को हमेशा दुसरे स्तरकी नागरिक समजा गया है .उसे पुरुष सामान हक्क नहीं मिल रहे है .इससे जुड़ी हुई समस्याओं की बात तो बहुत ही हो चुकी है पर ये समस्या क्यों सुलज़ नहीं पाती है उसकी वजह मेरी दृष्टि से ये है की :


क्या इस के लिए सिर्फ़ पुरूष ही जिम्मेदार है ? हम औरतें नहीं ?क्या कभी किसी औरत ने अपना हक़ मांगने की कोशिश भी की है ?नहीं !! आगे से जो चली आ रही चलने दो ...मैंने और आपने ये भी देखा है की कई मुश्किलों का सामना करते हुए जिस औरत्ने पुरूष वर्ग को चुनौती दी है और अपनी काबिलियत दिखाई है उसे समाजने पूरे सम्मान से उसका सही स्थान दिया ही है । झाँसी की रानी से लेकर पेप्सिकी सी यी ओ इन्द्रानूयी ही क्यों न हो ???


लिस्ट बहुत लम्बी है ...कहना सिर्फ़ इतना है की दुनिया झुकाती है झुकाने वाला चाहिए फ़िर चाहे वह पुरूष हो या स्त्री ....

शुरुआत करते है स्त्री भ्रूण हत्या से ... क्या ये भ्रूण हत्या के लिए केवल पुरुषवर्ग ही जिम्मेदार है ? स्त्री बिल्कुल बेकसूर है ? पहली बात स्त्री भ्रूण हत्या के लिए तैयार ही क्यो होती है ...घर वालों के दबाव से ? ये हमेशा सही नहीं ..ज्यादा तर पाया गया है की स्त्री ख़ुद पुत्र की लालसा लिए होती है चाहे वह सास हो ,माँ हो ,बीवी हो या बहन !!!दहेज़ के लिए जिन्दा जलाई जाने वाली लड़की किसी सास या ननद की त्रासदी का शिकार पायी जाती है ...जब वह अपने मायके में इस बात की इत्तिला करती है तो ज्यादातर माँ बाप ये मांग के आगे झुक जाते है या अब तो पति का घर ही तेरा घर है कहकर उसे वापस भेज देते है और ये काम माँ ही करती है ..जरूरत है अपने उस बेटी को पनाह दो .क़ानून की मदद लेकर लड़ लो अपने हक़ के लिए ..शुरुआत में तकलीफ जरूर होगी पर धीरे धीरे ये बड़ी जायेगी जरूर ...इस लिए अपनी बेटी को शिक्षित बनाये ,स्वावलंबी बनाये और अपने हक़ के लिए लड़ना भी सिखाये ....

अब एक और सवाल :

क्या स्त्री अपने अस्तित्व के लिए जागरूक है ? हमें अपने स्त्री होने पर गर्व होना चाहिए .बेटी को जन्म देने वाली हर माँ को तहे दिल से खुशी होनी चाहिए .और ये सबके लिए मशाल ख़ुद स्त्री को ही उठानी है ...

हमारी सामाजिक संस्थाएं जो ये काम करती है वहां के कार्यकर्त्ता क्या ख़ुद स्त्री जागृति के बारे में अपने जीवन में अमल करते है या दो दो मुखौटे भी पहनते है ? ये जानना भी जरूरी है .सरकार ने तो स्त्री पर होने वाले अत्याचारका सामना कर पाए उसके लिए कायदे बनाये है पर उनका लाभ लेने की आम औरत की हिम्मत नहीं होती ....कारन सिर्फ़ सामाजिक अस्वीकृति ???

औरत हमेशा डरती है क्योंकि वह आर्थिक रूप से स्वायत्त नहीं होती ..दूसरा कारन उसकी परवरिश ही बचपन से दुसरे दर्जे के नागरिक की तरह होती है .पुत्र और पुत्री में ख़ुद माँ ही भेद करती है ।

एक औरत दूसरी औरत का हाथ थाम लेगी तब ही स्त्री न्याय पा सकेगी । बलात्कार से उत्पीडित स्त्री की सबसे बड़ी उलाहना तो दूसरी स्त्री वर्ग से ही होती है .जहाँ उसे प्यार और साथ की जरूरत होती है ,आश्वासन की जरूरत होती है वहां पर उसे नकारा जाता है । यहाँ पर माँ बहन पड़ोसी सब मिलकर प्यार से उसके साथ खड़े होकर एक जिंदगी को मुर्जाती बचा सकते है ...

ये चर्चा बहुत लम्बी हो सकती है पर समापन की और बढ़ते हुए मैं कहूँगी :

१ मैं एक रुढिवादी परिवार से आई लड़की थी पर मैंने लंबा संघर्ष करके पोस्ट ग्रेज्युएट तक की पढ़ाई पुरी की ।

२ मेरे ख़ुद एक बेटी ही संतान है वह भी मेरी इच्छा से ही ...मेरे परिवारमें भइया के भी सिर्फ़ एक बेटी है और मेरे मायके में मेरे भाई के भी सिर्फ़ एक बेटी ही है ...क्योंकि हम सब मानते है की हमें एक संतान की जरूरत है न की बेटा या बेटी की .....

३ हमें हमारे आने वाले कल का पता नहीं होता तो हम मृत्यु के बाद के नर्क या स्वर्ग की फिकर क्यों करे ?

हम औरतें ही औरत की राह और चाह बन सकती है :

कोमल स्पर्श ,कोमल ह्रदय और कोमल भावना है मेरी पहचान जो हर कठिन कार्य को मक्खन सा मुलायम बनाकर आसानी से मंजिल तक पहुंचाने की क्षमता रखती है ....

हाँ मैं औरत हूँ : फूल से भी कोमल और वज्र से भी कठोर ...

आपकी जिंदगी की पहली साँस से आखरी साँस तक आपके साथ अलग अलग रिश्तों के रूप में मिलने वाली एक संजीवनी यानी की मैं एक औरत .....

मुझे नाज़ है अपने नारी होने पर ...

मुझे गौरव है नारीत्व का ...

गरिमा मेरे आत्मगौरव की अब बनेगी पहचान ......

5 जनवरी 2009

औरत : एक दृष्टिकोण

कल से आगे ............

बस ये एक बात है जो आजके जेट युग में हर व्यक्तिको सोचने की खास जरूरत है .हम पूरी दुनिया के बारेमे जानने का दावा करते है पर क्या हम ख़ुद को बराबर जान पाये है ?कभी ये कोशिश भी की है ?

चलो आज कुछ बिल्कुल सीधे सादे इन सवालों को अपने आप से पूछे .इसे रेपिड फायर राउंड बनाये .ध्यान रहे जिस पल ये सवाल ख़त्म हो तुरंत ही जवाब मनमे आ जाना चाहिए ,एक सेकंड भी ना छूटे बिचमे ......

१.मुझे कौनसा फूल पसंद है ?

२.मैं कौनसी चीज सबसे अच्छी कर सकती /सकता हूँ ?

३.मुझे कौनसा रंग पसंद है ?

४.मैं क्या नहीं कर सकती/सकता हूँ ?

५.मैं किस बात से बेहद खुश होता /होती हूँ ?

६.मुझे क्या करना कभी पसंद नहीं होगा ?

७.मुझे किस बातसे बेहद गुस्सा आता है ?

८.मेरी जिंदगी का मकसद क्या है ?मैं जिंदगी से क्या चाहता हूँ ?

९.क्या मैं अपने आपको पूरी तरह से सही मायने में जानता /जानती हूँ ?

जवाब आपने ख़ुद को देने है । पर मेरे कहने का मतलब इतना है की ये छोटी सी लगने वाली बातें आप ठीक तरहसे सोच सकते हो ,समज पाते हो ,और हो सके तो उसका अनुसरण भी करते हो तो आप की सोच धीरे धीरे ही सही पर एक सही दिशा में जायेगी .और इस तरह सही दिशामे सही वक्त पर कदम रखते है तो असफलता का विकल्प बहुत ही कम आएगा आपके सामने .आप सफलता को तो पा ही सकते है पर अगर कभी असफल होते है तो भी आप जल्द ही अपने आप को संभाल कर जल्दी आगे बढ़ सकते है ,निराशा से उबार सकते है ....

और यदि एक बार हम अपने आपको समज लें तो फ़िर दूसरी व्यक्ति को भी समजने में आसानी हो जाती है .और ग़लतफहमी भी कम ही होती है ।

इसके साथ दूसरी एक चीज़ भी समजानी बेहद जरूरी है :

क्या आपकी सोच किसी व्यक्ति विशेष ,कोई अन्य चीज जैसे की टी वि ,अखबार ,नोवेल ,लेखक की विचारधारा से प्रभावित है या स्वतन्त्र है ?

अगर आप ज्यादातर स्वतन्त्र सोचते है तो ठीक है ।

पर अगर हमेशा किसीसे प्रभावित होकर चलते है तो पहले अपनी सोचको स्वतंत्र बनाओ .भले मामूली हो पर ख़ुद की हो ऐसी सोच हो ,मामूली सा ही सही पर अपना स्वतन्त्र व्यक्तिव हो ये जरूरी है ।

आज का मूल सवाल अब आता है :

इस दुनिया में औरतका एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह स्वीकार कितने लोग कर पाये है ? हम में से ही !!!! आपको ये जान कर जरा भी ताज्जुब नहीं होना चाहिए की इस बात से ज्यादातर औरतें कभी नहीं सोच पाती है ...क्यों ?

...........................................चर्चा जारी रहेगी ..अगले प्रकरण तक इंतज़ार ...!!!

4 जनवरी 2009

औरत ! एक दृष्टिकोण .....

हम इंसान है !! बहुत ही समजदार प्राणी इस धरती पर बसे हुए ...हमारी हर शोध हर अन्वेषण ने हमारी जिंदगी को बेहद आसान बना दिया है पर फ़िर भी क्यों कदम दर कदम ये जिंदगी हमारी उलज़ने बढ़ा ही रही है ....

एक उदाहरण पेश कर रही हूँ ॥

चार व्यक्ति का एक परिवार है .चारो व्यक्तियों को आप एक कागज़ और कलम देकर चार अलग जगहों पर बिठा दो .इन चार व्यक्तियों को ख़ुद के समेत बाकी चार व्यक्ति के बारेमें लिखना है । समय अवधि दी जाती है एक घंटा।

एक घंटे के बाद चारोंका लिखा हुआ ले लीजिये । उन चारो का जो लिखा हुआ हैं उस पर गौर से पढने पर आप ये जान पाओगे की एक ही परिवार में सालो से साथ रहने के बावजूद चारो व्यक्ति की दुसरे व्यक्तियों के बारे में राय भिन्न हो सकती है ।

कारण साफ़ है की एक खून से बने होते है फ़िर भी हम एक स्वतंत्र व्यक्ति ही होते है .और ये कतई जरूरी नहीं की हमारी सोच हमारा दृष्टिकोण दुसरे व्यक्तियों से मिलता जुलता हो ...हम एक स्वतन्त्र व्यक्ति ही है शरीर और मन से ....

माबाप अपनी संतानों को एक ही स्कूल में एक ही सा शिक्षण देते है फ़िर भी ऐसे क्यों होता है की एक संतान डॉक्टर बनता है और दूसरा इतिहास में रूचि रखता है । एक हमेशा अव्वल आता है और दूसरा फ़ैल होता है ...

फ़िल्म तारे जमीन पर उसका अच्छा उदाहरण है । क्योंकि हम ये चीज़ का जानकर या अनजाने में स्वीकार नहीं कर पाते की हम एक होते ही अलग है ...

शादी के बाद पति चाहता है पत्नी सिर्फ़ उसकी और उसके परिवार से जुड़ी रहे । जिस घरमे उसने बचपनसे जवानी तक का वक्त काटा है उसे वो भुलाकर पुरी तरह उसके परिवारको ही समर्पित रहे । लड़कियोंको भी ये शिक्षा लगभग बचपन से ही दी जाती है और उसे कहा जाता है की जिस घरमे तेरी डोली जाए उसीसे तेरी अर्थी उठेगी ..हम तेरे लिए गैर हो गए ...क्या ये सही है ?????? और लड़कियां भी इसी विचारको अपनेमें ढाल लेती है और जीवन चलता रहता है ....

पर मेरा मुद्दा ये कतई नही है .....

मैं सिर्फ़ इतना जानना चाहती हूँ की कितने युगल ऐसे होंगे जिन्होंने एक दुसरे के भिन्न व्यक्तित्वों को स्वीकार हो, संवारा हो और निखारा हो !!!

मैं अपना उदाहरण देती हूँ :

पिछले महीने अपनी घरेलु जिम्मेदारियों कुछ इस कदर हो गई की मैं सदस्योंकी अपेक्षाओं को पुरी तरह न्याय नहीं दे पा रही थी । एक दिन मैंने अपने पति से एक सवाल किया :

आप ये चाहते है की २४ x ७ मैं आपकी पत्नी बनकर जिऊँ .बेटी चाहती है में सिर्फ़ २४ क्ष ७ उसकी माँ ही हूँ ॥

कभी आप दोनोने ये सोचा की मैं एक बीवी और एक माँ से पहले एक व्यक्ति हूँ .प्रीती हूँ । जिसकी अलग चाह हो सकती है ,उसके कुछ अलग अरमान हो सकते है ..........

...................................चर्चा आगे भी जारी रहेगी ..इंतज़ार करें ......

3 जनवरी 2009

चुपके चुपके

गुजरते थे तुम्हारे कुचेसे देखते थे हम तुम्हें ,
अधखुली खिडकीसे कनखियोंसे देखते हुए चूपके चूपके..
पीठ हमारी तकते रहना दूर जाते हुए देर तक ,
तुम्हें महेसूस किया था हमने चूपके चूपके.....
तुम्हारी अम्मी जब नाम पुकारती थी हमारा कभी,
तुम्हारा दिल धडक जाता था शायद जोरोंसे या चूपके चूपके.....
तुम्हारी डायरीके पन्नोंके बीच सूखे गुलाबको सहलाते हुए,
महक अधूरी ढूंढते देखा था हमने भी तो तुम्हें चूपके चूपके...........

उफ़ ये अदाएं ...!!!!!

मांगनेसे तो खुदा भी मिल सकता है तो ये रकीब क्या चीज है ?
तड़प हो गर कुछ पा लेने की तो ये खुशियाँ क्या चीज है ????
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दम तो भरते थे वो दोस्ती का हरदम ,
मायने भी दोस्तीके क्या वो समज पाए है ?
खफा हम हुए थे इसी बात पर उनसे
पर उफ़....ये शिकायत भी हम न कर पाए है .....
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खामोशियों की भी एक जबां होती है खूबसुरत,
हलकी हँसी होती है इन होठों पर और आँखों में शरारत ,
पलकोंकी चिलमन ढँक लेती है ये शोख अदाको ,
और फ़िर वो हमें खफा समजे जाते है बस यूँही .....

रात के आलमका नशा



रात एक जाम है अध भरा हुआ ,श्वेत पानी भरा हुआ ,
नींद उसमे घोल देती है एक नशा ,चुरा लाती है कोरे कोरे ख्वाब ......

उससे भर देती है पुरा जाम .....

कोरे कोरे ख्वाबों को भिगोती है ,
पलकें कभी अश्कों से भी नींदकी जगह भर देती है ,
अश्क कहते है कहानी कभी खुशियों की ,
कभी गहरे ज़ख्म को उधेड़ लेते है ..............

चाँद आता है और चांदनी के लेपसे ज़ख्म को भरता है ,
निंदिया रानी आंखों पर कब्जा कर लेती है तब ,
और अनकही बातें मनचाहे सजनसे भी कह देती है ..
न जाने कहानी ये कोई और जिंदगीके सफे पर कुछ देती है ......

रातके जाम को पीलो जी भरके ,नींद के आलममें जी लो जी भर
तन्हाई के छा जाने दो ख़ुद पर ,और इस रात के आलम का नशा पी लो .......

2 जनवरी 2009

पूजा की चिठ्ठी ....!!!!



“ प्रिय भगवानजी ,

इतनी बड़ी दुनियामें आप शायद मुझे नहीं जानते होंगे पर मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ ।आप मेरे घरके मन्दिर में रहते हो .पूजा वाले कमरे मे.आपकी वहां पर सुंदर मूर्ति है .दादा दादी रोज उनकी पूजा भी करते है .बाद में मुझे प्रशाद भी देते है .

पहले मैं आपको अपना नाम बताती हूँ ।मेरे नाम पूजा है .मेरी उम्र ही आठ साल .यहाँ चन्दनपुर के सेंट लोरियल कान्वेंट स्कूल में पढ़ती हूँ हिन्दी माध्यम की दूसरी क्लास में .अच्छा भगवानजी ,सब ये कहते है की आप को सब पता होता है .सही में आप सब कुछ जानते है ना ? मुझे आपसे एक सवाल पूछना है .आप उसका सही सही जवाब दोगे ना ?मुझे उसका जवाब जरूर लिखना ...

थोड़े दिन पहले मेरी मम्मी सो रही थी ।सबके बुलाने पर भी नहीं जागी .फ़िर सभी रोने लगे .मम्मी को मेरी दुल्हन गुडिया की तरह सजाया गया .फिरभी वह कुछ भी नहीं बोली .फ़िर मुझे रोहित अंकल के घर ले गए . पुरा दिन मैं वहां पर ही रही .दूसरे दिन मैंने सबसे पूछा माँ कहाँ पर गई ?तो सबने कहा वह भगवान के घर गई है .

भगवानजी क्या वो सचमुच तुम्हारे पास आई है ? वो ठीक तो हैं न ?क्या मुझे वह याद करती है ? उनसे कहना मैं तो उन्हें बहुत याद करती हूँ ।पापा मेरा बहुत ही ख्याल रखते है . रात को पापा मम्मीकी तस्वीर को हाथ में लेकर कल बातें कर रहे थे .मैंने ठीक सुनी नहीं मुझे बहुत नींद आ रही थी .

अच्छा मैं इस चिट्ठी के साथ कुछ दवाईयां भी भेज रही हूँ ।मामा बहुत बीमार थी और सब उन्हें यही दवाई देते थे .आप उन्हें ठीक टाइम पर देते रहना .मामा को टाइम पता है .जब वो ठीक हो जाए तो तुरंत उसे हमारे पास भेज देना .मामा को बताना अब मैं उन्हें कभी भी तंग नहीं करुँगी . अब तो मैं चोटी बनते हुए भाग नहीं जाती हूँ .दादी मुझे दूध देती है तो मैं चुप चाप पी लेती हूँ .अपना होम वर्क भी जल्दी जल्दी कर लेती हूँ .एकदम गुड गर्ल बन गई हूँ .अब उनको कभी तंग नहीं करुँगी बस आप उसे मेरे पास जल्दी भेज देना .अरे हाँ उसे बस में चक्कर आते है इस लिए ट्रेन में भेजना .मैंने थोड़े पैसे बचाए है वह भी लिफाफे में साथ भेज रही हूँ .आपको काम आयेंगे .अरे हाँ आपको कुछ और पूछना हो तो मेरा फ़ोन नम्बर है :७८०७८५२.

मेरा काम मत भुलाना ।

आपकी छोटी सी बेटी पूजा ॥"


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एक लिफाफे पर पता लिखा हुआ था “भगवानजी को मिले “डाकिया रामबाबू ये लिफाफा चन्दनपुरके सहायक पोस्ट मास्टर श्रीमती हेमलता सरदेसाई के पास छोड़ गया ।गोंद से चिपकाये इस कवर से रुपये १२८।५० पैसे निकले .साथ में कुछ दवाई भी थी . हेमलता ने ये चिट्ठी पढी .उसकी आँखे डबडबा गई . उसे अपनी माँ के पास छोड़ी हुई अपनी दस साल की बेटी सुजाता याद आ गई .

हेमलता ने चिट्ठी में लिखा हुआ नम्बर डायल किया ।सामने पूजा के पिताजी ही थे ।हेमलता ने सारी बात उन्हें बताई और पूजा को फोन देने के लिए कहा .

”हेल्लो पूजा बेटी ,मैं मामा बोल रही हूँ ...” हेमलता ने पूजा को कहा ।
"माँ , भगवानजी को इतनी जल्दी मेरी चिट्ठी मिल गई ?”मासूम पूजा ने पूछा ।

”हाँ !!!बेटी ,वो फौरन भागके मेरे पास आए और ये चिट्ठी मुझे दे दी ।”हेमलता बोली .

”पर माँ तुम्हारी आवाज क्यों बदली हुई लग रही है ?” पूजा को ताज्जुब हुआ ।

"बेटी , भगवान का घर बहुत ही दूर है इस लिए थोडी तुम्हारी आवाज भी मुझे बदली हुई ही लग रही है ...” थोड़ा सोचने के बाद हेमलता ने उत्तर दिया ।

”अच्छा माँ मैंने दवाई भी भेजी है वो ठीक से लेती रहना । पर तुम अब वापस कब आओगी ?” पूजा के इसी सवाल का हेमलता को डर था .

”बेटी , मुझे भगवानजी ने यहाँ एक नौकरी करने के लिए बुलाया है ।यहाँ छोटे छोटे बच्चों की मम्मी नहीं है .तो उन्हें मुज को तुम्हारी ही तरह गुड गर्ल और गुड बॉय बना देना है .शायद कुछ साल लगेंगे .लेकिन मेरा काम जैसे ख़त्म होगा मैं तुरंत तुम्हारे पास आ जाउंगी .” हेमलता की आवाज और आँखे ये जवाब देते देते भीग गई थी .

” अच्छा मम्मा ,तुम्हे हर सन्डे छुट्टी होगी न तब तुम मुझे फोन करती रहना हाँ !! और उन सब बच्चों को ढेर सारा प्यार देना ।मेरी चिंता मत करना .यहाँ पर मेरा सब बहुत ख़याल रखते है . पर मुझे फोन जरूर करना . अच्छा भगवानजी को मेरा धन्यवाद बोलना हाँ !! बाय बाय !!!” पूजा को एक गहरा सुकून महसूसहुआ ।

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आज पूजा अठारह साल की हो चुकी है .हकीकत को जानती है -समजती है .आज भी सन्डे का उसको उतनी ही बेसब्री से इन्तजार रहता है अपनी मम्मी के उस फोन का जो उसे अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती है .पूजा न्युयोर्क में पढ़ाई कर रही है .हेमलता नैनीताल में रहती है .दोनोने कभी भी एक दूसरे से मिलनेकी कोशिश भी नहीं की .क्यों कि ये सुंदर भ्रमको दोनों ही तोड़ना नहीं चाहती है .हेमलताने पूजा को उसकी शादी में जरूर आने का वादा किया है आशीर्वाद देने के लिए ........!!!





1 जनवरी 2009

शुभकामना


सभी इस ब्लॉग पर पधारने वाले महेमानोंको
एवं
उनके परिवारजनों को मेरी और से नए साल की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ ..........

छोटी आशा .....



नए सालका ये है नया महिना और नया दिन भी !!!!!


उम्मीदें होती है हमारी हर नए पल से खास !!!!

पर ये साल एक नए मोड़ पर चलते है ...

उम्मिदोंके घरौंदे नहीं बनाते आज ...

बस एक नई राह चुनकर उस पर एक नया रास्ता बनाते हैं ....

बर्फ की ठंडकसा , आगकी तपिशसा ,

हौले हौले बरसते मेघा सा ...

थोड़ा सा थमा सा ,थोड़ा सा मचलता ,थोड़ा नाचता सा ,

पर आज ,अभी ,इसी वक्त के पल को भरपूर हमें जीना है ....



भगवान् सा या खुदासा बन्ने की ख्वाहिश तो नहीं ....

बस एक सच्चे इंसान बनने की चाह से जीना है .......

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...